अर्थशास्त्र का मर्म समझना ज़रूरी है मगर पढ़ना पड़ेगा दोस्तों

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“हम क्या चाहते हैं कि अर्थशास्त्र क्या करे? मेरा ख़्याल है कि हम चाहते हैं कि अर्थशास्त्र इतना करे कि अर्थशास्त्र से रहस्य का आवरण हटा दें! जब मीडिया बताए कि अमुक व्यक्ति एक महान अर्थशास्त्री है और जब वह कहता है कि 6 प्रतिशत बजट घाटा देश के लिए बहुत गंभीर मुद्दा है, तो हमारी तैयारी होनी चाहिए कि इस पर सवाल उठाएं। यह उन बकवासों का एक उदाहरण है जिनके बारे में आपके पास यह बौद्धिक होसला होना चाहिए कि बग़ैर गहन तर्क या प्रमाण के आप समझ सकें कि यह बकवास है। एक मशहूर अर्थशास्त्री ने कहा था कि अर्थशास्त्र एक महत्वपूर्ण विषय है; उसके कारण नहीं जो इसके अंतर्गत पढ़ाया जाता है बल्कि इसलिए कि यह आपको अन्य अर्थशास्त्रियों द्वारा उल्लू बनाए जाने से बचाता है। “

कस्बा के पाठक उपरोक्त पंक्तियों को दो बार पढ़ें। मैंने इसे अमित भादुड़ी के एक व्याख्यान की भूमिका से आपके लिए हु-ब-हू उतारा है। मध्यप्रदेश के एकलव्य प्रकाशन ने इसका हिन्दी अनुवाद छापा है जिसका नाम है, अर्थशास्त्र का मर्म क्या है? विश्व पुस्तक मेले के हॉल नंबर 18 से मैंने यह पुस्तिका 25 रुपये में ख़रीदी है। 2010 में अमित भादुड़ी ने एन सी ई आर टी में व्याख्यान दिया था। अमित भादुड़ी अर्थशास्त्री हैं। मुमकिन है कि अमित भादुड़ी वामपंथी अर्थशास्त्री हों लेकिन इसके बाद भी हिन्दी के पाठकों को नोटबंदी के दौर में अर्थशास्त्र का मर्म पकड़ने वालों को 39 पन्नों की यह पुस्तिका पढ़नी चाहिए। www.eklavya.in इसका पता है। हिंदी के पत्रकार इसे ज़रूर पढ़ें। हो सकता है पेशे में काम न आये लेकिन फेसबुक पर पोस्ट लिखने में मदद मि सकती है।

नोटबंदी के कारण हम हिन्दी के पत्रकार भी बुरी तरह बोल्ड हुए हैं। आम दर्शक या पाठक को लगता है कि न्यूज़ रूम विशेषज्ञों का अड्डा है। उसे जल्दी ही इस भ्रम से बाहर आ जाना चाहिए। पिछले दस साल में न्यूज़ रूम के भीतर की हर संस्था कमज़ोर नहीं हुई है, बल्कि पूरी तरह से ग़ायब कर दी गई है। मीडिया के साथी सहयोगी पत्रकार भी अंग्रेज़ी अनुवादों को लिये अपनी समझ बना रहे थे। उनमें मैं भी शामिल हूं। इस बार मुझे यह कमी काफी चुभी। ज़ाहिर है इसे संस्थागत रूप से दूर नहीं कर सकता। व्यक्तिगत रूप से दूर करने का काफी प्रयास किया लेकिन नोटबंदी की व्यापकता को समय के साथ नहीं पकड़ सका। मेरे ज़हन में बिल्कुल साफ समझ है कि मेरा काम लिखने के बाद समाप्त हो जाता है। हम आपसे या किसी से पूछ कर लिख सकते हैं। बोल सकते हैं। इसके बाद हमारा काम बंद।

सुपर एंकर मॉडल की यही बड़ी कमी है। आपको एक महीने में यूपी का भविष्यवक्ता बनना होता है तो एक दिन में अर्थशास्त्री। पहले के न्यूज़ रूम में चंद मुख्य विषयों के लिए अलग अलग लोग होते हैं। इस बार बहुत कोशिश की। बिजनेस अख़बारों को पढ़ा। विदेशों में रहने वाले लोगों से पूछा। अंग्रेज़ी के अख़बारों और वेबसाइट ने बेहतर सामग्री छापी। सरकार को उनसे कोई फर्क नहीं पड़ा क्योंकि उसे पता है कि आम जनता को अंग्रेज़ी अख़बारों के लेखन नहीं पहुंचते हैं। हिन्दी के अख़बारों की भूमिका बेहद सतही रही। उसने जानबूझ कर जनता को बारीकियों से अनजान रखा और नारों की रिसाइक्लिंग की। thewire.in, scroll.in, moneylife.in, quint और epw.in पर जाकर देखिये और फिर आप जो अख़बार लेते हैं, दोनों की सामग्री की तुलना कीजिए। आपको पता चलेगा कि आपका अख़बार किस तरह आपको अंधेरे में रखता है।

