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  • गेस्ट ब्लॉग : बर्तनों की अदला-बदली

    गेस्ट ब्लॉग : बर्तनों की अदला-बदली

    महानगर में रहते रहते यह सब कहाँ छूट गया। मेरा गाँव जैसे मेरे भीतर से बहार निकल रहा था। मुझे ऐसा लगा जैसे मैं किसी नए समाज में खड़ा था। बर्तनों की दुनिया मुझे घेरे खड़ी थी। सामाजिक सरोकारों के ये कौन से पैमाने थे ? जहाँ अपनापन एक कटोरी कढ़ी, एक लोटा आटा, और शगुन के कुछ रुपये के मजबूत आधार पर खड़ा हैं।