सचमुच ये इतिहास नया है

आख़िर भाजपा ने यह जवाब क्यों नहीं दिया कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी से समर्थन नहीं लेंगे। शरद पवार ने तो रविवार को ही ये पेशकश कर दी। मंगलवार को टाइम्स आफ इंडिया में अमित शाह का इंटरव्यू छपा है। इस इंटरव्यू में भी वे नहीं कहते हैं कि हम कैसे एन सी पी का समर्थन ले सकते हैं। बल्कि रविवार की प्रेस कांफ्रेंस की बात ही दोहराई है। जब भी पत्रकार उनसे एन सी पी की पेशकश को लेकर यह सवाल पूछते हैं अमित शाह एन सी पी के बयान को अक्षरश सुनाने लगते हैं। ठीक है कि बीजेपी ने मांगा नहीं है लेकिन क्या यह वही स्थिति नहीं है जब दिल्ली में कांग्रेस ने बिना मांगे आम आदमी पार्टी को समर्थन दे दिया था और सरकार बनी थी। तब तो बीजेपी ने यही कहा था कि दोनों में सांठ गांठ हैं। कांग्रेस की बी टीम हैं आम आदमी पार्टी। इतनी शानदार जीत के बावजूद बीजेपी ने इतनी मामूली सी लाइन नहीं ली यह बात समझ के बाहर नहीं होनी चाहिए। दिल्ली में तो बीजेपी के पीछे हटने के बाद आप के पास सरकार बनाने के अलावा विकल्प नहीं था। हालांकि उसे भी उस कांग्रेस का साथ नहीं लेना चाहिए था जिस पर उसने भ्रष्ट होने के आरोप लगाए। महाराष्ट्र में तो सरकार बनाने के कई विकल्प हैं। निर्दलीय हैं। शिव सेना है ही। इसके बावजूद बीजेपी एन सी पी के आटोमेटिक समर्थन के बयान पर चुप हो जाती है।

शिव सेना के संदर्भ में अमित शाह और सभी बड़े नेता बार बार यही कह रहे हैं कि चुनाव के समय जो उन्होंने बयान दिया उसे बीत गई सो बात गई समझा जाना चाहिए। यानी बीजेपी उन बातों को भुला देना चाहती है। कांग्रेस ने कहा है कि शिव सेना को हफ्ता वसूल पार्टी कहने के बाद कैसे समर्थन ले सकती है भाजपा। तो क्या बीजेपी ने एन सी पी के बारे में भी दिए गए अपने बयानों को लेकर खुद को माफ कर लिया है। क्या प्रायश्चित कर लिया है कि ‘एक ईमानदार नेता ‘ शरद पवार और उनकी ‘ईमानदार पार्टी’ को ख्वामखाह नेचुरली भ्रष्ट पार्टी कह दिया। बारामती की जनता को पवार परिवार की गुलामी से निकलने के लिए कहा। अब यही बयान किसी और दल के नेता ने दिया होता तो बीजेपी प्रचार तंत्र के जरिये ऐसा हमला करती कि उसकी बोलती बंद हो जाती। जगह जगह से आवाज़ आने लगती है कि लोकतंत्र का सम्मान नहीं हो रहा है। जो हमको वोट दे रहे हैं उन्हें गुलाम कहा जा रहा है। राजनीति में कहे और किये हुए का ही हिसाब होता है। जो कहा जाता है उसे इतनी आसानी से नहीं भुलाया जाता। खासकर तब जब बीजेपी ने खुद को कांग्रेस या अन्य दलों के बरक्स नैतिकता से भरी एक ईमानदार प्रयास वाली पार्टी के रूप में पुनर्जीवित कर पेश किया है।

2007 में जब मायावती ने खंडित जनादेश वाले उत्तर प्रदेश में स्पष्ट बहुमत की सरकार बनाकर राजनीतिक करिश्मा किया था तब अखबारों में मायावती का भी वैसा ही गुणगान हुआ था जैसा आज मोदी और शाह का हो रहा है। मायावती की हर राजनीतिक चाल को मास्टर स्ट्रोक के रूप में परिभाषित कर दिया गया। लोगों ने कहा कि यूपी जात पात से निकल कर विकास और मजबूत प्रशासन की तरफ निकल पड़ा है। इसके बाद अखिलेश यादव ने भी वही सफलता दोहराई । आज मायावती की वो सफलता ऐतिसाहिस होते हुए भी इतिहास के गर्त में हैं। लोकसभा में उन्हें ज़ीरो सीट आई है। मैं खुद आज तक नहीं समझ सका कि इन राजनीतिक कामयाबियों को प्रस्थान बिंदु के किसी स्थायी फार्मूले की तरह किस हद तक देखा जा सकता है। ममता बनर्जी की जीत भी ऐसी ही उपमाओं से अखबारों में लहलहा रही थी। नीतीश कुमार की जीत को भी ऐतिहासिक माना गया और कहा गया कि बिहार आगे निकल गया है। आज वही बिहार एक नए किस्म के सवर्णवाद से घिर गया है जो विकास और जात पात विहीनता के नाम पर साईं राम को जलाकर मार देता है। उफ्फ तक नहीं करता।

