अप्रिय सत्य को लिखना: जीवन का अनुवाद

क्या बुल्गारियाई शब्द ‘taga’ -जिसका अर्थ दुख या विषाद हो सकता है- को पूरी तरह से अनुदित किया जा सकता है? क्या हम खुद या हमारे बचपन को किसी भी तरह अनुदित कर सकते हैं ? या हमारे शरीर को? क्या हम उन घटनाओं को अनुदित कर सकते हैं जो हमारे साथ घटी ही नहीं है?

कुछ लोग सिगरेट की तस्करी करते हैं तो कुछ लोग शराब या हथियारों की. लेकिन हम जिस वर्जित व्यापार में लगे हैं वो कुछ ज्यादा खतरनाक है! क्योंकि हम जिन वस्तुओं का गुप्त रूप से या छिपाकर कारोबार करना चाहते हैं, वो कहानियां हैं, वो हमारी कहानियां है और दूसरे अन्य लोगों की कहानियां हैं. मैं जहां से ताल्लुक रखता हूं वहां के लोग अपनी जगहों को बचाकर रखने के लिए जाने जाते हैं या अपनी कहानियों को गुप्त रूप से याद करने के लिए जाने जाते हैं-एक ऐसी जगह जो भदेस किस्म के दुख का या उसके विराट छुपे हुए क्षेत्र का है.

आप कह सकते हैं कि चाहे लेखक हो, अनुवादक हो या कोई स्मगलर हो-हम सब कुछ मिलते-जुलते कार्यों में लगे हुए लोग हैं. हम ऐसे लोग हैं जो अनुवाद करते हैं या कहें कि हम उन चीजों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाते हैं जो इच्छित है, मूल्यवान है, खोई हुई है, दबाई हुई है और वर्जित है.

गिओर्गी गोस्पोडिनोव, द स्टोरी स्मगलग, Cahier 29

जिम्मेवारी का भाव. हरेक विचार. हरेक याद. हरेक भाव का एक स्वामी होता है, मालिक-मकान होता है. जो चीजें ‘घटित’ हो चुकी हैं. चीजें जो संबंधित हैं. जो आपसे या मुझसे संबंधित हैं. जैसे कि कोई ऐसा विशेषाधिकार जो जन्म से जुड़ा हो. एक ऐसी सूची जो ‘ये मेरा है, ये तेरा है और ये हमारा है’ के भाव से जुड़ा हो. अक्सर समूचे इतिहास को राष्ट्रों के द्वारा अधिकृत कर लिया जाता है. अक्सर राष्ट्रों के द्वारा जिंदगियों, दूसरे राष्ट्रों और लोगों पर कब्जा कर लिया जाता है. फिर लेखन और पुनर्लेखन किया जाता है जो हमारी सचाइयां बन जाती है. हमारी और आपकी. या इसे संक्षेप में कहें तो सामूहिक प्रभुत्व या जिम्मेदारी के तले जीना दुखद हो जाता है.

ऐसे में कोई अपने जिंदगी की ‘घटनाओं’ को एक वर्चस्वशाली या यहां तक कि अधिनायकवादी याददाश्त से मुक्त कैसे करे? और उसे कैसे एक साहित्यिक प्रतिरोध के रूप में परिवर्तित करे?

