हम भारत के हिंसक लोग

भारत की आत्मा भटक रही है। जाने कब उसने स्वर्ण युग देखा लिया था,जिसके लौटा लाने के लिए जब तब कोई घुड़सवार तलवार लेकर आ जाता है और ललकारने लगता है। कोई उस युग में लौटा ले जाने का ख़्वाब दिखाता है तो कोई उस युग को दोबारा क़ायम कर देना चाहता है। इस भटकती हुई आत्मा के पास घोड़ा एक ही है। समय-समय पर घुड़सवार बदल जाते हैं। भारत को इसी भटकती हुई आत्मा की आह लग गई है। जिसके कारण हम और आप हिंसा की बात करने वाले नायकों के पीछे खड़े हो जाते हैं। हम सबको वह स्वर्ण युग चाहिए जो कभी था ही नहीं। भारत के अतीत का आदर्शवाद इतना एकतरफा है, कई बार लगता है कि उस स्वर्ण युग में कभी किसी ने झूठ ही न बोला हो, किसी की हत्या न की हो, कोई प्रपंच न हुआ हो। जो भी था, दैवीय था। ऐसा कालखंड इस धरती पर सिर्फ भारत में ही हुआ और कही नहीं हुआ। अंहिसा की बेहतर समझ के लिए ज़रूरी है कि हम हिंसा को बेहतर तरीके से समझें। हिंसा को लेकर ईमानदार हों।

प्राचीन भारत का महिमामंडन आज तक जारी है। आज़ादी की लड़ाई के दौर में हुआ। वर्तमान इतना खोखला हो चुका था कि अतीत से आत्मबल तलाशने की होड़ सी मच गई । आज़ादी के बाद प्राचीन भारत को समझने के कितने ही गहन प्रयास हुए मगर उन सबको कभी मार्क्सवादी तो कभी राष्ट्रवादी, कभी दक्षिणपंथी तो कभी वामपंथी कह कर ख़ारिज किया जाने लगा। इतिहास की धाराओं का आपसी टकराव धर्म के नाम पर मूर्खतापूर्ण धारणाओं के लिए जगह बनाता रहा। राजनीतिक सत्ता के समर्थन से धर्म का चोला ओढ़े लोग प्राचीन भारत के बारे में कुछ भी एलान कर सकते हैं। उस एलान में अंतिम सत्य होने का दावा भरा रहता है। उसका इतना प्रभाव रहता है कि आप बी डी चट्टोपाध्याय,सुविरा जयसवाल, के एम श्रीमाली , डी एन झा, रामशरण शर्मा,रोमिला थापर, कुमकुम रॉय, कुणाल चक्रवर्ती, नयनजोत लाहिरी, उपिंदर सिंह जैसों को पढ़ने से पहले उन्हें रिजेक्ट करने लगते हैं। वैसे उनका लोहा मानने वाले भी कम नहीं हैं। क्लास रूम में इन्हीं का काम बोलता है।

पोलिटिकल वॉर रूम में इन्हीं को चुनौती दी जाती है। इनके लिखे और इनके दिए संदर्भों को लेकर नहीं बल्कि सरकार के दम पर। इतिहास को पढ़ना हमेशा किसी नतीजे पर पहुँचना नहीं होता है बल्कि उस समय देखना और जानना होता है। पढ़ने से जो बचते हैं वही पढ़े लिखे को सिरे से ख़ारिज कर देते हैं। इन दिनों प्राचीन भारत का आदर्शवाद फिर से थोपा जा रहा है। एक प्रधानमंत्री का उदय हुआ है जो ख़ुद भी और उनके प्रभाव से अन्य जन भी प्लास्टिक सर्जरी से लेकर पुष्पक विमान तक को तमाम वैज्ञानिक खोजों पर थोप देते हैं। प्राचीन भारत की वैज्ञानिकता भी उसी तरह संदिग्ध और अधूरी है जिस तरह प्राचीन भारत के दर्शनों और सामाजिक यर्थाथ का आदर्शवाद, उनका महिमंडन अधूरा है।