प्राइम टाइम से निकलते हुए एक वक्ता ने कहा कि राहुल गांधी से कुछ नहीं होगा। इसके रहते मोदी को कोई चुनौती नहीं मिलेगी। यह बात सुनते ही मुझे एक घटना याद आ गई। अपने संपादक के साथ संसदीय कार्यमंत्री के दफ्तर में गया था। वही ले गए कि चलो मिलवा देता हूं। वाजपेयी मंत्रिमंडल के ताकतवर नेता थे। संपादक ने पूछा कि लोकसभा चुनाव में क्या होगा। मंत्री जी ने कुर्सी के पीछे झुकते हुए कहा कि जबतक कांग्रेस में ये विदेशी विधवा रहेगी हमीं तो बार बार चुनकर आते रहेंगे। 2004 का चुनाव हुआ और अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली भाजपा हार गई। नतीजा आने तक किसी को नहीं पता था कि वाजपेयी की जगह प्रधानमंत्री कौन होगा।

निश्चित रूप से यह मोदी युग है। 2002 से वे लगातार सफल हो रहे हैं। बारह साल में गुजरात में उन्हें कोई नहीं हरा सका। दिल्ली की सत्ता तक आ गए। पलायनवादी विरोधी इस इंतज़ार में हैं कि मोदी की चमक फीकी पड़ जाएगी तो हम चमकेंगे। उनकी ये धारणा बताती है कि वे मोदी का राजनीतिक नहीं बल्कि अंध विरोध करते हैं। भाग्यवादी हो गए हैं। जबकि मोदी उनसे कहीं ज़्यादा राजनीतिक प्राणी हैं। उनमें जीतने की भूख किसी से भी ज्यादा है। सिर्फ भूख नहीं बल्कि वो दिन भर पकवान की सामग्री जुटाने और अच्छा रसोइया चुनने की रणनीति भी बनाते रहते हैं। बहुत हद तक विरोधियों में डर समा गया है।

राजनीति की एक खूबी है। वो वर्तमान में भी इतिहास के सहारे चलती है लेकिन इतिहास वो बनाता है जो वर्तमान को गढ़ लेता है। आंध्र प्रदेश में चंद्राबाबू नायडू की मीडिया लोकप्रियता शिखर पर थी। वो हैदराबाद से वाजपेयी पर अंकुश लगाने की स्थिति में पहुंच गए थे। कांग्रेस के वाई एस आर रेड्डी पदयात्रा पर निकल पड़े और वही आंध्र प्रदेश चंद्राबाबू नायडू की बेदखली और केंद्र में कांग्रेस की वापसी का आधार बन गया। सोनिया गांधी ने हरकिशन सिंह सुरजीत के सहारे कई कुनबों को जोड़ लिया। वाजपेयी का कुनबा हार गया। मैं यहां मोदी को हराने का ताबीज नहीं दे रहा बल्कि यह कह रहा हूं कि मोदी के सामने सारी राजनीति खत्म हो जाएगी ऐसा नहीं है। ऐसा होगा तो यह अप्रत्याशित होगा जिसकी कल्पना मैं फिलहाल नहीं कर पा रहा हूं। ऐसा होगा तो वो भी देखना दिलचस्प होगा। हमारे जैसे लोग उसका भी विश्लेषण करेंगे।

मंगलवार के टाइम्स आफ इंडिया में अमित शाह ने लिखा है कि गठबंधन का युग समाप्त होने को आ रहा है। अमित शाह की इस बात को 2004 की उस घटना के संदर्भ में देखिये जिसका ज़िक्र मैंने ऊपर किया है। अमित शाह कहते हैं कि एक निर्विवाद नेता के सामने गठबंधन समाप्त हो रहा है। वाजपेयी भी तो अपने युग के निर्विवाद ही थे। उनके सामने बिना नेता का गठबंधन कैसे जीत गया। यह ज़रूर है कि हर हार और जीत के अनेक कारण होते हैं लेकिन यह भी एक मिथक फैलाया जा रहा है कि गठबंधन का युग समाप्त होने को आ रहा है । राजनीति में गठबंधन कभी समाप्त हो ही नहीं सकता। गठबंधन का मतलब क ख ग पार्टियों से गठबंधन नहीं होता। ब, र, क, द, ज जातियों का भी गठबंधन होता है। क्या उसका युग समाप्त हो गया है।