ऐसे में अनुवाद हमारे समाने एक जरूरत के रूप में प्रस्तुत होता है. एक ऐसे लेखन की आवश्यकता के रूप में जो गलत को गलत के रूप में लिखे. गलत या असत्य का दस्तावेजीकरण करना या उसे लिखना, अपने लेखन के द्वारा उन बुराइयों और अन्यायों को उजागर करना जो दैनिक गतिविधियों के बीच ढंका-छुपा रहता है, जो इतना सामान्य रहता है मानो हमारी जीवनशैली बन गया हो-मानो ‘चीजें ऐसी ही हैं, ऐसी ही रही हैं और ऐसी ही रहेंगी और कुछ भी करने की जरूरत नहीं है’. इसलिए इन कहांनियों का अनुवाद जरूरी है. तो क्या अनुवाद एक सेवा का भाव है? शायद. अनुवाद प्रक्रिया में आपको अपनी उस भाषा को चुनौती देनी होती है जिसे आपने इतनी सतर्कतापूर्वक पाला-पोसा है और उसे सीखा है. आपको उन शब्दों की फिर से पुनर्यात्रा करनी होती है जिसे आपने एक सार्वभौम सत्य के रूप में बचपन से ग्रहण कर रखा है. ऐसे में अनुवाद-कर्म को एक आवेग की तरह, एक प्रेरणा की तरह और एक ऐसे कथावाचन की तरह लेना चाहिए जिसे न कहने की सूरत में वो कहानी ‘अनकही’ रह जाती. तो क्या यह वर्जित कहानियों के बारे में बात करने और उसे कहने से संबंधित है? हो सकता है. या संभवत: ऐसा ही है. क्या अनुवाद-कर्म के वे दायरे आपकी दृष्टि को वाधित नहीं कर देते कि अब हमारा कार्य समाप्त हो गया है? अनुवाद एक गतिविधि भी है, अनुवाद एक आन्दोलन भी है. यह अनुवादकों का एक औजार भी है जो तरह-तरह के मुद्दों को उठाते हैं. Body phele debo यानी सिर्फ ढांचे का अनुवाद ही नहीं बल्कि परिस्थिति की मांग हो तो आत्मा का भी अनुवाद. यानी अनुवाद में आत्मा का शरीर के रूप में अनुदित होना द्रष्टव्य होता है. इसमें जुनून की जरूरत होती है. इसलिए जुनून का अनुवाद होना चाहिए चाहे वो एकवचन में हो या बहुवचन में. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. महत्वपूर्ण बात है यथास्थिति को तोड़ना. इसीलिए अनुवाद एक विध्वंस भी है.

अभी तक जो कुछ हुआ है वो अच्छा ही हुआ है. लेकिन मैं इन बातों पर भी विचार कर रहा हूं:
क्या अनुवाद एक आत्मकथात्मक कृत्य है? क्या यह एक संस्मरण है? शायद. आखिर वो ऐसी चीज तो है ही जिसे कहने की जरूरत है, जो किसी बात में अंतर्निहित होती है. वो उन बातों से संबंधित हैं जहां चुप्पी या मौन प्रभावी होता है. किसी भाषा में मौन जो कहानियों से भरपूर होती है और जिसे पहचानने की जरूरत होती है और जो हमेशा नहीं सुनी जाती. तो क्या यह चुप्पी को तोड़ने की विधा है? शायद हां. तो क्या यह उसे सुनने के लिए सीखने की विधा है? शायद.

एक बार मैंने रोमिला दी से पूछा: एक इतिहासकार के रूप में अतीत को अनुदित करना जिसे प्रतिरोध के लिए चीखते वर्तमान में साझा करने की जरूरत हो, ऐसे में आपकी निगाह में कोई भी अतीत क्या प्रस्तुत कर सकता है? और इतिहासकार के रूप में बिना शिक्षण और प्रशिक्षण के एक सामान्य इंसान के रूप में आप क्या सोचती हैं? आपका इतने दशकों का कार्यकलाप उस कवि के रास्ते में कितना आड़े आता है जिसे आप खुद को बनते नहीं देखना चाहती? यहां तक कि एक केसेंड्रा किस्म के संत के रूप में जो अपने अतीत को व्याख्यायित करता है ताकि एक संभावित भविष्य का संकेत प्रतिरोध के हथियार के तौर पर उपलब्ध हो सके?

उनका जवाब कुछ इस प्रकार था:

कोई व्यक्ति हमेशा अनुवाद करता रहता है. क्या वह अपने विचारों का अनुवाद नहीं कर रहा? हालांकि अनुवाद एक अनपेक्षित स्वरूप ग्रहण कर सकता है, लेकिन उसमें कोई अपना अक्स और अपने जीवन को भी देख सकता है.

