सोमनाथ मंदिर पर हमले की कहानी की दूसरी कड़ी

अल-बरूनी ने लिखा है कि सोमनाथ में मंदिर महमूद ग़ज़नी के हमले से सौ साल पहले बन चुका था। एक क़िले के भीतर था जो तीन तरफ से समुद्र से घिरा था। समुद्र की लहरें लिंग तक पहुंचती थीं, जिसकी व्यापारी और नाविक पूजा करते थे। महमूद ने उसे तोड़ा और काफी लूट-पाट की। उस दौरान सिंध और कच्छ में कई लिंग मंदिर थे मगर सोमनाथ सबसे महत्वपूर्ण था। अल-बरूनी महमूद का कोई दरबारी नहीं था,उसने लिखा है कि हमले के बाद सोमनाथ के आस-पास की अर्थव्यवस्था तबाह हो गई।
रोमिला थापर इसे स्वीकार नहीं करती हैं। कहती हैं कि इसके कोई प्रमाण नहीं हैं बल्कि बाद के कई सौ साल तक यह इलाका मुख्य व्यापारिक केंद्र रहा और खाड़ी के देशों से व्यापारिक नाता बना रहा। अपनी किताब के पहले चैप्टर में इसे विस्तार से बताया भी है।

बहुत से भारतीय थे जो महमूद के अभियान को मदद भी कर रहे थे। उसके लिए सेनापति बनकर लड़ रहे थे। रोमिला थापर अपनी इस बात के समर्थन में फुटनोट्स में उस किताब का नाम भी दिया है जहां से उन्हें यह बात पता चली है। A K S Lambton- Continuity and change in Medieval Pesia, ,aspects of administrative, economic and social history.

हम अक्सर इन रिश्तों को धार्मिक और व्यापारिक हितों से समझते हैं मगर वास्तविकता इतनी जटिल है कि बहुत रिश्तों को समझना मुश्किल हो जाता है। महमूद की महत्वकांक्षाओ को समझना होगा। वह भारत ही नहीं बल्कि अफगानिस्तान और मध्य एशिया में भी अपना विस्तार कर रहा था। रोमिला कहती हैं कि वह भारत में क्यों हमले कर रहा था इसे समझने के लिए ज़रूरी है कि हम यह भी देखें कि सीमा के उस पार क्या हो रहा था और महमूद क्या कर रहा था। बेशक महमूद मर्तियों को ध्वंस कर रहा था,यह उसके अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा भी था मगर दूसरे कारण भी उतने ही महत्वपूर्ण थे।

तुर्क चरवाहे थे, लूट-पाट उनके लिए सामान्य बात थी। पहले वे मवेशियों को लूटा करते थे,अब शहरों में जमा संपत्ति लूटने लगे। जैसे ही घुड़सवारी की तकनीक बदलती है, हमला करने की प्रवृत्ति बदल जाती है। इस बारे में अशोक यूनिवर्सिटी के प्रत्यय नाथ का बहुत अच्छा काम है जो बताते हैं कि कैसे इकॉलजी के कारण काठी और साज़ के कारण घुड़सवारी बदल जाती है। यही बदलाव तुर्कों में बेहतर सैन्य कौशल लाता है। वे घोड़े पर सवार होकर बेहतर तरीके से शत्रुओं पर हमला कर सकते थे। ध्यान रहे कि वहां के वातावरण में कुछ ऐसा हुआ था जिसके कारण घोड़े की सवारी की तकनीक बदली थी न कि धार्मिक या सैन्य विस्तार के कारण यह बदलाव आया था।

तुर्क से पहले भारत और ईरान तक के बीच कई नस्लों के लोगों की आवाजाही थी। ग्रीक,आकेमेनिड, सेल्युसिड, शक, पार्थियन, हून, कुषाण आ जा रहे थे। कश्मीर के ललितादित्य ने तुख़ारा पर विजय प्राप्त कर लिया था। तुख़ारा तुर्कों से संबंधित था। बाद के कश्मीरी राजाओं ने यहीं से अपने लिए तुर्क सैनिक भर्ती किए थे। घुड़सवारी की क्षमता के कारण उनका ख़ासा आकर्षण था। कश्मीर का गंधार और तोख़ारिस्तान तक का रिश्ता था। यहां के लोग भाड़े पर किसी की सेना के लिए काम करते थे। उनका कोई धार्मिक मकसद नहीं था। भारत के इतिहास में इसके अनेक उदाहरण मिलेंगे।