भाजपा अपने भीतर जातिगत गठबंधन का विस्तार कर रही है। वो बड़े सहयोगियों को विस्थापित कर छोटे सहयोगियों को साथ ले लेती है। गठबंधन से ऐसी विरक्ति होती तो रामदास अठावले से लेकर रामविलास पासवान तक को भी चलता कर देती। फिर भी भाजपा के भीतर सभी जातियों के आगमन को समझना चाहिए। यह एक बड़ी घटना तो है ही कि तमाम विकल्प रहते हुए ये जातियां अपना घर और पुराना नेता छोड़ कर भाजपा में आ रही हैं। मगर यह सब स्वाभाविक रूप से हो रहा है इसे वैज्ञानिक रूप से साबित करना आसान नहीं है। इतने जातिगत गठबंधनों के अंतर्विरोधों का लंबे समय तक प्रबंधन और संयोजन करना आसान नहीं होता। कोई दस साल कर जाए तो उसे राजनीतिक रूप से निश्चय ही महान माना चाहिए। तब ज़रूर यह युग मोदी का युग कहलाएगा जो अभी शुरू हुआ है। मायावती नहीं कर पाईं तो कुछ जातियां निकल अखिलेश की तरफ गईं । वो नहीं कर पायेंगे तो वहां से निकल कर बीजेपी की तरफ जायेंगी। लेकिन जातियों को लेकर बीजेपी ने इस बदलाव की शुरूआत की है मुझे लगता है कि अखबारों के स्तंभकार कुछ ज्यादा ही उदारता बरत रहे हैं। गुणगान करने में।

दूसरी तरफ बीजेपी विरोधी गठबंधनों पर ज़ोरदार हमले करती है जिसके सामने विरोधी उसके गठबंधनों को नहीं देख पाते। उसके समझौतों को उभार नहीं पाते।  मौजूदा सरकार में भी सहयोगी दलों के मंत्री हैं मगर इस सरकार को एन डी ए की जगह मोदी सरकार कहा जाता है। यही प्रचार तंत्र का असर है कि जनता को एक तरफ गठबंधन नहीं दिखता है और दूसरी तरफ दिखता है। आज बीजेपी की सबसे बड़ी सहयोगी है उसका प्रचार तंत्र। इसके सहारे वो अपनी धारणा या बात को हर स्तर पर सबसे ऊपर रखती है। बाकी सारे वृतांत छोटे पड़ जाते हैं। बेहद सीमित संदर्भ में आम आदमी पार्टी को छोड़ दें तो किसी भी दल ने उसके इस प्रचार पार्टनर का विकल्प नहीं ढूंढा है। किसी ने भी बीजेपी का मुकाबला नहीं किया है। सबका शामियाना बीजेपी के मज़बूत पंडाल के सामने बांस और रस्सी पर टिका है जो हेलिकाप्टर की हवा भर से उड़ जाता है। इसी तंत्र के सहारे बीजेपी खुद को जातपात से ऊपर उठा हुआ पार्टी बताने लगती है और दूसरे इस आधार पर बचाव की मुद्रा में आ जाते हैं। जबकि टिकट वितरण और राजनीति का सारा तामझाम बीजेपी का भी जात पात के समीकरणों पर आधारित है। और ऐसा करना कोई राजनीतिक अपराध नहीं है। पहले बीजेपी में इसके लिए एक ही इंजीनियर थे गोविंदाचार्य। गोविंदाचार्य की सोशल इंजीनियरिंग कहा जाता था आज संघ और बीजेपी ने मिलकर सोशल इंजीनियरिंग का पूरा विश्वविद्यालय कायम कर दिया है। टीवी उनका सहयोगी है।  बीजेपी के प्रवक्ता तैयारी से आते हैं। नेता के प्रति निष्ठा लेकर आते हैं। दूसरे दल के नेता इस बात से नाराज़ लगते हैं कि क्यों करने अपने नेता का बचाव। मंत्री तो बनाया नहीं। ठेका तो दिलवाया नहीं।

