लैला मैं लैला लैला.. यूपी की लैला

लैला मैं लैला…ऐसी हूँ लैला…हर कोई चाहे…मुझसे मिलना अकेला…

इतिहास ही नहीं गाने भी ख़ुद को दोहराते हैं। गाना मुंबई में गाया गया लेकिन दिल्ली में सुनते वक्त ख़्याल यूपी का आता रहा। राजनीति में एक फ़ाइल बनी है । जिसके पन्ने उड़ाते लैला गा रही है। पत्रकार कैशलेस जाम पीये जा रहे थे। समर्थकों की आँखों से ख़ूं निकल रहा है जो अब विमुद्रीकरण के कारण भाप में बदल चुका है। अँधेरा घना है मगर रौशनी के धुँधलेपन में राजनीति का नंगापन साफ दिख रहा है। लैला गा रही है…

जिसको भी देखूँ…दुनिया भुला दूँ…मजनूं बना दूँ…ऐसी मैं लैला

ये कैसे हैं लम्हें जो इतने हँसी हैं
मेरी आँखें मुझसे ये क्या कह रही हैं
तुम आ गए हो यक़ीं कैसे आए
दिल कह रहा है तुम्हें छू के देखूँ

राजनीति में भी आइटम सिंह होते हैं। क़त्ल नहीं हुआ है। ये क़त्ल का शाट खेला गया है। महीनों पहले इसकी स्क्रीप्ट लिखी जा रही थी तब कोई गुप्तचर उसमें अपनी लाइनें जोड़ रहा था। कोई अधिकारी था जो उसकी फ़ोटोकॉपी करवा रहा था। यूपी चाहिए। यूपी का किंग कौन! भीखू म्हात्रे । पर वो तो मुंबई का किंग है। कट। डायरेक्टर चीख़ता है। मुंबई का किंग अब यूपी वापस चाहता है। यूपी वापस चाहता है? स्क्रीप्ट राइटर अपना लैपटॉप उन लोगों को देकर चला जाता है। लो तुम्हीं लिखो।

फ़िल्म के शाट में कोई है जो सबकी निगाहों से बचके पाइप पी रहा है। मेरी नज़र बार बार उसी पर जाती है। मैं उस तक पहुँच नहीं पाता हूँ । डिस्कों का धुआं है। ऊपर से पाइप का धुआं। मालूम नहीं कौन किसको उड़ा रहा है। कोई है जो बेहद ख़ौफ़ में है। उसे लैला से डर लग रहा है। कहीं उसके पन्ने लोगों के हाथ लग गए तो ? किसको फ़िकर है। किसका ज़िकर है। ऐसी है लैला । कैसी है लैला ।

जो हो रहा है वो पहले कहीं हो चुका है। वो इसी वक्त कहीं और भी हो रहा है। तीन तीन जगहों पर एक साथ हो रहा है। मगर लैला है कि सिर्फ मुंबई में गा रही है। उसकी धुनों पर बाकी क्यों थिरक रहे हैं! काहे बता दें, किसको बता दें, कर ले तू जो भी, करना है लैला… तेरा ज़माना, तेरा ख़ज़ाना है, जिसको भी चाहे, नाचेगा लैला….. वाल्यूम हाई करो ।