इसी में एक समूह उभरा जिसने अपनी बहादुरी को धार्मिक महत्व देना शुरू कर दिया। मारे गए लोगों की शहाद को यादगार बनाने के लिए ग़ाज़ी कहा जाने लगा। मरने से पहले ये फ्रीलांस सैनिक की तरह किसी के लिए लूट-पाट करने के लिए तैयार रहते थे। बहुत से ग़ाज़ी महमूद की सेना में भर्ती हुए क्योंकि भारत पर आक्रमण से काफी आमदनी होने लगी थी। ये ग़ाज़ी भारत के साथ घोड़े का व्यापार भी करते थे। मंदिरों को लूट कर ग़ज़नी अपने साम्राज्य की आर्थिक ताकत बनाए रखता था। रोमिला थापर कहती हैं कि बहुत तो नहीं,उसकी सेना में भारतीय सैनिक भी थे।

भारतीय सिपाहियों को Suvendhray कहा जाता था। ये महमूद के प्रति निष्ठावान थे। भारतीय सिपाहियों का अपना कमांडर होता था जिन्हें सिपहसलार-ए-हिन्दुआं कहा जाता था। उनका अलग बैरक होता था जहां वे अपनी आस्था का पालन करते थे। एक बार एक तुर्क सेनापति ने बग़ावत कर दी तो उसकी जगह हिन्दू को सेनापति बना दिया। महमूद के प्रति निष्ठावान होने के कारण उसकी तारीफ़ होती थी। एक बार महमूद से शिकायत की गई कि सियस्तान में महमूद की तरफ से लड़ते हुए हिन्दू सेनापति ने मुस्लिमों और क्रिश्चियन को भी मार दिया। शायद वे शिया मुस्लिम थे।

ग़ज़नवी साम्राज्य का अपना सिक्का भी था। उत्तर-पश्चिम भारत के लिए ग़ज़नवी ने सिक्का जारी किया था जिस पर अरबी और शारदा लिपि में लिखा होता था। महमूद के सिक्कों पर नंदी बैल, श्री सामंत देव की तस्वीर बनी होती थी। लाहौर के पास मिले एक दिरहम यानी सिक्के पर संस्कृत में क़लमा लिखा था। लूट-पाट से ग़ज़नी में काफी समृद्धि आई।

रोमिला कहती हैं कि सोमनाथ पर महमूद ग़ज़नी का हमला एक तथ्य है लेकिन यह देखा जाना चाहिए कि उसने हमला क्यों किया। क्या किसी धार्मिक नफ़रत से या फिर लूट-पाट के इरादे से क्योंकि वह अन्य इलाकों में भी इसी तरह हमले कर रहा था और शियाओं को मार रहा था। फिर सोमनाथ की घटना को अलग-अलग सदी में अलग-अलग ग्रंथों में क्यों अलग-अलग तरीके से कहा गया है, उनमें क्यों इनता अंतर और अतिरेक दिखता है। हो सकता है कि रणनीतियों के हिसाब से ये किस्से गढ़े गए हों। इन किस्सों को वास्तविक घटना का ब्यौरा नहीं कह सकते हैं।

अल-बरूनी के समय के आस-पास के महमूद को लेकर जो लिखा गया है उनमें किसी में सोमनाथ हमले का ज़िक्र नहीं है। है भी तो बेहद मामूली घटना के रूप में ज़िक्र है। शिव लिंग के होने को लेकर क्यों तमाम ब्यौरों में अंतर आता है। रोमिला थापर को दो ग्रंथों में इसका कुछ उल्लेख मिलता है। महमूद के दरबारी कवि फारूक़ी सिस्तानी के अनुसार सोमनाथ का नाम सु-मनत से बना है। इस्लाम के उदय से पहले अरब समाज में सु-मनत देवी के रूप में पूजी जाती थी। बाद में मूर्ति पूजा की जब मनाही हो गई तो किसी ने मनत को छिपा लिया और काठियावाड़ ले आया जहां मूर्ति पूजा सामान्य बात थी। मनत को लेकर कई तरह के विवरण मिलते हैं। एक विवरण के अनुसार मनत की प्रतिमा भी ध्वस्त कर दी गई थी। आज की मूर्ति जैसी नहीं होती थी तब, प्राकृतिक पत्थरों को ही देवी समझ कर पूजा जाता था।