इस प्रचार पार्टनर के दम पर बीजेपी ने बड़ी चालाकी से जनता में यह बात पहुंचा दी है कि अखिलेश यादव, मायावती, नीतीश कुमार, ओम प्रकाश चौटाला, हुड्डा वगैरह जातिवादी नेता हैं। हरियाणा में ही बीजेपी ने दो दर्जन से अधिक जाट उम्मीदवारों को टिकट क्यों दिया। दलित वोट लेने के लिए चवालीस उम्मीदवारों को डेरा सच्चा सौदा के विवादास्पद प्रमुख के सामने परेड क्यों कराई। अभी तक बीजेपी ने इसका खंडन नहीं किया है। क्या आप सोच सकते हैं कि यही काम अगर चौटाला या हुड्डा ने किया होता तो बीजेपी या उसका प्रचार तंत्र इसे चुपचाप जाने देता। घंटों टीवी पर बहस हो रही होती। बीजेपी ऐसी धुलाई करती कि उन चवालीस उम्मीदवारों के टिकट तक कट जाते। बीजेपी ने मलिक जाट के खाप के मुखिया को टिकट दिया। क्या ये जातिवाद नहीं था। क्या बीजेपी खाप को लेकर अपनी लाइन स्पष्ट करेगी। महाराष्ट्र में पंकजा मुंडे से संघर्ष यात्रा कराई गई। क्या वो जातिगत समीकरणों को संगठित करने के लिए नहीं था। लोकसभा में तो खुद नरेंद्र मोदी पिछड़ी जाति का ही बताते रहे हैं। बीजेपी की यही रणनीति है। दूसरे को जात पात का दल बताओ और खुद जातपात करो मगर विकास विकास कहलाओ। क्या एक जाति के दम पर मायावती अखिलेश या नीतीश सरकार बना सकते थे।

बीजेपी कई तरह के गठबंधन अपने भीतर बना रही है। वो बाहर से भी गठबंधन कर रही है मगर उसके साथ वे छोटे दल हैं जिनका अपना जातिगत आधार है। रामविलास पासवान और अनुप्रिया पटेल की जातिवादी राजनीति को क्या आप विकास की राजनीति कह सकते हैं। इसलिए यह कहना कि बीजेपी की इस जीत से जाति की राजनीति समाप्त हो रही है अतिशयोक्ति भर है। 27 जाटों को टिकट देने का फार्मूला न्यूज चैनलों से प्रभावित लगता है। जहां पचासों चैनल एक ही खबर दिखाते हैं। एक ही भाषण दिखाते हैं। सबको कुछ न कुछ टी आर पी मिल जाती है। बीजेपी ने गैर जाटवाद का नारा तो दिया मगर एक जाति के 27 लोगों को टिकट देकर कुछ न कुछ तो हासिल कर ही लिया। विरोधी दल के मजबूत आधार में भगदड़ मचा दी और उन्हें अपना गढ़ बचाए रखने के लिए मजबूर किया ताकि वे वहीं तक सीमित रह जाएं। अपने टर्फ से बाहर निकल कर बैटिंग न कर पायें।

अगर राजनीति से जातपात समाप्त हो गया है तो मान लेना चाहिए कि समाज से भी हो गया होगा। फिर तो जातिगत आरक्षण समाप्त करने की सी पी ठाकुर, संजय पासवान और बाबा रामदेव जैसों की मुराद एक मिनट में पूरी हो जाएगी। ज़ाहिर है बीजेपी ऐसा कुछ नहीं करेगी उसका यह राष्ट्रवाद क्षण भर में बिखर जाएगा। सरकार में आने के बाद यूपीए के जाट आरक्षण के फैसले का कोर्ट में समर्थन किया है। यह ज़रूर है कि इन भीतरी समीकरणों की वजह से भाजपा को सभी वर्गों का पर्याप्त समर्थन मिल रहा है जो किसी भी पार्टी के लिए लौटरी के समान है। अखबारी जानकारों की यह बात हजम नहीं होती कि जातीय आकांक्षाएं समाप्त हो गईं हैं। वो हस्तांतरित हुईं हैं। मायावती मुलायम या लालू से निकलकर बीजेपी के पास गईं हैं। अगर विकास में उन्हें बराबर की हिस्सेदारी नहीं मिली तो ये फिर कहीं भी जा सकती हैं। दुनिया में अभी तक कहीं भी ऐसा कोई विकास नहीं हुआ हैं जिसमें सबको बराबर की भागीदारी मिली हो। ग्रोथ रेट की पोलिटिक्स में जब तक गैरबराबरी नहीं बढ़ेगी ग्रोथ रेट नहीं बढ़ेगा।

