गेस्ट ब्लॉग : विज्ञापन के इस दौर में गारंटी की इच्छा ?

यह पोस्ट नितिन भाटिया नें लिखा है ।आज देश एक नए राजनीतिक दौर से गुजर रहा हैं। नरेंद्र मोदी का राष्ट्रीय राजनीति में आगमन और उसके आसपास के सभी क्रिया-कलाप एक नयी तरह की राजनीति की तरफ इशारा करते हैं। पहली बार भाजपा ने चुनावी मौसम में सिर्फ देश और प्रगति की ही बात की। परन्तु क्या इतना काफी हैं ? क्या यह देखना हमारी ज़िम्मेदारी नहीं है कि आखिर बात क्या कही गयी हैं ? क्या इतना काफी हैं कि जो बात देश के सन्दर्भ में कही गयी हैं, वो बाकि सभी तरह की चुनावी तिकड़म, जो जाति, धर्म, संप्रदाय आदि के भरोसे चलती थी, से ऊपर हैं। शायद एक मायने में ये सही हैं कि सभी तरह की बकवास को हटाकर अब सिर्फ देश की बात हो रही हैं। यह एक आशावादी संकेत हैं। हालांकि सिर्फ खूँटा बदलने से बात बन सकती हैं क्या? या हमें ये भी देखना पड़ेगा की खूँटे से बंधी गाय को कहीं वही पुराना चारा तो नहीं दिया जा रहा हैं। जरा सोचने की कोशिश करते हैं। नरेंद्र मोदी ने खुँटा बदला। सभी तरह के मतभेदों से ऊपर उठकर देश के लिए बात की। पर क्या बात की ? चलिए देखते है।

अगर देश का प्रधानमंत्री यह खुद कहे की पता नहीं हैं कि विदेशों में कितना काला धन हैं तो बात कुछ हज़म नहीं होती। इसमें कोई आपत्तिजनक बात नहीं हैं कि प्रधानमंत्री ने सीधे जनता से सामने अपना सच रखा हैं। पर कहीं अगली बात यें तो ना होगी कि जितना हमने काला धन सोचा था, या बखान किया था, उतना हैं ही नहीं, या फिर हम ला नहीं सकते हैं। अगर यही बात सीधे कही जाती तो काफी बवाल हो जाता। परन्तु अगर भविष्य में ऐसी कोई बात आती हैं तो प्रधानमंत्री अपने सही इंटेंशन का हवाला देते हुए पतली गली से निकल लेंगे। कहीं प्रधानमंत्री की अनभिग्यता उस पतली गली के निर्माण की ओर पहला कदम तो नहीं। वैसे भी किसी न्यूज़ चैनल ने ये भी चलाया था की काले धन की सूचीं में किसी भी राजनीतिक दल के नेता का नाम नहीं है। और तो और बहुत से एकाउंट्स में तो ज़ीरो बैलेंस हैं। ये पता नहीं की इन न्यूज़ चैनल्स के पास ये खबर कहाँ से आई हैं। अब ये तो वक्त ही बताएगा की क्या सही हैं और क्या गलत।

दूसरी तरफ प्रधानमंत्री ने अपने सही इंटेंशन का प्रमाण देते हुए “स्वच्छ भारत अभियान” भी चलाया हैं। इंडियन एक्सप्रेस में काफी पहले छपे एक लेख से पता चला की इससे पहले भी “निर्मल भारत अभियान” चलाया गया था। लेकिन उस अभियान के लिए काम करने वाला कोई नहीं था। क्या अभी के हालात कुछ भिन्न हैं? प्रधानमंत्री से ये पुछा जाना चाहिए कि अगर जनता अपने घर के आगे की सड़क को खुद साफ करे तो कचरा कहाँ फेंके ? दूसरी सड़क पर ? क्या एक “लोगो” और “स्लोगन” बनाने से और कुछ चुनिंदा हस्तियों के एक बार सड़क साफ कर देने से भारत साफ हो जायेगा ? मैं कुछ ही दिनों पहले रेल के सफर के दौरान अहमदाबाद स्टेशन के प्लेटफार्म पर उतरा। बिलकुल साफ था। थोड़ी नज़र दौड़ाई तो देखा कि हर दस कदम पर एक कचरे का डब्बा हैं। क्या ऐसा कुछ पूरे भारत में जरुरी नहीं हैं ? क्या कचरे का डब्बा बनाना, जो भारत की हर गली और मोह्हले में होना चाहिए, रोजगार उत्पन्न कर सकता हैं ? क्या टेक्नोलॉजी की बात करने वाले प्रधानमंत्री को “मेक इन इंडिया” में कुछ ऐसी मशीनों के बारे में भी सोचना चाहिए जो की भारत की सफाई की जरुरतो को भी पूरा करें ?

अब प्रधानमंत्री की तरफ से सफाई अभियान शायद खत्म हो चुका हैं। या जब थोड़ा और गुडविल बनाना होगा तो फिर से चलेगा। खैर, कोई बूढ़ी अम्मा इस बात से जरूर खुश होएगी की देश का प्रधानमंत्री भी इस बात से चिंतित हैं की पूरा मोहल्ला बार-बार उसके मना करने के बाद भी उसी के घर के आगे कचरा फेंक देता हैं। अब कम से कम वो कचरा जल्दी तो उठेगा चाहे उस कचरे का स्थान न बदले।

मैं तो राजनीति और गाय के चारे के बारे में लिख रहा था। फिर ये काला धन और कचरा कहा से आ गया ? भाई साहब, ये चारा ही तो हैं जो जनता के आगे परोसा गया हैं। खूँटा बदलने से जनता खुश तो हैं परन्तु यह कहना कठिन हैं की जनता को कब समझ में आएगा की चारा वही पुराना हैं। वैसे ये एक अलग बात है की कई विश्लेषकों ने प्रधानमंत्री की तुलना इंदिरा से करनी शुरू कर दी हैं। फिर भी अगर एक राजनेता कचरा उठाने का भी इवेंट बना के गुडविल कमाता हैं तो क्या कहने। मैंने यहाँ प्रधानमंत्री को राजनेता लिखा हैं क्योंकि वो हैं। अगर देश का प्रधानमंत्री स्वछ भारत के लिए खड़ा हो जाये और उसके लिए कोई स्थाई काम करने की बजाय जनता से यह कह दे की अब बापू आप लोगो को देख रहे हैं, आप अपना गली, मौहल्ला सब साफ करें – तो इसे किस नज़र से देखा जाये । तो क्या प्रधानमंत्री ने कोई गलती की ? नहीं । परन्तु परेशानी यह हैं की प्रधानमंत्री ने सिर्फ इतना ही किया और इसका राजनैतिक लाभ भी ले लिया। अभी मेरी समझ के बाहर हैं की इसे किस तरह की राजनैतिक श्रेणी में रखा जाये। शायद कोई सरकारी प्राणी जब दस साल बाद एक किताब लिखेगा तो ही इन सब बातो का जिक्र करेगा। प्रधानमंत्री ने यहाँ एक शासक से ज्यादा एक सुधारक का काम किया। परन्तु सुधारक का काम आसान नहीं होता। एक सुधारक को सिर्फ एक इवेंट नहीं करना होता – पूरे जी जान से काम में लगना भी होता हैं – जो अभी प्रधानमंत्री की तरफ से नहीं दिख रहा हैं।

तो क्या सच में हमारी राजनीति खूँटा बदलकर ऊपर उठी हैं। मेरे ख्याल से विज्ञापन के इस दौर में जनता को गारंटी की इच्छा नहीं करनी चाहिए।