कविताएं आपको बुलाने आईं हैं, यहीं दिल्ली के त्रिवेणी कला संगम में

“हम एक तरह की गोदामियत की गिरफ़्त में है: यह विश्वास विश्वव्यापी हो रहा लगता है कि संसार विचारों से नहीं, चीज़ों से बदला जा सकता है। आज के संसार में कोई बड़ा सपना नहीं है, सिर्फ दुस्स्वपन हैं या कि टुच्चे सपने। हम बहुत अधिक बात कर रहे हैं, एक तरह की संवाद-रति है लेकिन दरअसल शब्दों का टोटा पड़ रहा है। मीडिया और टैक्नालजी भाषा के व्यापक वितान, उसकी भरपूर जीवन्तता, सघनता और ब्यौरों को बेहद संकुचित कर रहे हैं।“ (अशोक वाजपेयी)

मीडिया हम सबको भाषाविहीन कर रहा है। सौ पचास शब्दों और वाक्यों के स्थूल संसार में हमें फंसा कर हमारी भावकुताओं को कुंद कर रहा है। यह बात आज नहीं समझ सकेंगे। यह बात कल भी समझ नहीं आएगी। मीडिया और उसके सहोदर हम सभी को बारूद में बदल रहे हैं। हम कभी भी कहीं भी भड़क सकते हैं। कोई हमसे जल कर मर सकता है और हम किसी और से जल कर मर सकते हैं। टीवी के सामने और फोन में सर गड़ाये लोगों को ग़ौर से देखिये। नफ़रत से हमें इतनी मोहब्बत कभी नहीं रही। हम नफ़रतों का बचाव कर रहे हैं। इस यक़ीन से भरे पड़े हैं कि नफ़रतें ही हमें बचा सकती हैं। मोहब्बत करना दुर्बलता है। नफ़रत करना संस्कृति की रक्षा है।

मैं यह बात अख़लाक़ या पेहलू ख़ान की तरफ़दारी में नहीं कह रहा हूं। उस भीड़ की तरफ़दारी में कह रहा हूं जिसमें आप शामिल हैं, जिसके साथ आप खड़े हैं। वो भीड़ जब किसी एक को मारती है तो उसमें शामिल सौ से दो सौ लोग हत्यारे हो जाते हैं। हत्यारों की सामाजिक और पारिवारिक प्रतिष्ठा कभी नहीं रही। आज है। मरने वाले की संख्या तो दो ही है, इतनी कम संख्या को सरकार और अख़बार नोटिस भी नहीं लेते। छोटी ख़बर है! मगर हम इस बात की भी नोटिस नहीं ले रहे हैं कि दस-बीस, सौ-पचास की संख्या में नौजवान हत्यारे हो रहे हैं। नित्य आक्रामकता का अभ्यास चल रहा है। इस आक्रामकता के लिए ज़रूरी है कि हथियार मारक हों। शब्द हथियार की तरह लिखे जा रहे हैं। मीडिया और उसके सहोदर तमाम मीडिया में आप देख लीजिए। अपना ही लिखा हुआ पढ़ लीजिए। वो जो भीड़ से लौट कर घर आता है, हत्या के गुनाह को किस खूंटी पर टांग कर भोजन करता होगा, किस पानी से पांव धोकर बिस्तर पर सोने जाता होगा। हत्यारों का सामाजिकरण हो रहा है। हमारे अपने जो भीड़ में जाकर हत्यारे बन रहे हैं, राजनीतिक दल जिनका इस्तमाल कर रहे हैं, हम उनकी भी चिन्ता नहीं करते हैं।

इसलिए नहीं करते हैं क्योंकि हमारे पास शब्द और भाव नहीं हैं। मीडिया, धर्म और राजनीति ने जब से अपनी शब्दावली का एकीकरण किया है तब से सार्वजनिक और व्यक्तिगत स्पेस में भाव और शब्द की घोर कमी हो गई है। हमारे पास अब जो भी शब्द हैं वो मीडिया और उस नियंत्रण करने वाले राजनीतिक गिरोहों के दिये हुए शब्द हैं। आप उन्हीं की शब्दावली में सोच रहे हैं। आप उन्हीं के जैसा सोच रहे हैं। बोल रहे हैं। आप जो तटस्थ हैं, दरअसल आप भाषा और विचार से अपदस्थ हैं। घटना कोई भी हो, पात्र कोई भी हो, टीवी और राजनीति की भाषा अब एक है। सेट है। सबकुछ उसी में फिट होना है। लगातार हमारी सोच की कटाई छंटाई चल रही है। जल्दी ही हम अपने घरों में किसी का परिचय कराने लगेंगे, मिलिये इनसे फलां भीड़ में ये भी गए थे और दो चार को मार कर लौटे थे क्योंकि तब तक हमारे पास हत्यारों की निंदा के शब्द और भाव भी नहीं रहेंगे। ज़ाहिर है हम उनकी तारीफ़ करेंगे।