हां, ये सही है कि एक इतिहासकार अतीत का अनुवाद कर रहा होता है जिसे साझा करने की जरूरत होती है. हम सभी सोचते हैं कि हमारा अनुवाद ही एक मात्र प्रमाणिक है, हालांकि हम जानते हैं कि विभिन्न अनुवाद एक दूसरे से भिन्न हो सकते हैं. अतीत के अनुवाद पर बहस हो सकती है. हो सकता है कि जब लोग मेरे कहे का खंडन करते हों तो वो मुझे पसंद न आए लेकिन मैं इतना स्वीकार करती हूं कि उन्हें ऐसा कहने का हक है-बशर्त अतीत के बारे में उनका अनुवाद विश्वसनीय साक्ष्यों पर आधारित हो.
और ऐसा तब होता है जब अनुवाद साक्ष्यों की जगह कल्पनाओं पर आधारित होता है. मैंने इस पर कभी काम नहीं किया है कि किसी अनुवाद में कल्पना की कौन सी रोचकता काम करती है. शब्दों का चयन अलग-अलग हो सकता है और अर्थ की व्याख्या भी. जब कई इतिहासकार अतीत को अनुदित होते हुए देखते हैं और बहस शुरू करते हैं, तब वह दूसरा स्वरूप ग्रहण करने लगता है.

मैं अपने आपको कवि के रूप में नहीं देखती क्योंकि मैं नहीं चाहती कि कविता मेरे अनुवाद को प्रभावित करे. हालांकि जीवन के शुरूआती दौर में मैंने एक बार कविता लिखने के बारे में विचार जरूर किया था.
और न ही मैं कोई संत हूं. मेरे लिए यही जिंदगी काफी हैं और मैं इसके तूफानी प्रवाह में बहती जा रही हूं क्योंकि मैं नहीं जानती कि मुझे कहां उतरना है.

एक संस्मरण के रूप में अनुवाद सोचने, बोलने और लिखने का एक बेहतर उद्यम है. हो सकता है इसी वजह से मैं इससे दूर भागती हूं. पक्के तौर पर नहीं कह सकती कि इसे कैसे किया जाए, कैसे अपने समय से या अपने जीवन से प्रतिरोध न करूं.
अगर मैं प्रतिक्रिया व्यक्त कर रही हूं तो मुझे खुद से पूछना चाहिए: आखिर मैं ऐसा क्यों कर रही हूं? मैं किस चीज का अनुवाद कर रही हूं और क्यों कर रही हूं? एक अन्य अर्थ में अनुवाद वह प्रक्रिया है जो कोई व्यक्ति हमेशा करता रहा है- अपने विचारों को अपने भाषण या कर्म के रुप में अनुदित करना.

प्रिय रोमिला-दी,

उस समय क्या होता जब आपको अपने समय या जीवनकाल की घटनाओं का प्रतिरोध न करना पड़ता? उस समय क्या होता अगर सीखने में हिचक को सतर्कतापूर्वक और स्पष्ट तौर पर कुछ समय के लिए खारिज कर दिया जाता और हमारे पास तथ्यों और कल्पनाओं को एक साथ मिलाने की आजादी होती जैसा कि लेखक और कवि अक्सर किया करते हैं. और हमारे समय की घटनाओं को दर्ज किया जाता जिसमें एक जागरुकता और संभावित कल की भविष्यवाणी की भावना का सम्मिश्रण होता! उसे मैं विशुद्ध भविष्यवाणी नहीं कह रहा हूं, बल्कि उसे मैं एक तार्किक गुप्त कर्म के रूप में देख रहा हूं जो किसी घटना की संभाव्यता को उसकी वर्तमान स्थिति के बरक्स देख रहा है. हो सकता है वो निष्कर्ष का विज्ञान हो. शायद वैसा ही हो.

मेरा आग्रह है कि कृपया मैं जो अब बताने जा रहा हूं उसे ध्यान से सुनें. ये बात महाश्वेता-दी के बारे में और उनकी उस योग्यता के बारे में है जिसके द्वारा वे दैनिक जीवन के तथ्यों को अपने काल्पनिक उपन्यासों में समावेशित करती थी. यह बात उनके उस आन्दोलन के बारे में है जिसके द्वारा वे अपने अंतर्विवेक से दैनिक जीवन की वास्तविकताओं की व्याख्या करती थी और उसे फिर अपने प्रतिरोध के साहित्य में अनुदित कर पाती थीं. ऐसा सिर्फ वे अपने लड़ाकू ‘स्व’ के विस्तार के लिए नहीं बल्कि एक मनुष्य के रूप में करती थी जिसके पास अपनी समष्टि के प्रति एक चिंतित दृष्टिकोण था.
साक्ष्यपूर्ण लेखन, खुलासा करना, दस्तावेजीकरण और हर चीज का रहस्योद्घाटन…