मैं ख़ुद आर्थिक ख़बरों से भागता था। बजट आते ही लगता था कि जैसे तैसे दिन कट जाए। इसलिए आप हिन्दी चैनलों पर बजट कवरेज देखेंगे तो सिर्फ सस्ता महंगा के ग्राफिक्स होंगे। ये हिन्दी पत्रकारिता का विकास क्रम है और इसके लिए हिन्दी भाषी युवा चार चार लाख रुपये देकर फर्ज़ी पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे हैं। ख़ैर नोटबंदी के दौरान लगा कि काश इन मुद्दों को समझ पाता या समझने वालों को करीब से जान पाता। हिन्दी के चंद पत्रकारों ने सरलता से समझाया भी लेकिन वो भी व्यक्तिगत स्तर पर ज़्यादा ही लिखा। इसलिए विश्व पुस्तक मेले में अमित भादुड़ी की यह पुस्तिका ले आया हूं। इस तरह की कोई किताब दक्षिणपंथी अर्थशास्त्री भी लिखे तो उसे भी पढ़िये मगर दोनों की चालाकियों को पकड़ना बहुत ज़रूरी है। वामपंथियों के डराने से मत डरिये। दक्षिणपंथ को भी जानिये। इसके लिए ज़रूरी है कि हम आर्थिक मसलों के करीब जायें। भागे नहीं।

“यह जानना ज़रूरी है कि कहां अर्थशास्त्र और विचारधारा आपस में घुल-मिल जाते हैं। समस्त सामाजिक विज्ञानों का लक्ष्य व्यक्ति को ख़ुद की विचारधारा की बुनियाद के प्रति सचेत करना है। आपके पास ऐसी कोई चीज़ तो हो नहीं सकती जो पूरी तरह निष्पक्ष हो या तकनीकी हो, इसलिए आपके पास यह बौद्धिक ईमानदारी होनी चाहिए कि आप जान सकें कि कहां आप अपनी विचारधारा को प्रवेश करा रहे हैं। और इसका सबसे पहला परीक्षण है संख्याओं की समझ। मेरा आशय नफीस सांख्यिकी से या आर्थिक मापन विज्ञान( इकोनोमेट्रिक्स) से नहीं है। दरअसल अधिकांश समय भारतीय आंकड़े ज़्यादा उपयोगी नहीं होते, सिवाय पर्चे प्रकाशित करने और प्रोफेसर का पद पाने के लिए! हकीकत में, अर्थशास्त्र में प्रयुक्त अधिकांश गणित से आपकी कुशलता ही ज़्यादा झलकती है, इसका किसी नई सूझबूझ या बेहतर समझ में कोई योगदान नहीं होता। “

यह पुस्तिका शिक्षकों के लिए लिखी गई है कि वे अर्थशास्त्र को किसके लिए और किस तरह से पढ़ायें। अर्थशास्त्र की कलाबाज़ियों को हमें समझना ही होगा। हालात बदल नहीं रहे हैं। हालात दूर करने के नए नए उपकरण लाये जाते हैं और कुछ साल बाद समस्याएं वहीं की वहीं रहती हैं। इस बीच आपका पर्यावरण और बर्बाद हो चुका होता है। आप राजनीति में कई बार ठगे जा चुके होते हैं। बेहतर है कि इस पुस्तिका को पढ़ डालिये और पता कीजिए कि और क्या पढ़ा जा सकता है। मेहनत तो करनी होगी। भले ही इसका श्रेय नरेंद्र मोदी को ही क्यों न मिले। मिलने दीजिए। खेल समझना है तो खेल के नियम जान लीजिए। आर्थिक नियमों का फैसला चुनाव के गणित से किया जा रहा है।अपनी भूमिका में अमित भादुड़ी ने लिखा है और जिसे शब्दश:उतारकर मैं यह लेख समाप्त करता हूं।

“ मैं बोद्दिक दृष्टि से ईमानदारी बरतना चाहूंगा और कहूंगा कि गणित चीज़ों को कहीं अधिक पैनेपन से प्रस्तुत कर सकता है। यह आपको कोई नई चीज़ नहीं देगा मगर गैर-सटीक सोच के जालों को ज़रूर हटा सकता है। गणित आपको ऐसी कोई बात नहीं बताता जिसे आप शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकते, गणित जो कहता है वह बात वही होती है मगर कहीं ज़्यादा सटीक रूप में। अलबत्ता लफ्फाज़ी की तुलना में तार्किक सोच सब लोगों के लिए एक जैसी ही होती है। मगर कुछ मामलों में गणित आपको झांसे देना भी सीखाता है। “