रोमिला चेतावनी देती है कि सारे विवरण ख़ास मकसद से लिखे गए हैं, सबको पढ़ना चाहिए मगर किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले इन्हें शब्दश लेने की चूक नहीं करनी चाहिए। तुलनात्मक रूप से देखना चाहिए। रोमिला कहती हैं कि किसी भी सोर्स में सोमनाथ में लिंगम की सूचना नहीं मिलती है। मंदिर का ब्यौरा मिलता है। कभी मानव आकृति का ब्यौरा मिलता है तो कहीं देवी का तो कहीं कुछ और का। इसके प्रमाण वे अपने चैप्टर में कई दिलचस्प उदाहरण रखती हैं।

महमूद ग़ज़नी का सोमनाथ पर हमला बहुत बड़ा था और प्रचुर मात्रा में लूट कर ले गया। महमूद लूट के इरादे से ही आया था और लूट कर सिंध के रास्ते से भाग निकला। रास्ते में उसकी भिड़ंत मनसुरा के इस्माइली मुसलमान शासकों से हो गई। इस्माइली सुन्नी मुसलमान से अलग थे। महमूद ग़ज़नी सुन्नी था। उसने मुल्तान के इस्माइली शासकों पर भी हमला किया था। उनकी मस्जिद पर कब्ज़ा कर लिया, मगर इस्तमाल नहीं किया। अलग मस्जिद बनवाई। इस्माइली ने भी मुल्तान के मंदिर को कब्ज़े में लेकर मस्जिद बनाई थी जिसे महमूद ने तोड़ दिया। महमूद का गुणगान भी इसी तरह होने लगा कि वह इस्लाम का विस्तार कर रहा है। हिन्दुओं की मूर्तियां तोड़ रहा है और इस्लाम के काफ़िरों को भी मार रहा है। क़ाफ़िर का मतलब हिन्दू नहीं बल्कि इस्माइली और शिया मुसलमान जैसे भी हैं। महमूद ने ख़ुद भी अपनी जीत ख़लीफ़ा को समर्पित किया था। ख़ुद को महान बताने के लिए सोमनाथ के हमले को बढ़ा-चढ़ा कर बताया था। महमूद इन हमलों के विवरणों से इस्लामिक जगत में अपनी धाक जमाना चाहता था।

रोमिला कहती हैं कि सोमनाथ का मंदिर था तो बेहद समृद्ध लेकिन बाद की सदियों में लूट के ब्यौरे को लेकर बखान बदलते जाते हैं। लूट की राशि मंदिर की क्षमता से ज़्यादा बढ़ा-चढ़ा कर बताई जाने लगती है। ब्यौरों में बहुत सारे अंतर्विरोध दिखने लगते हैं। एक ग्रंथ से दूसरे ग्रंथ में मूर्ति के स्वरूप को लेकर भी अंतर आने लगता है। फ़ारूख़ी का कहना है कि ‘मनत’ मानव आकृति की थी, सोमनाथ की मूर्ति का भी वही स्वरूप था। इब्न ख़लिलख़ाना लिखता है कि उसके चारों तरफ 30 छल्ले थे। हर छल्ले का मतलब था एक हज़ार साल। इसलिए मूर्ति की उम्र तीस हज़ार साल होती है। मनत को अरब जगत में नियति की देवी, भाग्य की देवी के रूप में पूजा जाता था। रोमिला कहती हैं कि क्या इस वजह से इन ब्यौरों में तरह-तरह की कल्पनाएं दिखती हैं।

