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  • इस दिल्ली को भी दिल्ली समझे कोई

    इस दिल्ली को भी दिल्ली समझे कोई

    एक-दूसरे की नैतिकता और ईमानदारी को खोखला साबित करने का दौर आज समाप्त हो गया। एक और चुनाव मुद्दों पर खुलकर चर्चा करने का मौका गंवाकर जा रहा है। रैलियों और विज्ञापनों में लाखों रुपये फूंक दिए गए। एक से एक पंच लाइनों के ज़रिये एक दूसरे को धराशायी करने का सुख सब लेते रहे। बेतुके बयानों पर टीवी पर घंटों बहस चली। हासिल क्या होने जा रहा है। किसी की हार या जीत के अलावा इस चुनाव का हासिल क्या है।


  • कहां गई वो दिल्ली ?

    कहां गई वो दिल्ली ?

    भावना का नाम निर्भया नहीं है लेकिन उसके साथ निर्भया जैसा ही हुआ है। निर्भया भी दिल्ली में मार दी गई और भावना भी इसी शहर में। अब तो दिल्ली को इस बात से गुस्सा भी नहीं आता है कि इस साल के दस महीनों में बलात्कार के 1700 से भी ज्यादा मामले दर्ज हुए हैं। यही वो वास्तविकताएं हैं जिनके चश्मे से लगता है कि सबकुछ नौटंकी है। क्या ये सब चुनाव के लिए था।


  • डाक्टर हर्षवर्धन हाज़िर हों

    डाक्टर हर्षवर्धन हाज़िर हों

    क्या डाक्टर हर्षवर्धन अपनी चुप्पी तोड़ेंगे कि दिल्ली में अपनी भूमिका को लेकर वो क्या सोचते हैं। क्या वो पहले की तरह आश्वस्त हैं। क्या वो दिल्ली बीजेपी का नेतृत्व करना चाहते हैं। इन सब सवालों के लिए डाक्टर को हाज़िर होना होगा।


  • गेस्ट ब्लॉग : अनजानों से संवाद

    गेस्ट ब्लॉग : अनजानों से संवाद

    व्यक्तिगत तौर पर लगता है की इस नयी बदलती दुनिया में हम अपनों के पास होने के बावजूद पास वालों से दूर होते जा रहे हैं। एक तरफ हम कम्युनिकेशन एरा में जी रहे हैं और दूसरी तरफ संवाद भी नहीं कर रहे हैं। पता नहीं हम क्या बनना चाहते हैं और क्या बनते जा रहे हैं। शायद एक सतत इंसान बनने से अभी कोसों दूर हैं।