चेन्नई की गंदई

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जिस जगह पर करुण नायर तीन सौ रन बनाने की तरफ बढ़ रहे थे उसी चेपॉक से चंद क़दमों की दूरी पर यह आदमी कचरे से गोश्त के टुकड़े उठा रहा था। मैं उसे देखते हुए ख़ुद को देखने लगा। मैं क्या महसूस करता हूँ? पत्थर की तरह जम गया। कुछ महसूस ही नहीं हुआ। किसी होटल के इस झूठन से उठाकर खायाही था कि मेरी नज़र पड़ गई। ऐसी ही तस्वीर किसी ने पटना से भेजी थी। कूड़े के ढेर से उठा कर खाने वाला काश मनमोहन-मोंटेक, बिबेक देबरॉय- पनगढ़िया को जानता होता। ग़रीबी रेखा की सरकारी अवधारणा के नीचे सरक आए ये लोग अर्थशास्त्र की तमाम किताबों के बाहर के हैं जिन्हें किसी संपादक ने बेज़रूरी शब्दों की तरह काट कर अलग कर दिया है। मुझसे एक ग़लती हो गई। इस आदमी से नज़र मिल गई। उसने तो अपनी नज़र झुका ली लेकिन मैं शर्मसार हो गया।

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मैं रविवार सुबह चेन्नई की कुछ गलियों में झाँक लेना चाहता था। स्वच्छ भारत को विज्ञापन पर करोड़ों फूँक देने की कामयाबी के बाद भी कचरा ऐसे ही उठाया जा रहा है जैसे पहले उठाया जा रहा था। चेन्नई ठीक ठाक गंदा शहर है। स्वच्छ भारत के विज्ञापनों ने हमें यक़ीन दिला दिया है कि कचरा लोगों की वजह से है। सरकार की वजह से नहीं। हर राज्य की यही सूरत है। काम कम, विज्ञापन ज़्यादा। सच कम, भांड ज़्यादा।

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आदमी देवताओं को लेकर कचरा बन जाता है। वोट के लिए धर्म के नाम पर एक दूसरे का कचरा बना देता है। इन तस्वीरों में देखिये। निराकार से लेकर साकार हर तरह के देवताओं का आह्वान है। गली के कोने में पेशाब करने वाला किसी भी धर्म का हो सकता है। इसलिए इस तस्वीर में मस्जिद भी है, बुद्ध भी हैं, ईसा भी हैं, हनुमान भी हैं। इस पोस्टर को मैं ऐसे पढ़ना चाहूँगा। सारे देवताओं ने झगड़ना बंद कर दिया है। वे एक होकर धर्म के नाम लड़ने वाले मूर्ख इंसानों को कहीं भी पेशाब कर देने की आदत का मुक़ाबला कर रहे हैं।

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कचरा फेंकने और पेशाब कर देने के राष्ट्रीय आचरण के विरोध में भाई लोगों ने दिल्ली में वहाँ वहाँ देवताओं की तस्वीरें लगा दी हैं जहाँ पेशाब और पीक के निशान हैं। आस्था परेशान नहीं हैं। नगर पालिका फ़ेल हो गई। शौचालय हैं नहीं। इससे पहले कि कोई मूर्ख फिर से लोगों को ही दोष देने लगे, यह बताना ज़रूरी है कि लोग ऐसा करने के लिए मजबूर भी होते हैं। जब शौचालय नहीं होंगे, जब कचरा फेंकने के डिब्बे नहीं होंगे तो वो सिरहाने के नीचे तो यह सब नहीं करेगा। कचरा उठाने को लेकर निवेश नहीं हो रहा है, कचरा न फैलायें इसे लेकर नैतिक शिक्षा दी जा रही है ।