10 फरवरी को बुधन सबर और उसकी पत्नी शाओन्ली सबर पुरुलिया की सीमा पर बड़ा बाजार की तरफ जा रहे थे. अचानक बड़ा बाजार पुलिस थाने से पुलिस आई और बुधन को उठाकर ले गई. बुधन को गिरफ्तार करने का आरोप निहायत ही गढ़ा हुआ था. 10 से 12 फरवरी तक पुलिस ने उसे कठोर यातना दी, पुलिसिया भाषा में कहें तो उसकी कम्बल धुलाई की गई जिसमें शरीर पर चोट का निशान नहीं रहता. उसे बार-बार देसी शराब पीने पर मजबूर किया गया. उस पर इलाके में सारी डकैतियों में शामिल होने का आरोप लगाया गया और वह यातना के मारे उसे स्वीकार करता रहा. उसे लगा कि अगर उसने हां कह दिया तो वे उसे छोड़ देंगे. लेकिन ऐसा होना नहीं था. 12 फरवरी को उसे अदालत में पेश किया गया और पुलिस को आगे जांच की इजाजत मिल गई. इस तरह उसे जेल ले जाया गया. 16 फरवरी को उसे फिर से अदालत ले जाया गया और फिर वहां से जेल ले जाया गया. इस बीच उसकी निर्दयतापूर्वक पिटाई की गई.

17 फरवरी की सुबह उसे उसकी कोठरी से ले जाया गया. उसके पास उसका गमछा या कोई अन्य वस्तु नहीं था. उसे यार्ड की सफाई करने को कहा गया. उसने ऐसा ही किया. उसके बाद उसकी फिर से पिटाई की गई. उसके बाद उसे एक एकांत कोठरी में ले जाया गया. पूरे दिन भर उसका दरवाजा नहीं खुलता था. शाम को जेल के अधिकारियों ने लापरवाहीपूर्वक घोषणा की उसने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली है. और आत्महत्या कैसे की? तो जवाब था कि उसने गमछे से आत्महत्या कर ली. आखिर एक एकांत कालकोठरी में कोई व्यक्ति अपने गमछे से खुदकुशी कैसे कर सकता है जो उसके पास था ही नहीं?

18 फरवरी की सुबह एक रिपोर्टर ने मुझे और समीति को फोन किया और हम वहां तुरंत पहुंचे. उसकी पत्नी और अन्य लोग भी वहां आए हुए थे. उस समय तक पहला पोस्टमार्टम किया जा चुका था. पुलिस शव के तत्काल अंतिम संस्कार पर आमादा थी. लेकिन सबरों ने कहा- “नहीं हम अपने मृतक का दाह संस्कार नहीं करते, हम उसे अपने साथ ले जाएंगे”. सो, वे अपने साथ बुधन के शव को अपने गांव लेकर चले गए.

उसके बाद पुलिस उसके गांव पहुंच गई और उसके शव के लिए पूरे गांव में खोजबीन की. लेकिन सबरों ने उसके शव कहीं गुप्त जगह पर दफना दिया. पुलिस को चकमा देने के लिए उन्होंने एक जगह पुआल के ढेर को आग लगा दी थी ‘हरिबोल’ के नारे लगाए. ऐसे में सभी ने यहीं सोचा कि बुधन का दाह संस्कार कर दिया गया है. उसके बाद उन्होंने उसके शव को उसकी झोपड़ी में रख दिया. उसकी नौजवान पत्नी ने उसके शव को एक मिट्टी के गड्ढे में डाल दिया और उसके ऊपर चटाई बिछाकर सो गई. उस रात उसकी पत्नी शांतिपूर्वक सोई क्योंकि वह इस बात से संतुष्ट थी कि उसका पति बुधन उसके साथ है और वो उसके शरीर को सुरक्षित रखने में सफल रही थी.

