क्या आप वैभव आर्या से मिलना चाहेंगे ?

“आपका घर तो कभी भी गिर सकता है। भूकंप आने पर इस दिशा में गिरेगा। दीवारों में जो दरारें बनी हैं, क्या इस घर के बगल में कोई मकान बन रहा था, क्या दरारें आने के बाद दरवाज़ें और खिड़कियां बंद करते वक्त फंसने लगी हैं?”

यह बातचीत 2015 के किसी महीने की है। एक लड़के की है, जो अपनी दोस्त से शादी के लिए उसके पिता से मिलने गया था। मैं ऐसी किसी शादी का किस्सा नहीं जानता जिसकी बातचीत भूकंप और मकान गिरने की भविष्यवाणी से शुरू होती हो। लड़की के पिता का तो दिल ही बैठ गया होगा। लेकिन पिता को एक बात जंच गई कि लड़के की समझ काफी साफ है। आत्मविश्वास से भरा दिखता है। उन्होंने हां कह दी।

मिलिये वैभव आर्या और नलिनी से। गोवा एयरपोर्ट पर नलिनी मुझसे मिलने चली आईं। यह समझ कर मैं कोई और हूं। इस ग़लतफ़हमी ने मेरी चाबी को मौक़ा दे दिया। मैंने अपनी चाबी निकाली और नलिनी और वैभव की कहानियों का ताला खोल दिया। गोवा से दिल्ली के बीच जहाज़ उड़ता रहा और मैं दो नौजवान की प्रेम कहानी से लेकर उनके सपनों का हमसफ़र हो चुका था।

वैभव स्ट्रक्चरल इंजीनियर है। नलिनी ने कहा कि ये किसी भी बिल्डिंग को देखता है, बस दिमाग़ स्कैन करने लगता है। भूकंप आएगा तो बिल्डिंग इस तरफ़ गिरेगी तो वह बिल्डिंग उस तरह से गिर जाएगी। इस विषय में मेरी भी दिलचस्पी है इसलिए बातें होने लगीं। लोग अब अपने मकानों की फिर से फिटिंग कराने लगे हैं ताकि भूकंप के झटके को बर्दाश्त कर सके। वैभव ने अपने पेशे को काफी गहराई से समझा है।

इसी धुन ने नलिनी के पिता को हां कहने के लिए मजबूर कर दिया कि उनकी बेटी की ज़िंदगी अच्छी कट जाएगी। मैं दोनों के प्यार के बहुत से किस्से जान गया हूं लेकिन लेकिन मैंने वादा किया है कि पब्लिक में क्या लिखना है, इसके पहले मैं अपने विवेक का इस्तमाल करूंगा। एक पत्रकार के लिए जानने और बताने के बीच बहुत सारी जवाबदारियां होती हैं। दोनों ने हां कहा तो ये कहानी अब थोड़ी और आगे चलती है।

वैभव अचानक स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग की तरफ आ गया। इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान मस्ती में डूबे रहने के कारण कई विषयों में फेल हो चुका था।अंतिम वर्ष में पास करने की शर्त लग गई। एक दोस्त को लगा कि वैभव कभी किताबों को नहीं साध सकेगा। इस शर्त ने वैभव की ज़िंदगी बदल दी। उसने इतनी पढ़ाई की कि एक ही बार में सारे विषयों को पास कर गया बल्कि टॉप कर गया। उसी साल वैभव ने गेट का इम्तहान दिया और सिविल इंजीनियर से स्ट्रक्चरल इंजीनियर बनकर निकला।

विस्तारा की उड़ान के बीच मैं किसी के सपने के साथ उड़ान भरने लगा। वैभव अपनी कहानी बता रहा था, नलिनी फिर से उन किस्सों को सुनकर फ़िदा हो रही थी। अभी-अभी शादी हुई है, लाल चूड़ियों से भरे उसके हाथ बता रहे थे। नलिनी ख़ुद भी डिजिटल मार्केटिंग के क्षेत्र का काफी अनुभव रखती हैं। उनसे काफी कुछ जाना कि मीडिया की दुनिया में क्या हो रहा है।

वैभव अपने विषय को, उसके सामाजिक और राजनीतिक इस्तमाल को अच्छी तरह से समझता है। उसके भीतर एक पत्रकार बैठा हुआ है मगर उससे भी ज़्यादा एक आविष्कार। कुछ नया रास्ता खोजने की चाह।

दिल्ली नोएडा के आस-पास मकान बनाने में जो लापरवाही हुई है, वो आने वाले किसी समय में बड़ी आबादी को मौत के मुंह में धकेलने वाली है। वैभव ने बताया कि भारत में ही होता है कि आर्किटेक्ट भी स्ट्रक्चरल क्लियरेंस देता है जबकि यह काम सिर्फ स्ट्रक्चर इंजीनियर का होना चाहिए। उसने बताया कि कई कंपनियों में मेकेनिकल इंजीनियर ही स्ट्रक्चरल इंजीनियर का काम कर रहे हैं। जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए। भारत में उत्तर भारत के इंजीनियरिंग कालेजों से साल में सौ से ज़्यादा स्ट्रक्चरल इंजीनियर पैदा नहीं होते हैं। उस अनुपात में आप देखिए, कितनी इमारतें रोज़ बन रही हैं।