आज़ादी की लड़ाई के दौर में गांधी, सावरकर, अंबेडकर, नेहरू सबने प्राचीन भारत से आदर्शवाद उठाया। अपने अपने प्रभावों का विस्तार किया और दुनिया के सामने एक आदर्शवादी प्राचीन भारत की रुपरेखा रखी जिसके गर्भ से अहिंसा, सहिष्णुता का मध निकलता है, जो दुनिया में कहीं और नहीं है। इस बात को लेकर बहस हो सकती है और इसमें दम भी है कि इन सभी की सोच सिर्फ प्राचीन भारत की धाराओं से प्रभावित नहीं थी। पश्चिम की अनेक धाराएं और उस समय का यथार्थ भी इन्हें अहिंसा के तरफ देखने के लिए इशारा कर रही थी।
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इतिहासकार उपिंदर सिंह की एक किताब आई है। उसी के संदर्भ में यह सब बातें कर रहा हूं। किताब का नाम है Political Violence in Ancient India. हावर्ड यूनिवर्सटी प्रेस ने छापी है और 598 पन्नों की इस किताब की कीमत है 45 अमरीकी डॉलर। भारतीय रुपये में कीमत का पता नहीं चल सका। मैं किसी भी किताब के बारे में लिखते समय प्रकाशक, कीमत और पन्नों की संख्या ज़रूर लिखता हूं। ताकि पढ़ने के बाद लोग न पूछें कि कितने की है और कहां से ख़रीदें। इसके बाद भी लोग यह सवाल करते हैं। इस किताब को उसे पढ़ना चाहिए जो हिन्दू मुस्लिम बहस को दूर से देख रहा है। जिसकी प्राचीन भारत में दिलचस्पी है। वो तो कभी नहीं पढ़ेगा जो हिन्दू-मुस्लिम डिबेट सिर्फ एकतरफ़ा मक़सद से करता या करवाता रहता है।

यह किताब प्राचीन भारत में हिंसा और अहिंसा को लेकर विमर्श की जड़ों की तलाश करती है। देखने की कोशिश है कि कब और कहां से अहिंसा के तत्व हावी होने लगते हैं। इसी के साथ उपिंदर सिंह ने हिंसा के तत्वों को भी सामने लाने का प्रयास किया है ताकि हम उस दौर की हिंसा और उसके स्वरूप को समझ सकें। राज्य सत्ता के दायरे में हिंसा का स्वरूप अलग अलग रहा है। किताब का पहला चैप्टर राजगीर और वैशाली से शुरू होता है। मगध की राजधानी राजगीर जो न सिर्फ राजनीतिक सत्ता का केंद्र था बल्कि त्याग और अहिंसा पर ज़ोर देने वाले विचारकों का भी गढ़ रहा है। हम कम ही बात करते हैं कि शुरूआती दिनों में पुत्र ने कुर्सी के लिए पिता की हत्या तक की है। बिंबसार की हत्या अजातशत्रु ने की। उसके बाद के चार उत्तराधिकारियों को भी पितृहंता कहा गया है। पितृहंता मतलब पिता की हत्या करने वाला। हरयांका वंश (HARYANKA DYNASTY) का अंत लोगों ने किया। उसके राजा को कुर्सी से उतार दिया औऱ उसके सिपाही शिशुनाग को गद्दी सौंप दी। यह हिंसा का दूसरा स्वरूप है। जनता भी राजा तय करती थी। शिशुनाग वंश का अंत हिंसा से होता है और उसकी जगह नंद वंश आता है। जो ख़ुद को संपूर्ण क्षत्रियों का संहारक घोषित करता है। मौर्य वंश भी पारंपरिक और कुलीन क्षत्रियों या सत्ताधारी वर्ग को पलटते हुए अपनी राज्य और सैन्य सत्ता का विस्तार करता है। उपिंदर सिंह इन सब किस्सों को हिंसा के संदर्भ में देखती है। समझना चाहती है कि इन सबके बीच हिंसा और अहिंसा को लेकर किस तरह का नज़रिया समाज से लेकर राजसत्ता तक उभर रहा है।

उनका कहना है कि छठी और पांचवी ईसा पूर्व की सदी से हिंसा और अहिंसा को लेकर होने वाली बहसें मुखर होने लगती हैं। इसी कालखंड में प्राचीन भारत के विचारों का इतिहास सबसे अधिक उर्वर था। धर्म का मतलब भी समय के साथ बदलता है। पहले धर्म कर्मकांडीय क्षेत्र तक सीमित था फिर इसे राजनीतिक तौर पर देखा जाने लगा और उसके बाद नैतिक तौर पर। इस दौर में सत्ता और ज्ञान को लेकर ख़ूब बहस होती है। इतनी कि उसकी निशानी या फिर वो बहसें आज तक चली आ रही हैं। यहीं से भारतीय संस्कृति में त्याग को लेकर काफी ज़ोरदार बहस होने लगती है। त्या के मतलब में शामिल था सत्ता और अर्थ के मोह को छोड़ देना। अंहिसा को लेकर भी बहस होती है। इतिहासकार उपिंदर सिंह खोज रही हैं कि हम कहां से हिंसा के महिमामंडन की आलोचना के सूत्र खोज सकते हैं और कहां से देख सकते हैं कि हिंसा से विरक्ति हो रही है और अहिंसा का आदर्श स्थापित हो रहा है।

