तरुण विजय को लेकर छोटी सी इक बात….

सार्वजनिक जीवन और राजनीति में प्रायश्चित एक पवित्र जगह है। हर किसी को इसकी रक्षा करनी चाहिए। कभी कोई प्रायश्चित करे तो कभी मज़ाक नहीं उड़ाइये। अगर प्रायश्चित में गंभीरता है तो उसे गले लगाने से मत चूकियेगा। वर्ना एक दिन हम अपने तर्कों को नफ़रतों की तलवार में बदल देंगे जिनका काम एक दूसरे की गर्दन काटना रह जाएगा। जो राजनीति हमारे सामने से गुज़र रही है उसका हासिल कुर्सी के अलावा कुछ भी नहीं। कुर्सी के लिए दुश्मनों के बीच कब समझौता हो जाए, पता नहीं। जिन्हें आप सही समझते हैं, वो ग़लत के साथ कुर्सी पर बैठने के लिए कितने लालायित हैं, यह आप कभी नहीं जान पायेंगे। इसलिए अपनी बातों को हमेशा सत्ता सापेक्ष मत रखिये। प्रायश्चित को प्रोत्साहित करने से राजनीति बेहतर होगी। सिर्फ हरा देने से या जीत जाने से नहीं होगी।

दक्षिण भारत के बारे में भाजपा नेता तरुण विजय की टिप्पणी को मैंने देखा भी और नहीं भी देखा। नेताओं के ऐसे बयानों पर प्रोग्राम करने से भी बचता हूं, जब तक कि अति अनिवार्य हो या करने के लिए कुछ और न हो। तरुण विजय का बयान अति अनिवार्य और ध्यानाकर्षण योग्य था। निंदनीय टिप्पणी थी। ख़ूब निंदा हुई। इतनी हुई कि तरुण विजय सार्वजनिक रूप से शर्मसार भी हुए। सोशल मीडिया पर उनकी इस मूर्खतापूर्ण टिप्पणी पर उपहास उड़ते हुए देख कर यही लगा कि इससे दूर रहना चाहिए। जब आपको आलोचना में सुख मिलने लगे, गुदगुदी होने लगे तो वो आलोचना सही होते हुए भी आपको जानवर बनाती है। मैं जानवर बनने की हर कमज़ोरी से बचना चाहता हूं। कमज़ोरियां मुझमें भी हैं।

हिन्दू अख़बार में तरुण विजय का इंटरव्यू देखा। तरुण कह रहे थे कि उनके बयान का बचाव नहीं किया जा सकता है। ग़लत बोला है। ऐसी बात बोलने का अफ़सोस है। मैं अपने कहे पर तर्क नहीं करना चाहता। मैंने तुरंत ही माफी मांग ली। मैं दूसरी तरफ से भी सह्रदयता की प्रतीक्षा कर रहा था कि कोई कहेगा कि कोई बात नहीं। ऐसी बातें निकल जाती हैं। सोच समझ कर बोलना चाहिए। आपने अपने बयान पर खेद व्यक्त किया है तो हम भी स्वीकार करते हैं। आइये एक कप काफी पीते हैं।

मुझे पता है तरुण विजय के पक्ष के लोग भी ऐसा कभी नहीं कहेंगे और उनके विरोधी भी नहीं। जब कोई प्रायश्चित करे, अपनी बात पर माफी माँगे तो समाज का आचरण कैसा होना चाहिए। क्या यह ज़रूरी नहीं है कि वह माफ करे। प्रायश्चित को स्वीकार करे। दक्षिण भारतीयों के रंग पर उनकी शर्मनाक टिप्पणी से कहीं ज्यादा उनका प्रायश्चित महत्वपूर्ण है। बिना अगर मगर का इस्तमाल किये उन्होंने प्रायश्चित की है। स्वीकार कीजिए। सीख लीजिए। अफ़सोस ज़ाहिर करने वाला अपनी सज़ा ख़ुद तय करता है। आप और सज़ा मत दीजिए। वर्ना इस समाज में कुछ बचेगा नहीं। अच्छा और बुरा होने का अगर यही एक मात्र उद्देश्य रह जाएगा किसी को मार देना तो अनर्थ हो जाएगा। प्रायश्चित से इंसान का पुनर्जीवन होता है। नए जीवन का स्वागत कीजिए। बस इतना ही कहना था।