लिंग को लेकर भी अलग तरह के ब्यौरे हैं। इनके आधार पर एक निष्कर्ष पर पहुंचना मुश्किल है। शेख फ़रीद अल दिन ने लिखा है कि ब्राह्मणों ने महमूद ग़ज़नी से कहा कि सब सोना चांदी ले लें मगर इस मूर्ति को छोड़ दें। एक ब्यौरा ऐसा भी मिलता है कि महमूद ने ब्राह्मणों से वादा किया था कि मूर्ति लौटा देगा। किसी ने कहा है कि लिंग लोहे का बना था जिसके ऊपर चुंबक था ताकि लिंग हवा में लटकता रहे। उसे देखकर लोग चकित हो जाते थे।

रोमिला थापर किस्मों में आए इन अंतरों को पाठक के सामने रखती हैं ताकि आप इतिहास को ठीक से देख सकें। वे हमले और लूट की घटना से इंकार नहीं करतीं बल्कि उसके पीछे के कारण और उस घटना को किस तरह से याद किया जाता है, उसे देखती हैं। दसवीं सदी की घटना पंद्रहवीं सदी तक आते आते तमाम विवरणों में बदलने लगती है, मंदिर का आकार से लेकर लूट की संपत्ति का ब्यौरा बढ़ने लगता है।

चौदहवीं सदी से तुर्क-फारसी ग्रंथों में महमूद की छवि बदलने लगती है। पहले के ग्रंथों में वो एक लुटेरा है जो लूट-पाट से अपना साम्राज्य चलाता है। बाद के ग्रंथों में उसे भारत में इस्लामिक सत्ता के संस्थापक के रूप में याद किया जाने लगता है। अब देखिए समय के साथ इतिहास को लेकर स्मृतियां कैसे बदलती हैं इसलिए स्मृतियों को इतिहास समझने की ग़लती मत कीजिए। रोमिला थापर कहती हैं कि ऐतिहासिक रूप से महमूद को इस्लामिक सत्ता का संस्थापक कहना ग़लत होगा। आठवीं सदी में ही अरब ने सिंध पर कब्जा कर लिया था, वे आरंभिक इस्लामिक शासक थे। पश्चिम भारत में कहीं ज़्यादा गहरे रूप से स्थापित थे।

रोमिला थापर दिखा रही हैं कि कैसे इन ग्रंथों में महमूद के अलावा भी कई सुल्तानों के सोमनाथ मंदिर पर हमले का ज़िक्र आता है। हर हमले के बाद कहा जाता है कि मस्जिद में बदल दिया गया। रोमिला कहती हैं कि यह कैसे हो सकता है कि हमला के समय मंदिर हो जाए और हमले के बाद मस्जिद हो जाए। एक बार तो हो सकता है मगर क्या बार बार हो सकता है। ज़ाहिर है सोमनाथ एक प्रतीक बन चुका था जिसे लेकर अपनी वीरता को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने के लिए काल्पनिक किस्से गढ़े जाने लगे थे। रोमिला कहती हैं कि तुर्क-फारसी विवरणों में सोमनाथ मंदिर को लेकर सनक सी दिखती हैं।

यहां पर रोमिला थापर संस्कृत ग्रंथों के हवाले से बताती हैं कि किस तरह चौदहवीं सदी के ग्रंथों में सोमनाथ को धरती का दूसरा कैलाश बताया जाता है। उसे मंदिर की तरह बताया जाता है। अगर तुर्क-फारसी ग्रंथों के अनुसार जिस समय वहां मस्जिद बन गई थी तो फिर उसी समय के संस्कृत ग्रंथ में मंदिर का ज़िक्र कैसे आता है। रोमिला कहती हैं कि अपनी बहादुरी का बखान के लिए सोमनाथ मंदिर पर हमले का ज़िक्र आने लगता है, शौर्यगान का हिस्सा बन जाता है, इससे फर्क नहीं पड़ता कि सोमनाथ मंदिर पर वाक़ई इतने हमले हुए भी थे या नहीं। स्थानीय किंवदंती है कि सात बार हमले हुए मगर किसी भी ग्रंथ से सात बार के हमले का प्रमाण नहीं मिलता है।