इसलिए कविताओं ने बुलाया है तो ज़रूर जाइयेगा। मंडी हाउस के पास है त्रिवेणी सभागार वहां वाक 2017 का आयोजन हो रहा है। शुक्रवार यानी आज शाम पांच बजे से शुरू होगा और शनिवार और रविवार तक चलेगा। तीन दिन के लिए असमिया, उड़िया,बंगाली, गुजराती, कन्नड़, कश्मीरी, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, पंजाबी,तमिल, तेलुगू, अंग्रेज़ी, उर्दू और हिन्दी के कवि जुट रहे हैं। शनिवार और रविवार को सुबह साढ़े दस बजे से ही कविताएं बोलने लगेंगी। चर्चा भी होगी और पाठ भी होगा। अलग अलग भाषाओं के कवियों को सुनिये, अलग अलग भाषाओं को महसूस कीजिए कि वहां कितना कुछ अब भी बचा हुआ है। मैंने तो कविता का ऐसा सम्मेलन कभी देखा नहीं। सुना भी नहीं। तीन दिनों तक चलेगा यह सम्मेलन। रज़ा फाउंडेशन ने इसका आयोजन किया है। अशोक वाजपेयी ने सबको आमंत्रित किया है।

बुझ रहे हैं चिराग़ दहरो हरम,
दिल जलाओ के रौशनी कम है

इस मौके पर कवियों और कविताओं का जो संकलन छपा है, शानदार है। एक ही किताब में भारत की अलग अलग भाषाएं हैं। शब्द हैं। अलग-अलग कवि हैं। 43 कवियों की रचना है इसमें। 200 पन्नों के इस संकलन पर दाम तो नहीं लिखा है लेकिन जाइयेगा तो इसे ख़रीदने या मांगने की ज़िद मत छोड़ियेगा। इस किताब की कोई योग्य ही समीक्षा करे। फ़िलहाल मैं इसकी सुंदरता पर फ़िदा हूं। आपके लिए किताब की तस्वीर लगा रहा हूं।
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गाज़ापुर के अभिषेक शुक्ला की ग़ज़ल इसी किताब से आपके लिए कापी की है।

हर्फ़ लफ़्ज़ों की तरफ़ लफ़्ज़ मआनी की तरफ़
लौट आए सभी किरदार कहानी की तरफ़
उस से कहना कि धुवां देखने लायक होगा,
आग पहने हुए जाऊंगा मैं पानी की तरफ़
पहले मिसरे में तुझे सोच लिया हो जिसने
जाना पड़ता है उसे मिसर-ए-सानी की तरफ़
हम तो इक उम्र हुई अपनी तरफ़ आ भी चुके,
और दिल है कि उसी दुश्मन-ए-जानी की तरफ़

अशोक वाजपेयी ने इस आयोजन की मंशा के बारे में लिखा है कि भारत में राजनैतिक स्वतंत्रता मिलने के बहुत पहले से कविता स्वतंत्र थी। बांग्ला,उर्दू, पंजाबी और सिन्धी भाषाओं ने एक तरह से देश का बंटवारा स्वीकार ही नहीं किया। कविता कलप्ना का वह गणतंत्र है जहां महत्व मानवीयता का है, जाति-आस्था-विश्वास-विचारधारा आदि का नहीं। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने कहा था कि एक छोटी सी मोमबत्ती भी संसार को आलोकित करती है। कविता छोटी नहीं बड़ी मोमबत्ती है जो संसार को आलोकित करती है और इस अंधेरे समय में संसार को ऐसे आलोकन की ज़रूरत है। तो कुर्सी छेक लीजिएगा त्रिवेणी कला संगम में। 205,तानसेन मार्ग पर है। मंडी हाउस के पास ही है।