राना अय्यूब की किताब से कौन डर गया ?

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Gujarat Files: Anatomy of a cover up राना अय्यूब की यह किताब आ गई है । इस किताब के आने की ख़ूबी यह है कि इसे कोई आने नहीं देना चाहता था । नहीं चाहने के बाद भी आ गई है । इस देश में कुछ एंकर अभी भी हैं जो सदियों से स्टुडियो की मेज़ पर बैठे हुए हैं । धूप गर्मी बरसात से सुरक्षित ये एंकर सोहराबुद्दीन और इशरत जहाँ मामले में ख़ूब चर्चा किये जा रहे हैं । बीच बीच में नई नई फ़ाइलें खोज लाते हैं । उम्मीद है कि वे इस किताब के बहाने भी गुजरात के फ़र्ज़ी एनकाउंटर की चर्चा करेंगे और राना अय्यूब से ख़ूब कड़े सवाल करेंगे। वैसे मुझे नहीं लगता कि वे चर्चा करेंगे क्योंकि डर एंकरों को भी लग सकता है । हमारे एंकर आपको डरा देते हैं इसीलिए उनको भी डर लगता होगा ।

मैं हमेशा इस एनकाउंटर की गाथा से बचता रहा ,कारण जिन दिनों ये सब मामले होते थे मैं गाँव गली घूम रहा था । अबोध था । आधी अधूरी जानकारी पर लिख देता था, राय बना लेता था । इसलिए उड़ती उड़ती बातें सुनी और जब कभी चर्चा की तो यही सोचा कि जल्दी ख़त्म हो जाए और भागूँ । यह मामला बेहद पेचीदा है इसलिए नहीं बल्कि यह मामला आपसे साहस के साथ साथ घोर जवाबदारी की भी मांग करता है । राना अय्यूब की यह किताब मेरे जैसों के लिए एक मौका है । जिन घटनाओं की चर्चा हम असहाय रूप से देखते रहते हैं और कोई एक तार पकड़ चर्चाओं की शाम की नैय्या पार कर लेते हैं, उनके लिए नए सिरे से जानने का मौका है । कुछ एंकर इसके विशेषज्ञ हैं और कुछ रिपोर्टर भी । शायद उन्हें भी इस किताब से कुछ लाभ मिले ।

इशरत जहाँ और सोहराबुद्दीन का एनकाउंटर आज तक हो रहा है । जाँच एजेंसी और अदालत के बाहर। इस बहस में जाँच एजेंसियों के कुछ मोहरानुमा कर्मचारी भी हैं । जो मीडिया में दावे कर कहीं ग़ायब हो जाते हैं । सरकार बदलती है, बहस का स्वरूप बदल जाता है । जिन रपटों के लिए राना अय्यूब की तारीफ होती थी उन्हें भद्दी गालियाँ दी जाती हैं । लोकतंत्र के सम्मान की नौटंकी कहीं खेली जाती है तो वो अपना देश है । राना अब वांछित नहीं हैं । अवांछित होती जा रही हैं । हिम्मत की दाद मत दीजिये ,किताब ख़रीद कर पढ़ लीजिए कि कोई अब भी नहीं हारा है । अब भी किसी में जुनून बचा है ।

इन मामलों में जेल गए अमित शाह अब बाहर हैं और कांग्रेस जो उन्हें जेल भेज कर शाह बन रही थी अब इसी अमित को साबित नहीं कर पा रही है कि वो अमिट है । अमित कांग्रेस को मिटा रहे हैं और कांग्रेस अमित का इस्तमाल करती रही , अपने दस साल की सरकार में इस केस को अंजाम पर नहीं पहुँचा पाई । कांग्रेस ने अमित शाह की जितनी मदद की है उतनी किसी ने नहीं की होगी । मामले को लटकाये रखा और राजनीतिक इस्तमाल किया ।

फ़र्ज़ी एनकाउंटर के दूसरे नायक हैं आई पी एस वंझारा । वंझारा सालों तक जेल में रहे । जब बाहर आए तो हाल और हुलिया देखकर लगा कि ये जेल नहीं गए थे । जेल में ज़रूर तमाम सरकारों ने अच्छे से रखा था ताकि जब बाहर जायें तो लगे कि लंदन से आ रहे हैं । वंझारा साहब का अहमदाबाद एयरपोर्ट पर तिरंगे के साथ स्वागत हुआ और तिरंगे को लेकर भावुकता पैदा करने वाले संगठन और उनसे सहमत एंकर चुप रहे । मुझे ठीक से याद नहीं मगर राना और कुछ पत्रकारों की घनघोर रिपोर्टिग के कारण कई आई पी एस अफसर जेल भी गए ।

वंझारा अब आसाराम बापू बचाओ अभियान के रास्ते हिन्दू मानस में प्रवेश करते हुए राष्ट्रवाद के नए सिंबल बनने की तैयारी में है । जल्दी आप अपनी राष्ट्रवादी प्यास वंझारा के कार्यकलापों से बुझाते मिलेंगे । मिरींडा बोलेंगे । वे अब संघ की क़समें खा रहे हैं और ऐसी ख़बर भी आई थी कि संघ के कार्यक्रम में गए थे । सदाचारी जीवन जीने वाले संघ को वंझारा जैसों को मान्यता देने में क्या हासिल है मुझे नहीं पता ।