बीजेपी के विरोधी नेताओं की घबराहट देखने लायक है। आज किस पार्टी के पास संघ का समर्थन है जो अपने हज़ार दस हज़ार कार्यकर्ताओं को एक राज्य से दूसरे राज्य में भेज दे और वो भी तीन चार महीनों के लिए। अमित शाह ने टाइम्स आफ इंडिया के इंटरव्यू में सफाई से कह दिया कि महाराष्ट्र और हरियाणा में कांग्रेस ने सबसे ज्यादा खर्चीला अभियान चलाया है। क्या यह बात आसानी से हजम हो जाती है। कई अखबारों के पहले पन्ने पर लगातार विज्ञापन किस पार्टी ने किया। टीवी पर मेडिसन स्कावयर का भाषण को विज्ञापन में बदलकर चलाने का विवाद क्या था फिर।

बीजेपी की रणनीति यही है कि खुद करो। जीतने के लिए जो करना है वो करो लेकिन दूसरा वही करे तो हमला कर उसे धूल मिट्टी में मिला दो। उसके पास नेता, संगठन, प्रचार तंत्र सब है। इसलिए वो सफल हो रही है। तभी तो जीत के बाद खबर छपती है कि बीजेपी के नेता रात के दो बजे तक जागते थे। जैसे कि बाकी दल के नेता शाम सात बजे सोने चले जाते होंगे। सारे लेख ऐसे विश्लेषणों से भरे हैं जिसे खुद अमित शाह पढ़कर हंसते होंगे। दिन रात मेहनत करने वाले उनके जैसे नेता को इतनी तारीफ अच्छी लगती होगी मुझे नहीं लगता। पर ऐसी तारीफों से नेता का कुछ बिगड़ता नहीं। बनता ही है।

भाजपा जीत रही है। संगठन और प्रचार तंत्र और समीकरणों को बनाने बुनने की उसकी समझ इस वक्त सबसे धारदार है। निश्चित रूप से विरोधी दल के लचर नेतृत्व और भ्रष्टाचार के आरोप उसमें कारक हैं पर इन सब बातों से जीत सुनिश्चित होती तो बीजेपी एक मिनट में एन सी पी के प्रस्ताव को खारिज कर देती। उसे खरी खोटी सुना देती। कई लोगों ने लिखा कि मोदी लहर ठंडी पड़ गई है। ऐसा हो सकता है। इसके प्रमाण तो हैं कि लोकसभा की तरह चली आंधी में इस बार बाकी दल उड़ नहीं गए। मगर सरकार तो बीजेपी की ही बनी। ट्राफी रनर अप को नहीं मिलती है।

पिछले कई महीनों में घूमते हुए मैंने मतदाता के एक बड़े समूह को देखा है। वो मोदी से उम्मीद नहीं करते बल्कि मोदी को प्यार करते हैं। यह एक राजनीतिक सच्चाई है। टीवी पर मोदी को देखकर उनका मन खुश हो जाता है और मोदी की बातें सुनकर दिन बन जाता है। यह वर्ग सोशल मीडिया का नकली और अस्थायी मोदी फैन नहीं है बल्कि साधारण और सामान्य मतदाता है। यही मोदी की पूंजी है। इसे दूसरे नेता भी हासिल कर सकते हैं बशर्ते उन्हें अपनी पैकेजिंग बदलनी होगी। सबसे पहले कुर्ता पहनने का तरीका बदल देना होगा !!

रही बात मोदी की तरह बोलने की तो वो इतनी जल्दी नहीं सुधर सकता क्योंकि बोलने का मतलब है अपने विरोधी के बारे में सोचना, उसे सुनना और उसकी एक एक चाल को देखना। इस बोलने पर भी एक पुराना किस्सा बताकर खत्म करता हूं। 2009 में जब बीजेपी ने मनमोहन सिंह के सामने कमज़ोर प्रधानमंत्री का मुद्दा रखा तो लोगों ने बीजेपी को खारिज कर दिया। तब लोग कहते थे कि ठीक है कि नहीं बोलते हैं। प्रधानमंत्री काम करने के लिए होता है कि बोलने के लिए। उसी मनमोहन सिंह को 2014 में लोगों ने इसी एक बात के लिए देखना तक पंसद नहीं किया कि ये कैसे नेता हैं कि बोलते नहीं हैं। ऐसे नेता को एक मिनट भी प्रधानमंत्री की कुर्सी पर नहीं होना चाहिए। वक्त वक्त की बात है बंधु। सबकुछ नया बन रहा होता तो बीजेपी के नेता मोदी की कामयाबी और हैसियत की तुलना नेहरू और इंदिरा से क्यों करने लगते। आप ही बताइये। इतिहास बन रहा है या दोहराया जा रहा है।