इसके तीन जवाब है। वैदिक मत के भीतर भी अहिंसावादी का पता चलता है। ग़ैर वैदिक संत परंपरा में, जिसे जैन और बौद्ध परंपरा कहा जाता है, अंहिसावादी मतवालंबी मिलते हैं। एक तीसरी धारा है जो ब्राह्मणवादी, बौद्ध और जैन परंपरा के समानांतर विकसित होती है। मैं अभी इस किताब को पढ़ रहा हूं। यह किताब प्राचीन भारत के प्रति हमारी समझ को समृद्ध करती है। समृद्ध करने का मतलब यह नहीं कि एक पक्ष की जीत और एक पक्ष की हार का एलान करती है। बल्कि बताती है कि जीवन को इस तरह देखा ही नहीं जा सकता है। जीवन को ही नहीं, अपने इतिहास को भी नहीं। जो ऐसा नहीं करते हैं वही अतीत पर अपनी नासमझी थोप देते हैं और भारत की आत्मा को बेचन कर देते हैं।

समाज के भीतर हिंसा की परंपरा को समझना चाहिए तभी हम आज के संदर्भ में सत्ता के हिंसक चरित्र को समझ सकते हैं। हमारे समाज में जातीय हिंसा का अमानवीय चक्र आज भी जारी है। सत्ता के हिंसक किस्सों को हम भोग रहे हैं मगर बोलते समय अपनी राजनीतिक निष्ठा का ज़्यादा ख़्याल रखते हैं। जी एन साईबाबा को नक्सल समर्थक होने के आरोप में जेल में बंद किया गया है। उन्होंने अपनी पत्नी को पत्र लिखा है कि उनके साथ ऐसा बर्ताव हो रहा है जैसे कोई जानवर अपने अंतिम दिनों में तड़प कर मरने के लिए छोड़ दिया जाता है। जीएन साईंबाबा 90 फीसदी विकलांग हैं। आप दिव्यांग कह लीजिए तो इस ईश्वर के वरदान के साथ ये बर्ताव हो रहा है कि सर्दी से कांप रहा है मगर कंबल नहीं दिया जा रहा है। एक पक्ष यह है। दूसरा पक्ष यह होगा कि आप कहेंगे कि नक्सलवादियों ने जवानों को मारा जिनका कोई कसूर नहीं था। एक तीसरा पक्ष यह है कि आदिवासियों के साथ राज्य सत्ता ने हिंसा की, उन्हें बेदखल कर उनकी ज़मीन और संपत्ति बड़े औद्योगिक घरानों को सौंप दी। हिंसा का यह चक्र तीनों दृष्टि से क्रूर है। एक चौथा पक्ष है, यही सत्ता पक्ष जवान से लेकर नागरिक जिसे जब चाहे उठाकर जेलों में बंद कर सकता है और आपको वर्षों कोर्ट के चक्कर लगवा सकता है।

हम सब हिंसा के शिकार हैं। हम हर तरह की हिंसा के प्रति सहनशील हो चुके हैं। बुद्धिहीन हो चुके हैं। हम सब हिंसक हैं और हिंसा के चक्र में ही जीने के लिए अभिशप्त हैं। इसलिए अंहिसा का गुणगान करने से पहले उस हिंसा का चेहरा देख लीजिए जो हम सबका है। हिंसा को सहना भी हिंसा है। हिंसा को होते हुए देखना भी हिंसा है। हिंसा करने वाले राज्य का अहिंसा का ढोंग करना भी हिंसा है। आप यह किताब अपनी दिलचस्पी को ध्यान में रखते हुए पढ़ सकते हैं। हमने जो उदाहरण दिए हैं वो पूरे नहीं हैं। करीब 600 पन्नों की किताब के बारे में राय उसे पढ़ने के बाद ही बनाइये न कि मेरी समीक्षा के बाद। आलस्य भी हिंसा है दोस्त।