उसके बाद हाईकोर्ट ने दूसरे पोस्टमार्टम का आदेश दिया. यह आदेश जिलाधिकारी और पुलिस कप्तान के लिए एक सदमे की तरह आया और वे गुस्से से पागल हो उठे. वे भारी पुलिस-बल के साथ उस गांव पहुंचे और हरेक व्यक्ति से कहने लगे, “तुमने शव का दाह संस्कार क्यों नहीं किया?” महिलाओं से रहा नहीं गया, वे पुलिस वालों के पास पहुंची और कहा- “आप क्या करेंगे? हमें मार डालेंगे? गोली मार देंगे. जरूर ऐसा करिए, हम सबको गोली मार दीजिए लेकिन हम आपको बुधन की लाश लेने नहीं देंगे!”
इन सारी प्रिक्रियाओं का हमारे संगठन द्वारा वीडियो रिकॉर्डिंग करवाया जा रहा है था. इसलिए पुलिस उन पर उस समय कोई जुल्म नहीं कर पाई.

आखिरकार वे बुधन के शव को पुरुलिया ले गए. वो एक लगभग खराब हो चुकी और सड़ चुकी लाश बन चुकी थी. पोस्टमार्टम के बाद वे चाहते थे कि बुधन का परिवार उस शव को ले जाए जिसमें अब कीड़े ही बच गए थे. बुधन की पत्नी ने कहा, “मैं बीमार हूं, इस शव को नहीं ले जा सकती. अगर आपको इसे हमें देना ही है तो गांव जाकर इसे दे आइये”.
लेकिन पुलिस ने ऐसा नहीं किया.

तो इस तरह से बुधन वहीं बैठा रह गया. एक सड़ती हुई बुधन सबर की लाश वहीं बैठी हुई है…इंतजार करती हुई..
ये कहानी मेरी गढ़ी हुई नहीं है, ये कहानी दरअसल वास्तव में घटित हुई है और मुझे उसे दर्ज करना है. मैं बुधन के शव को यहां से कहीं ले जा रही हूं. मैं भारी मन से ऐसा कर रही हूं, उसका मुझ पर कर्ज है…
लेखन ही मेरी असली दुनिया है. मैं इसी में रही हूं और अब तक अपने असितित्व को बचाती आई हूं..
इसे पढ़ने के बाद रोमिला-दी ने मुझे जवाब में ये लिख भेजा-

प्रिय नवीन,

अब मैं अपने आप से कह रही हूं कि मेरा विचार भी एक निश्चित अनुवाद के आखिरी बिंदु है-भावों का अनुवाद जो विचारों का रूप धारण कर लेते हैं. क्या ये वहीं बात नहीं है जो महाश्वेता-दी कर रही हैं? वह वास्तव में अपने पांचों इंद्रियों का इस्तेमाल नहीं कर रही, लेकिन लाक्षणिक रूप से ये सारी बातें उनकी सोच में आ रही है कि जो भी वो कल्पना करती है, उसे उनकी इंद्रियां कैसे ग्रहण करेंगी. वो उस अपहरण, प्रताड़ना और मृत्यु का साक्षात अनुभव कर रही हैं. वो उसे देख सकती हैं, सूंघ सकती है, सुन सकती हैं, छू सकती है और ऐसा वो खुद की वहां मौजूदगी की कल्पना कर करती हैं. एक कवि अपने आपकी किसी खास जगह पर कल्पना कर सकता है और संभवत: उस अनुभव को जीने की कल्पना भी कर सकता है.
लेकिन ये सारे अनुभव एक गैर-कवि नहीं कर सकता.

और इन सबका जब एक विचार के रूप में अनुवाद हो जाता है तो फिर एक दूसरा अनुवाद होता है-वो अनुवाद शब्दों में होता है जिसे लिखा या बोला जा सकता है. जब तक कविता मौखिक स्वरूप में थी, शब्दों का मतलब भाषण या वक्तव्य होता था. लेकिन उन्हें अब अक्सर पढ़ा जाता है. ऐसा कभी-कभार ही होता है कि हम कविता जोर-जोर से खुद के लिए पढ़ते हैं. एक विचार को शब्दों में अनुदित करना अपने आप में एक संपूर्ण अनुभव है जिसमें शब्दों का चयन, उसकी बारीकियां और एक अंदाज शामिल होता है और ये ऐसी बातें हैं जिसे लिखते समय हर बार लेखक उससे रूबरू होता है. और वो संघर्ष उस समय और कठिन होता है जब ये सारी बातें दिमाग में होती हैं, भले ही किसी का मस्तिष्क उसकी इंद्रियों से कितना ही निकट या दूर क्यों न हो.