माँ बाप के पैसे को बर्बाद कर तमाम संस्थानों में हिन्दी पत्रकारिता का घटिया अध्ययन करने को मजबूर मासूम छात्रों को एक सलाह है । वे चार पाँच सौ रुपया और बर्बाद करें और इस किताब को पढ़ें । ख़ासकर लड़कियाँ ज़रूर पढ़ें ।यह समझने के लिए कि खोजी पत्रकारिता कैसे की जाती है और लोगों ने कैसे किया है । हिन्दी में इस तरह की सघन रिपोर्टिंग के उदाहरण कम हैं । हर छात्र के कमरे में ये किताब होनी चाहिए । वहाँ भी जहाँ के वाइस चांसलर छात्रों को राजनीतिक वैचारिक प्रशिक्षण दे रहे हैं । रात को छिप कर पढ़ लेने से विद्यार्थी कम से कम शैली और साहस का अंदाज़ा कर सकते हैं और अपनी इस शैली का लाभ उठाकर उन दलों की किसी कारस्तानी का खुलासा कर सकते हैं जिनका विरोधी उनका वीसी और शिक्षक है । इससे जनता का ही भला होगा । वैसे इन दिनों सत्ता-संस्थान विरोधी पत्रकारिता की जगह विपक्ष विरोधी पत्रकारिता की खूब वाहवाही हो रही है !

हताश करने वाली बात यह है कि एक नागरिक के नाते हमारे पास कोई ऐसी एजेंसी नहीं है जिसकी जांच पर यक़ीन कर पाते और समय पर फ़ैसला हो जाता । काश हम सही सही जान पाते कि कौन दोषी है या नहीं । यह किताब हरेन पांड्या की हत्या की परतों को भी उधेड़ने का दावा करती है । जब पांड्या की हत्या हुई थी तब उनकी पत्नी और पिता खूब टीवी पर आकर मोदी और न जाने किस किस को कोसते थे । जब ख़बर आई कि उनकी पत्नी बीजेपी में शामिल हो गईं हैं तो मैं सिहर गया । अनुराग कश्यप की गुलाल फ़िल्म घूमने लगी और सोचता रहा कि क्या उन्हें सही में पश्चाताप हुआ होगा कि भावावेश में आकर कई नेताओं को बेवजह हत्या का आरोपी बताया या ….मुझमें न तो साहस है और न जिज्ञासा की आगे की पंक्ति भर दूँ । इसलिए चार बिन्दू लगाकर छोड़ दिया ।

देर रात तक राना अय्यूब ख़ुद इस किताब की हार्ड कापी पर स्टिकर लगाती रहीं । किसी ने छापा नहीं तो राना ने ख़ुद छाप दिया है । अकेले जोखिम लेना और फूँक फूँक कर कदम रखना आसान नहीं है । राना और उनके परिवार के लोग भयंकर तनाव से भी गुज़रे होंगे। अकेले तनाव और जोखिम भरे इस काम ने थका दिया होगा । इसीलिए लोकार्पण के एक दिन पहले राना को बुख़ार भी हो गया है । भयंकर तरीके से क़ानूनी परीक्षण किया है क्योंकि इसकी जानकारी देश के दो ताक़तवर लोगों को परेशान कर सकती है । पिछले पाँच छह सालों से राना गुजरात की अपनी रिपोर्टिंग के दौरान जुटाए दस्तावेज़ों को लेकर घूम रही थीं । तब तो मोदी सरकार नहीं थी । फिर भी किसी ने उनसे ये दस्तावेज़ नहीं माँगे और किसी ने छापा नहीं । अच्छा ही हुआ क्योंकि तब आरोप लगता कि कांग्रेस के इशारे पर छापा है लेकिन ये सवाल उठना चाहिए कि कांग्रेस फिर कैसे अलग थी । यूपीए के कथित रूप से उदार ज़माने में न तो किसी ने छापा न किसी ने कार्रवाई की ।

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तो मित्रों शुक्रवार यानी 27 मई को दिल्ली के इंडिया हैबिटेट सेंटर के अमलतास हॉल में इसका लोकार्पण है । शाम छह बजे । 295 रुपये की यह किताब ई-बुक की शक्ल में आ गई है। अमेजन और फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध है इसलिए कई लोगों के हाथ पहुँच गई है ।आप शाम छह बजे हैबिटेट जाकर राना को ज़रूर सुनिये । हरतोष सिंह बल और राजदीप सरदेसाई ने उनके साथ बात करने का साहस जुटाया है । वेबसाइटों में कारवाँ , वायर और स्क्रोल ने इसके बारे में छापा है । बातचीत और लोकार्पण का साहस उठाने वाले कारवाँ का शुक्रिया । बाकी सबके लिए आमीन ।