हर सौ साल पर भूकंप का ज़ोरदार झटका आता है, हम सौ साल की सीमा पार कर चुके हैं। कभी भी वह तबाही दस्तक दे सकती है। वैभव ने कहा कि कई बार मकानों को देखकर लगता है कि हमें एक और भुज का इंतज़ार है तभी जाकर हम इमारतों के निर्माम को लेकर सख़्त होंगे। बीच-बीच में भूकंप के झटके आने पर मीडिया हंगामा करता है, लोग बातें करते हैं मगर होता कुछ नहीं है।

वैभव ने रियालिटी सेक्टर के भीतर के ख़तरे को समझ लिया था। समय से पहले ही मंदी देख ली और सोलर सेक्टर में आ गया। कुछ नया करने के उसके जुनून ने उससे वो सब करा दिया जिससे न सिर्फ सोलर सेक्टर की दिशा बदल गई है बल्कि भारत को भी कुछ वक्त के लिए इस सेक्टर का लीडर बना दिया है।

वैभव जिस कंपनी की टीम का हिस्सा था, उसे रीवा में सोलर प्लांट लगाने का ठेका मिलना था। इंजीनियरों की टीम में वैभव अकेला स्ट्रक्चरल इंजीनियर था। वैभव एक खेल समझ रहा था। सौर ऊर्जा संयंत्र लगाने के लिए चीन से सस्ते स्टील का आयात हो रहा था। उसे यह बात ठीक नहीं लगी कि भारत का पैसा चीन जा रहा है। इस प्रक्रिया को रोक नहीं सकता था, बस दिशा बदल दी। वैभव ने दक्षिण कोरिया की स्टील का इस्तमाल कर सोलर प्लांट के ढांचे की लागत को आधा कर दिया। बस अब कंपनियां कोरिया से स्टील मंगाने के लिए दौड़ पड़ी हैं। चीन का रास्ता छोड़ने लगी हैं।

मैं वैभव की हर बात को दिमाग़ में बिठाने लगा कि बस सब लिखना है। अपने पाठकों तक ये सब बातें पहुंचा देनी हैं। उसने बताया कि सोलर प्लांट लगाने के लिए ज़मीन पर स्टील का ढांचा बनता है। एक मेगावाट सौर ऊर्जा के उत्पादन के लिए जो ढांचा बनता है उसका भार पचास टन का होता था यानी उसमें स्टील का प्रयोग बहुत अधिक होता था। वैभव ने ऐसा स्ट्रक्चर डिज़ाइन किया कि एक मेगावाट सौर ऊर्जा के उत्पादन के लिए जो ढांचा चाहिए, उसका भार बीस टन कर देने से काम चल जाता है। इस डिज़ाइन के कारण सोलर ऊर्जा सेक्टर का पूरा व्याकरण बदल गया।

कंपनी ने वैभव को कभी उसका श्रेय नहीं दिया लेकिन एक नौजवान के कमाल से कंपनी को प्रति मेगावाट सौर ऊर्जा के उत्पादन में दो करोड़ की बचत होने लगी। लागत कम हुई तो सौर बिजली की दर भी 5 रुपये प्रति वाट से कम होकर 2 रुपये 97 पैसे प्रति वाट पर आ गई। सरकार ने सौर ऊर्जा को प्रोत्साहित किया कि कंपनियों से 25 साल तक बिजली ख़रीदेगी। लागत कम होने के बाद सरकार कम दरों पर उनसे बिजली ख़रीदेगी और उससे जनता का हज़ारों करोड़ बचेगा।

मैंने वैभव की कहानी उसी की ज़ुबानी सुनी है। वैभव की बातों में ईमानदारी झलक रही थी। कोई चाहे तो उसके दावों की जांच कर सकता है मगर मुझे ज़रा भी शक नहीं हुआ। उसके बात करने के अंदाज़ से लग रहा था कि यह लड़का अपने काम और प्यार को लेकर ईमानदार है। अगर वैभव के इस कमाल से सौर ऊर्जा के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव आया है तो इस युवा इंजीनियर को पद्म श्री तो मिलना ही चाहिए।

वैभव की बातों को सुनकर पत्रकार मन किसी सेक्टर के भीतरी तहों को भी देखने लगा था। मौक़ा नहीं था मगर ऐसा अंदेशा हुआ कि दस साल बाद इस सेक्टर में भी विजय माल्या पैदा होने वाले हैं। यानी इस वक्त तो वो हज़ारों करोड़ का लोन लेकर ऐश कर रहे हैं, बैंकों से लोन के लिए हिसाब किताब में कई गुना का फेरबदल हो जाता है। इस सेक्टर ने जितना लोन लिया है, उसे वापस करना मुश्किल हो जाएगा। बैंक फिर डूबेंगे। यह बात अभी के लिए यहीं रहने दीजिए। दस साल बाद जब ऐसा होगा तो फेसबुक के इस पोस्ट को निकाल कर देखेंगे वर्ना भूल जाएंगे।

मुझे यही अच्छा लगता है। कहानियों तक पहुंचना। वैभव से बहुत बातें हुईं। मैंने उससे बहुत कुछ सीखा और समझा। दिल्ली उतरते ही उसने अपने ज्ञान से मुझे बदल दिया था। मैं बहुत ख़ुश था। जी में आया कि वैभव और नलिनी दोनों को गले लगा लूं। ईश्वर दोनों को हर ख़ुशी और नेक राह पर चलने का हौसला दे। नलिनी से एक वादा किया है कि अपनी कहानी भी उसे कभी बताऊंगा। पहले दुनिया को वैभव आर्या और नलिनी की कहानी बताऊंगा।