हममें से कई लोग संक्षिप्त होने की कोशिश में संघर्ष करते रहते हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि जब आप शब्दों का इस्तेमाल कर रहे होते हैं तो आप कभी भी संक्षिप्त नहीं हो सकते. हम चाहते हैं कि हमारे विचार और शब्द वैसे ही प्रवाहित हों जैसा कि वे चाहते हैं. हममें से कुछ ये नहीं जानते कि शब्दों को कैसे समाने रखें और उसे प्रवाहित होने देते हैं.

और ऐसे में फिर आपका वो सवाल सामने आ जाता है: क्या होता अगर…मैंने अपने जीवन में कितनी बार ऐसा कहा होगा, मैं नहीं सोच पाता. क्या होता अगर? ऐसा हम तथ्य-विरोधी रूप में नहीं बल्कि एक विकल्प या विकल्पों के रूप में कहते हैं.
लेकिन वो ‘अगर’ धूमिल होता प्रतीत होता है.

मैं आपको सुन रहा हूं. आपकी आवाज को सुन रहा हूं, मेरे कान थियेटर के अभ्यस्त हैं. मैं एक सतत अनुवाद कर्म के रूप में लिखता, बोलता, सुनता और पढ़ता हूं. ऐसा मैं सभी भाषाओं में करता हूं. मैं जिस माहौल में पला-बढ़ा वहां मेरी लाहौर की मां अपनी नफासत भरी पंजाबी में एक पूरी की पूरी हिंदी फिल्म की कहानी एक सजीव पंजाबी जुबान में सुना रही थी, जबकि मेरे पिता अपनी मां की बातों को विशुद्ध हिंदी में समझा रहे थे-मेरी दादी उत्तर प्रदेश से थीं. और मैं क्या कर रहा था? मैं उत्सुकता के साथ राज कपूर और नरगिस की फिल्म की उस जादूई व्याख्या को सुन रहा था जो पंजाबी में सुनाई जा रही थी और इन सबको मेरी ‘पहली भाषा’ अंग्रेजी में अनुदित कर रहा था और फिर सवाल पूछ रहा था जो उसके अभिनय को बाधा पहुंचा रहा था!

ये मेरे घर में सामान्य बात थी. विचार और शब्द एक दूसरे से बारीकियों और महत्ता व लहजा और उच्चारण के प्रश्न पर टकरा रहे थे. इनमें से पूरा का पूरा अनुवाद में नष्ट हो सकता है लेकिन वे हमारी भाषाओं के उत्पत्ति को रेखांकित करते हैं जब हम उन्हें सुनते हैं.

‘जब तक कविता मैखिक स्वरूप में थी’- जब आप ऐसा कहती हैं तो मैं उस विचार को सलाम करता हूं. फिर भी मेरा कहना है कि किसी के मन में कविता का पाठ अभी भी एक ‘सुनने योग्य’ बात है. सिर्फ फुसफुसाहट का स्तर बदल गया है! अगर जैसा उसे सुना जाता है, वैसा ही लिख दिया जाए, तो उस पठन के समय ही एक मौन श्रवण की संभावना बन जाती है.

निश्चित ही एक लेखक का ‘मैं या मेरा’ का भाव ऐसा प्रतीत होता है जैसा कि हम उसे अनुभव करते हैं और फिर एक ‘मैं या मेरा’ वो होता है जो वास्तव में वो लेखक या लेखिका होती है. एक स्वरूप वो होता है जो लेखन कर्म के समय तक छुपा रहता है और वो लेखन के द्वारा बाहरी दुनिया के ‘सामने आता’ है. उसे आप अपने खुद के ‘अंदर की सामग्री या व्यक्तित्व’ का अनुवाद करना कह सकते हैं. दूसरा वह होता है जो लेखन कर्म के समय उस संघर्ष में इंतजार करता रहता है जब लेखक अपनी भाषा, अपने शब्द, उसके अर्थ और भावों के लिए संघर्ष कर रहा होता है और जिसके द्वारा वह अपने अंदर के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालना चाहता है. तो क्या लेखन का कर्म भी एक अनुवाद है?