सोलहवीं सदी से हो सकता है कि सोमनाथ मंदिर की आर्थिक स्थिति ख़राब हो गई हो क्योंकि इस इलाके का व्यापारिक महत्व बदल चुका था। व्यापार नष्ट होने से स्थानीय शासकों में भी वह क्षमता नहीं रही कि वे धरती के दूसरे कैलाश का रख-रखाव ठीक से कर सकें। इसके बाद भी सोलवहीं सदी तक यह मंदिर चलता रहा। अकबर ने सोमनाथ मंदिर में लिंग पूजा की अनुमति दी और उसके लिए देसाई के रूप में प्रशासक नियुक्त किया।अबुल फ़ज़ल ने महमूद ग़ज़नी के बारे में जो लिखा है उसे आप भी पढ़ लीजिए। मैं रोमिला की किताब से उठाकर यहां लिख रहा हूं।

…fanatical bigots representing India as a country of unbelievers at war with islam, incited his unsuspecting nature to the wreck of honour and the shedding of blood and the plunder of the virtuous.

आप देख सकते हैं कि अबु फज़ल महमूद ग़ज़नी की निंदा करता है बल्कि वो महमूद को भारत में इस्लामी हुकूमत का संस्थापक भी नहीं कहता है। शायद मुग़लों को उसकी ज़रूरत नहीं थी। सत्रहवीं सदी के मध्य में औरगज़ेब सोमनाथ मंदिर को ध्वस्त करने के आदेश देता है। मगर इस आदेश का पालन नहीं हुआ क्योंकि वो बाद में भी तोड़ने के आदेश जारी करता है। 1706 में मरने से पहले आदेश देता है कि मस्जिद में बदल दिया जाए। कुछ बदलाव तो हुआ क्योंकि मंदिर के अवशेषों में गुंबद और मीनारें मिली हैं।

यह मंदिर था या मस्जिद थी,मगर यह साफ है कि इस वक्त तक बहुत कम लोग यहां अराधना के लिए जाने लगे। स्थानीय राजाओं में न तो क्षमता थी और न ही उनकी इच्छा रही। अठारहवीं सदी के अंत में अहल्याबाई होल्कर ने परिसर में एक छोटे मंदिर का निर्माण कराया था। शायद वो भी बड़ा मंदिर बनाने के लिए आर्थिक मदद देने की स्थिति में नहीं थीं। रोमिला थापर कहती हैं कि मराठा और मुगलों की लड़ाई में सोमनाथ मंदिर एक केंद्रीय थीम था, मगर मराठा शासकों ने भी सोमनाथ मंदिर का उद्धार नहीं किया। इस वक्त तक मुग़ल भी कमज़ोर हो चुके थे और मराठा शासकों के लिए ऐसा करना आसान भी था।

मैंने इस चैप्टर की सारी बातें हिन्दी में नहीं लिखी हैं। उसके लिए आपको भी थोड़ी मेहनत करनी चाहिए । पेंग्विन इंडिया से छपी रोमिला थापर की किताब Somanatha – The Many Voices of a History ख़रीद कर पढ़ सकते हैं। इतिहास में सही भी होता है और ग़लत भी होता है बस उसका हिसाब नहीं हो सकता। टीवी पर चलने वाली इतिहास की बहसों से बचिए। आप जानवर बन जाएंगे। अगले चैप्टर में लिखूंगा कि रोमिला थापर ने संस्कृत ग्रंथों के हवाले से सोमनाथ मंदिर के विध्वंस को किस तरह से लिखा है। उनका कहना था कि सोमनाथ के वृतांत में संस्कृत ग्रंथों को अनदेखा किया गया है। सब कुछ तुर्क और फ़ारसी दस्तावेज़ों पर ही आधारित है। यानी हमलावार के दरबारी या ख़ुद को महान बताने के क्रम में आरंभिक इस्लामिक शासकों ने इसे कैसे देखा है। संस्कृत ग्रंथों की नज़र से भी देखते हैं। आप देख रहे हैं कि रोमिला सोमनाथ मंदिर पर हमले से आंख नहीं चुराती हैं बल्कि उस हमले को लेकर गढ़े गए किस्सों से आपको मिलवाना चाहती हैं।

नोट- इस लेख को लिखने में मैंने अपनी छुट्टी का एक दिन बर्बाद कर दिया। इसलिए कि हम इतिहास को इतिहास की तरह समझें।