कब तक छुपेगी बेरोज़गारी, फर्ज़ी सरकारी आंकड़ों से

हाल के दिनों में बेरोज़गारी बढ़ी है। यह अच्छी ख़बर है क्योंकि इससे पता चलता है कि श्रम भागीदारी दर ( labour participation rate) बढ़ रही है। यह कहना है CMIE के महेश व्यास का। यह संस्था रोज़गार के सवाल पर नए नए आंकड़ें पेश करती रहती है और इसकी मान्यता भी है। अप्रैल 2017 से बेरोज़गारी की दर 4 प्रतिशत से कम रही है। किसी भी परिपक्व अर्थव्यस्था में इस दर का यही मतलब निकाला जाता है कि पूर्ण रोज़गार की स्थिति है। लेकिन हमारे यहां पूर्ण रोज़गार नहीं है। पूर्ण रोज़गार का मतलब परमानेंट नौकरी न समझें।

श्रम भागीदारी दर मतलब वे सभी व्यस्क जो काम करना चाहते हैं। चाहें नौकरी हो या न हो। जनवरी 2016 में यह अनुपात 48 था। नवंबर 2016 में घटकर 45 हो गया। जुलाई 2017 में घटकर 43 हो गया है। विश्व बैंक के अनुसार दुनिया के सिर्फ सात देश ऐसे हैं जिनके यहां श्रम भागीदारी दर 43 है। इराक, सीरिया, मोल्दोवा, पुएर्तोरिको, समोआ, जोर्डन, और तिमोर-लेस्ते। नाम भी नहीं सुना है इनका। अब भारत की तुलना इनसे होने लगी। महेश व्यास जी इस दर के सहारे दुनिया में भारत की रैकिंग गिनते हैं.। हम चीन से बहुत ऊपर हैं।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की तुलना करें को श्रम भागीदारी दर चिंताजनक तस्वीर पेश करती है। हम काफी ख़राब स्थिति में हैं। इस हिसाब से भारत का औसत 54 है। भारत जैसे निम्न मध्यमवर्गीय आय वाले देश में भी इस दर का औसत 58 प्रतिशत है। पाकिस्तान भी हमारे बराबर है। इंडोनेशिया हमसे ऊपर है। महेश जी का यह तर्क तो पहली बार सुन रहा हूं। अजीब है। मगर जानकारी और समझ न होने के कारण खारिज नहीं कर रहा हूं। उनका कहना है कि अगस्त के महीने में श्रम भागीदारी दर और घटने वाली है। मतलब यह हुआ कि ज़्यादा से ज़्यादा लोग काम नहीं करना चाहते हैं। ये अलग बात है कि उन्हें नौकरी मिलती हैं या बेरोज़गार रह जाते हैं। बेरोज़गारी दर क्या है। श्रम बाज़ार में कितने बेरोज़गार हैं, उसका अनुपात है।

2016 के पहले नौ महीने में बेरोज़गारी की दर आठ से नौ प्रतिशत थी। यानी भयावह स्थिति थी। उसके बाद यह सात फीसदी पर आई और जुलाई 2017 में 3.3 प्रतिशत हो गई है। अगस्त के महीने में बेरोज़गारी की दर फिर से बढ़ने लगी है। पहले हफ्ते में 3.5 फीसदी थी, दूसरे हफ्ते में 4.5 फीसदी थी। तीसरे हफ्ते में 4.6 फीसदी हो गई। जुलाई 2017 में श्रम भागीदारी दर घटकर 43 हो गई थी, उसका औसत अगस्त के पहले तीन महीने में 44 हो गया।

महेश व्यास कहते हैं कि बेरोज़गारी का बढ़ना चिंताजनक है मगर श्रम भागीदारी दर का बढ़ना उम्मीद जगाता है। रोज़गारहीन ग्रोथ टिकाऊ नहीं हो सकता। न ही होना चाहिए। श्रम भागीदारी दर कम होने से ग्रोथ रेट ज़्यादा हो सकती है। जिस पर हम गर्व कर सकते हैं। बेरोज़गारी की घटती दर के साथ विकास की उच्च दरों को लंबे समय तक बरकरार नहीं रखा जा सकता है। इसे कम आय के आधार पर सही ठहरा सकते हैं मगर भारत कब तक इस तर्क से बेरोज़गारी दर को जायज़ ठहराता रहेगा कि भारतीय ग़रीब हैं, वे ज्यादा देर तक बेरोज़गार नहीं रह सकते, काम खोज ही लेंगे। 25 साल से भारत की अर्थव्यवस्था बढ़ रही है। ऐसी अर्थव्यवस्था में कब तक यह बात सही कही जाएगी।

अगर श्रम भागीदारी दर लगातार कम होती रहे, तब ग्रोथ रेट का बढ़ना संभव नहीं हो सकता है। क्यों इतने सारे भारतीय काम नहीं करना चाहते हैं? अपने लेख में महेश व्यास यह सवाल करते हैं। क्यों भारतीय सरकारी नौकरी ही पसंद करते हैं? मेरी राय में आज के दौर में यह एक बकवास तर्क है। लोगों को जहां काम मिलता है, करने जाते हैं। जवाब यही है कि सरकार की नौकरी स्थायी होती है। जब नीति आयोग का चेयरमैन रहते हुए अरविंद पनगढ़िया पक्की नौकरी के लिए मां भारती की सेवा छोड़ सकते हैं तो ज़रूर पक्की नौकरी में कुछ बात होगी।

महेश व्यास कहना चाहते हैं कि भारतीय आलसी होते हैं और दूसरे के भरोसे ज़िंदा रहना चाहते हैं। मुझे यह बात नहीं जमी। उनके अनुसार समस्या यह है कि अच्छी नौकरी नहीं है, जहां प्रतिभा का इस्तमाल हो सके। जहां काम करते हुए कोई प्रतिष्ठा प्राप्त करे। अगर ऐसी नौकरियां ज्यादा संख्या में उपलब्ध हों तो भारतीय ज़रूर काम करना चाहेंगे। लेबर मार्केट में आएंगे और श्रम भागीदारी दर बढ़ने लगेगी।

मैंने बिजनेस स्टैंडर्ड में छपे इस लेख का हिन्दी में अनुवाद किया है ताकि हिन्दी के पाठकों तक ऐसी सूचनाओं और विश्लेषण पहुंचे। इसके लिए कुछ नहीं मिलता मगर इस प्रक्रिया में मैं ख़ुद भी सीखता हूं। आपके जवाब से भी नए नए दृष्टिकोण मिलते हैं। हो सकता है अनुवाद सही न हुआ हो इसलिए 22 अगस्त के बिजनेस स्टैंडर्ड में महेश व्यास के लेख को ज़रूर पढ़ें।