लेखन एक अंतर्ज्ञान या अंग्रेजी में जिसे इंट्यूशन कहते हैं, उसका भी सक्रिय कर्म है, बल्कि आवेग में किया गया कर्म है जिसमें हम अपने विचारों को भाषा के रूप में अनुदित करते हैं. यह व्याकुल किस्सागोई हमेशा अपने आपको उद्येश्य के रूप में स्थापित नहीं करती. बल्कि यह निजी और राजनीतिक होती है. यह पाठकों को भी वो जमीन मुहैया कराती है कि वो जो ले जा सकते हैं या इच्छा कर सकते हैं, करें और उन कहानियों का अपना निजी अर्थ निकाल लें. यह बिल्कुल पाठकों पर छोड़ दिया जाता है कि वे उन कहानियों में प्रेरणा या रणनीति या संकेत या फिर शैली ढूंढ़ लें. तो क्या अनुवाद एक “पाठक होने जैसा” कर्म है? संभवत: ऐसा ही है.

दरअसल, पढ़ने की प्रक्रिया भी एक अनुवाद कर्म ही है. या कहें कि अर्थ खोजने या गूढ़ार्थ निकालने की प्रक्रिया. इसमें हम अनुमान लगाते हैं. पठन एक उद्येश्य हो जाता है, बल्कि कहें कि उद्येश्यपरक पठन भी अनुवाद ही है. एक निजी और उद्येश्यपरक बनाम वस्तुनिष्ठ पाठक जो अपने खुद के चश्मे से चीजों को देखता है.

जहां तक महाश्वेता-दी का प्रश्न है तो उन्होंने जिन भूमिकाओं का निर्वहन अपनी बहुत सारी जिंदगियों और अपने चरित्रों के साथ किया, वो साक्षी होने का भाव था. उनके लिए साहित्य एक साक्षी होने जैसा था. किस्सागोई के बहाने अंधेरे समय का दस्तावेजीकरण. तो क्या वह एक दोहरा अनुवाद-कर्म था? शायद हां. कौन जानता है!
निष्कर्ष:

संभावनाओं के द्वार खोलने के बजाय हम ऐसे राष्ट्र-राज्य का निर्माण कर लेते हैं जो पुस्तकों को एक घेरे में कैद देती हैं. उसे वस्तुओं में तब्दील कर देते हैं और उसका घेराव कर देते हैं. पुस्तकों को जमीन पर खदेड़ दिया जाता है. उन्हें खरीदकर हर क्षेत्र में हर भाषाओं में साहित्यिक गुलामों की तरह बेच दिया जाता है.

मुझे लगता है कि मैं जो कहने की कोशिश कर रहा था वो कुछ इस तरह से है. प्रकाशन की हमारी दुनिया में अत्यधिक समय, ऊर्जा और धन का निवेश होता है. हमें ऐसे ढांचों के निर्माण पर संसाधनों को व्यय करना होता है जो आखिरकार हमें ही अपने घेरे में ले लेते हैं. फिर भी ये संक्षिप्त चारदीवारियां पिघल ही जाती हैं और धुंधली हो जाती हैं. ऐसा तब होता है जब आपके-हमारे कार्यों से और उनके करने के तरीकों से कई सारी भावनाएं खिल उठती हैं. ऐसा तब होता है जब हम शब्दों की उत्तेजनाओं और सिहरन को हासिल कर लेते हैं. अनुवाद एक सुरक्षित गांठ को नाजुक और संभव तरीके से उन उत्सुक समुदायों के लिए खोलता है जो वास्तव में नहीं जानते कि ये कैसे होता है. और अगर वे ऐसा जानते भी हैं तो उसकी तरफ ध्यान नहीं देते. इस कार्य से व्यक्तिगत और सार्वजनिक दोनों तौर पर लोगों को फायदा होता है. आम लोग नहीं जानते कि कैसे एक किताब उनके हाथों तक पहुंचती है. जब तक वो उनके हाथों में पहुंचती रहती है, वो इसके बारे में बिल्कुल नहीं जानते. यह एक ऐसी नियमितता है जिसे सिर्फ विश्वसनीय और दृढ़ कार्य के रूप में ही परिभाषित किया जा सकता है.

ऐसे में यह एक प्रकाशक का कार्य है कि वह उन पाठकों के साथ अनकही कहानियों को कहने के लेखकीय कर्म, नए विचारों की साझेदारी और पुराने विचारों को प्रकाश में लाने के पुल का काम करे जो हमेशा इन पुस्तकों तक पहुंचने का रास्ता नहीं खोज पाते हैं. तो क्या अनुवाद एक पुल बनाने का भी काम है? शायद. हो सकता है ऐसा ही हो.

