मुरादाबाद में मुक़ाबला: विलायती बनाम बादशाही दवाखाना

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मुरादाबाद की दीवारों पर लिखे नारों से सावधान। आपको भ्रम हो सकता है कि यहाँ मुक़ाबला सपा, बसपा और भाजपा के बीच नहीं है बल्कि गुप्त रोग का प्रकट इलाज करने वाले बादशाही दवाखाना और विलायती दवाखाना के बीच है। चुनाव आयोग ने दीवारों पर लिखे तमाम दलों के नारों को पुतवा दिया है। लिहाज़ा नेताओं से ज़्यादा सेक्स समस्या को दूर करने वालों के घोषणापत्र लाल और नीली स्याही से लिखे नजर आते हैं। मुरादाबाद स्टेशन रोड की दीवारों से लगा कि सेक्स रोग महामारी की शक्ल ले चुका है या ये हो सकता है कि दवाखाना वाले ही महामारी बन चुके हैं।
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सेक्स रोग को पहली बार किसने गुप्त रोग कहा होगा, मालूम नहीं चला। ज़रूर पाश्चात्य संस्कृति से लड़ने वाला योद्धा रहा होगा जिसने कुछ रोगों को गुप्त घोषित कर उसे ग़ैर पश्चिमी दवाओं से दूर करने का बीड़ा उठाया होगा। उसी प्रथम योद्धा के संघर्ष का परिणाम है कि आज भारत की रेल यात्रा गुप्त रोग दूर करने वाले शफ़ाखानो और दवाखानों के बिना पूरी हो ही नहीं सकती है। इन डाक्टरों को भी सम्मानित किया जाना चाहिए। जो रोग गुप्त होते हैं उनका ये इलाज पूरी दुनिया में एलान करके करते हैं। ये कम बड़ी साहस की बात नहीं है। ये न होते तो आज लाखों भारतीयों के गुप्त रोग गुप्त ही रह जाते। मुझे इन हकीमों पर गर्व है। क्या कोई एम बी बी एस की डिग्री वाला डाक्टर इस तरह अपने पड़ोस में एलान कर सकता है कि सेक्स रोगी तुरंत मिलें। पड़ोसी को दूसरे मोहल्ले के डाक्टर के पास जाने की ज़रूरत नहीं है। उनका इलाज वही करेंगे। बहुत कम ऐसे डाक्टर मिलेंगे ।
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मेरठ से लेकर मुरादाबाद स्टेशन के बाहर की दीवार पर एक के बाद एक दवाखानों के विज्ञापन इस तरह से लिखे गए हैं जैसे गुप्त रोग दूर करने की कोई स्पेशल रेलगाड़ी चलाई गई हो। बहुत दूर तक इनके विज्ञापन ख़त्म ही नहीं होते। विलायती और बादशाही नाम मुझे दिलचस्प लगा। लगता है असली मुक़ाबला इन्हीं दो के बीच है।

जिस तरह से इतिहासकारों ने कालखंड को ईसा पूर्व और ईसा पश्चात में विभाजित किया है, उसी तरह गुप्त रोग को शादी से पहले और शादी के बाद में बाँटा गया है। एक नया विभाजन और दिखा गुप्तरोगी स्त्री और गुप्तरोगी पुरुष। शर्तिया की जगह पूर्णतया इलाज आ गया है। धर्मनिरपेक्षता का संकट यहाँ भी है। शफ़ाखाना मतलब हकीम होंगे, दवाखाना मतलब वैद्य होंगे। हिन्दू मुस्लिम सेक्स रोगियों ने अपने अस्पतालों का बँटवारा बिना किसी सांप्रदायिक दंगे के ही कर लिया है।
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नवाबों जैसी ताकत पायें, विलायती दवाखाने के इस नारे से अचंभे में पड़ गया। ये कौन सी ताकत है जिसे पाने के लिए विलायती जी मुरादाबाद की दीवारों को रौशन कर रहे हैं। नवाबों की हवेलियाँ या तो खंडहर हो गईं या हेरिटेज होटल में बदल गईं। मगर उनकी इस ताकत का राज़ मुरादाबद के विलायती दवाखाना वालों को कैसे पता चला, यह अलग से शोध का विषय है। नवाबों जैसी ताकत पर ज़्यादा ज़ोर देने से इलाके का सांप्रदायिक माहौल बिगड़ सकता है। कोई ज़मींदारों, सामंतों जैसी ताकत दिलाने का दावा कर सकता है।

सेक्स रोग अगर भयावह स्तर पर है तो यह चुनावी मुद्दा बिल्कुल होना चाहिए। इसे गुप्त रोग के स्टेटस से आज़ाद कराने की ज़रूरत है। सेक्स एजुकेशन का विरोध होता रहेगा, लेकिन दीवारों पर सेक्स रोग की समस्या भी प्रकट होती रहेगी। रोगियों की कितनी प्रताड़ना होती होगी। दवाखाने तक पहुँचने से पहले सौ मौतें मरते होंगे। यह सरकारों की नाकामी है कि उनके अस्पतालों ने ऐसे विज्ञापन नहीं लगाए कि सेक्स की समस्या एक सामान्य बीमारी है। आप सदर अस्पताल के चीफ़ मेडिकल अफसर से मिलें, वही औपचारिक इलाज करेंगे। दीवारों पर लिखे ये
नारे समाज की कुंठाओं की बुलंद तस्वीरें हैं।