गेस्ट ब्लॉग : विदेशो में अच्छे दिन

यह पोस्ट क़स्बा के पाठक कुमार गौरव नें लिखा है ।

बचपन में जब देश के मुखिया किसी विदेश दौरे पर जाते थे तो अनायास ही एक प्रकार की उत्सुकता आ घेरती थी की कैसा होगा विदेश। दूरदर्शन के प्रसारण पर हमारे देश के नेता का हवाई जहाज से उतर कर विदेशी राजनयिक का अभिवादन स्वीकारते हुए नज़र आना ही उस पुरे दौरे का संक्षेपण होता था। और हम उतने में ही रोमांचित हो जाते थे। हमारी परिकल्पना में एक संजीदा और अगर्व माहौल समाहित होता था और लगता था बाप रे कितनी बड़ी बात है की हमारे देश के राजनेता इतनी दूर जाकर देश-विदेश के हितों की चर्चा कर रहे हैं।

आज के टी वी जगत नें दूरदर्शन के उस छणिक प्रसारण को बिलकुल बदल दिया है और अब तो भ्रमण के कई दिन पहले से ही सब कुछ लाइव होता है। उस नीरस दूरदर्शन के मुकाबले एक बड़ा बदलाव तो ज़रूर आया है मगर यह भी लगता है की विदेश से प्रसारण के नाम पर हमें कुछ भी दिखाया जाता है।

आज सवेरे जब मैं दफ्तर गया तो लोग ये कहते नहीं थक रहे थे की कल मोदी के कार्यक्रम का अमेरिका से सीधा प्रसारण देखा। ये होता है पी.एम ! एक अजीब सा उन्माद था सबके अंदर। भारतीय हित और भारत के संदर्ब कौन सी बातें सामने आई भले यह कोई नहीं समझा पा रहा था मगर उस कार्यक्रम की रूप रेखा, डांस, हॉलीवुड के हीरो, उस शानदार मंच को याद करते हुए सब लोग गर्वान्वित महसूस कर रहे थे।

ज़हन में एक सवाल यह भी आया की यह विदेश दौरा उस रंगा रंग कार्यक्रम के परिपेक्ष में महत्वपूर्ण था या वैश्विक अस्तर के उन महत्वपूर्ण मुद्दो के परिपेक्ष में जिनकी चर्चा संयुक्त राष्ट्र जेनेरल असेंबली व अन्य देशों के साथ होने वाला द्विपक्षीय वार्ता में होने वाली थी। इस दौरे और इससे पहले हुए अन्य विदेश दौरों में भी प्रधानमंत्री कार्यालय के संस्थागत ढांचे के अंतर्गत होने वाले बातों की प्रस्तुति भी थोड़ी अटपटी लगी थी। ऐसा लगा की एक ख़ास रणनीति के अंतर्गत बातों को व्यक्तिवाचक संज्ञा में ही प्रस्तुत किया जा रहा है और यह दौरा देश के प्रधानमंत्री का नहीं बल्कि किसी व्यक्ति का निजी दौरा हो जो प्रधानमंत्री भी है। भले हम जैसे आम लोग इसको लेकर कुछ न कर पाये मगर ऐसा प्रतीत हुआ की मोदी या उनकी टीम फिर से उसी मूर्तितल की स्थापना कर रहे जिसे ढाह कर मोदी प्रधानमंत्री के कुर्सी पर आसीन हुए हैं।

इस विदेश दौरे के चंद दिन पहले हमारे देश के कई लोग कश्मीर में आये भारी प्राकृतिक तबाही की वजह से मारे गए या फिर विस्थापित हो गए। ठीक उस समय जब वह रंगारंग कार्यक्रम चल रहे थे तब असम में कई हज़ार घर भारी बाढ़ के वजह से तबाह हो रहे थे। उनके गृह प्रदेश (जहाँ से उन्होंने लोकसभा का चुनाव लड़ा था) में सांप्रदायिक हिंसा भड़क रही थी। यह मुमकिन है यह सारे रंगारंग कार्यक्रम पहले से तयशुदा होंगे मगर सवाल तो यह भी उठता है की क्या देश के अगुआ होने के नाते हमारे प्रधानमंत्री को इन घटनाओं को लेकर थोड़ा और संवेदनशील नहीं होना चाहिए था। यह कौन सा राष्ट्रवाद है ? क्या इतनी संख्या में अपने नेता को देखने आये हमारे अप्रवासी भारतीयों से बिना नाच गाने के या थोड़ी सादगी के साथ सामाजिक सौहार्द बनाने, प्राकृतिक आपदा के दौरान सहयोग, और देश के गरीबी उन्मूलन में एक सक्रिय प्रतिभागी बनने की अपील नहीं की जा सकती थी। क्या देश का कोई अन्य नेता इतनी बेबाकी से इतनी जटिल परिस्तिथियों में सहज हो जाता और सेलिब्रेट कर लेता । क्या नेहरू या सरदार पटेल या वाजपेयी यह कह पाते की मेरे खून में पैसा है ?

शायद उससे भी बड़ा सवाल यह उठता है की एक कठिन दौर से गुज़रते हुए गरीब देश के मुखिया का इस विलासता वाला स्वरुप विश्व मंच पर हमारे देश की कैसी छवि बनाएगा।  खासकर तब जब गरीबी और महंगाई अपने चरम पर हो और हमारे समाज का एक बड़ा वर्ग दाने दाने को मोहताज़ हो।

बातों के लिहाज से महत्ता अभी भी उसी दीनता की है जहाँ से मोदीजी नें अपनी शुरुआत की थी मगर ऐसा लगता है वास्तविक महत्ता उन पूंजीपतियों की है जिनके साथ वह नाश्ता करते हैं।

अगर कोई मेरी लेखनी पढ़ रहा हो तो प्रधानमंत्री तक मेरी यह बात पहुँचा दें की कभी आम लोगों के साथ भी नाश्ता करिये। हमने आपको बड़े उम्मीदों के साथ वोट दिया है, हमारी आकांक्षाओं की प्रासंगिकता आपके सजावटी व्यवहार से कम हो रही है।