ऐसे में अपनी बात मैं न भी कहूं तो ऐसा लगता है कि प्रकाशक कुछ इस तरह के कार्य करते हैं: वे प्रतिरोध के स्वर बनते हैं. इस तरह की प्रस्तुतिकरण के किसी भी कार्य का अग्रिम दस्ता बनते हैं. वे दूसरों की आवाज का अनुवाद करते हैं, दूसरों की कविताओं को पुस्तक के रूप में छापते हैं जिसे एक पाठक अपने साथ रख सकता है और पढ़ सकता है.

मैं लक्ष्य तय करने के इस व्यापार को एक संयमित गतिविधि मानता हूं जिसमें आपके हाथ बंधे होते हैं. जिसमें एक सीमा होती है, चारदीवारी होती है, बाड़ होती है और घेरा होता है. उसमें आपको कुछ लक्ष्य प्राप्त करने होते हैं, क्रियान्वयन करने होते हैं और जिसमें आपको एक तय समय सीमा के भीतर परिणाम-लक्षित होना होता है. इस कारोबार में आपके सिर पर तलवारें लटकी होती हैं और खुद का दिया हुआ लक्ष्य होता है. जबकि अन्य सारी शर्तें बाजार द्वारा तय की जाती हैं जहां आपको या तो प्रदर्शन करना है या बाजार से गायब हो जाना है या अन्यों के द्वारा आपको बाजार से हटा दिया जाना है. ऐसा तब तक होना है जब उस अन्य का भी यही हाल न हो जाए. इस कारोबार में खिलौना जैसे सिपाहियों की कतारें होती है जो दूर तक फैली होती हैं.

वास्तव में विचारों को मुक्ताकाश चाहिए होता है जिसमें वो स्वतंत्रतापूर्वक विचरण कर सकें. कभी-कभी यह काफी आनंदित करनेवाली बात होती है जिसमें आप ये नहीं जानते कि आगे क्या होनेवाला है. वो एक ऐसी खुशी होती है जो जोखिम लेने से हासिल होती है. उसमें आप अपने अंतर्ज्ञान पर भरोसा करते हैं. उसमें अगर आप भविष्यवाणी की क्षमता नहीं भी रखते तो वो कोई अपराध नहीं है क्योंकि आखिरकार ये सब भविष्य की बातें हैं. वहां गणित का कोई नियम या अनिश्चितता के घेरे में कई नींद-विहीन रातें भविष्य का ज्ञान नहीं करा सकती. हम उसके आने की प्रतीक्षा करते हैं. जब भी वो आता है, हम उसका वर्तमान के रूप में दिल खोलकर स्वागत करते हैं. हम देखते हैं कि कैसे यह आकार ग्रहण करता है और हम उसकी प्रक्रिया का निरीक्षण करते हैं और उससे सीखते हैं. आखिरकार, एक प्रकाशक के रूप में हम जो भी तार्किक स्वतंत्रता के लिए करते हैं वो रचनाशीलता ही है. उसमें एक कला और एक तर्क है. यहां तक कि उसमें हमारे जुनून की एक शैली भी है. यह सिर्फ दुनिया के उन निर्देशों से भिन्न है जो अपने आपको क्लोन बनाने के लिए व्याकुल है. जो अपने आपको किसी दूसरे की नकल करने के लिए व्याकुल है. हम लोगों के मस्तिष्क और हृदयों से कुछ निकालकर लाते हैं जिन्हें लेखक और कवि कहा जाता है. हम उसे इस दुनिया में लाते हैं और ये अद्भुत है. कुछ ऐसी चीजें जो पहले वजूद में नहीं थी और उसे हम बिल्कुल उसी तरह से लाते हैं जैसा उसे पहले लाया जाता था.

आपने इसे संभव कर दिखाया है. आपने इसे विचार से शब्दों के रूप में अनुदित किया है. आपने इसे कल्पना से वास्तविकता में ढाल लिया है. आपने इसे उस रूप में निर्मित किया है जिसे हम हाथ में धारण कर सकते हैं.
आपने उसे एक किताब के रूप में प्रकाशित कर दिया है.

नवीन किशोर
प्रकाशक
सीगल बुक्स