ये फ़िरोज़ अब्बास ख़ान का मुग़ल-ए- आज़म है

जो देख रहा था, वो अतीत का एक किस्सा था, जो दिख रहा था, वो वर्तमान का किस्सा था। जगह का नाम था जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम। नाटक का नाम था मुग़ल-ए-आज़म। किताबों के कवर और सरकारी इमारतों की तख़्तियों से बेदखल किए जा रहे इन दो नामों को आपस में टकराते देख रहा था। के आसिफ़ की फ़िल्म मुग़ल-ए-आज़म की शान में कुछ भी कहना गुस्ताख़ी होगी, फ़िरोज़ अब्बास ख़ान के नाटक मुग़ल-ए-आज़म की शान में कुछ न कहना गुस्ताख़ी हो जाएगी।

एक मुकम्मल फ़िल्म में ऐसा क्या नहीं देखा होगा, जिसे पूरा करने का जुनून फ़िरोज़ ख़ान पर हावी हुआ होगा। नहीं मालूम था कि मेरे लिए भी बार बार देखी जा चुकी एक फ़िल्म में इतना कुछ देखना बाक़ी था। बल्कि फ़िरोज़ के बेहतरीन निर्देशन में इस महानाटक ने पहले ही सीन से समझा दिया कि आपने अभी तक जो देखा है,उसे समझने के लिए फिर से देखना होगा। एक झटके में यह नाटक फ़िल्म के साये से अलग होकर आज के समय के साये के साथ हो लेता है।

नाटक का एक एक संवाद राष्ट्रवाद और लव जिहाद के नैरेटिव के सामने निजता और व्यक्तिगत चुनाव से लोहा लेने लगता है। उस देश में जहाँ लव जिहाद के नाम पर प्रेम को संदिग्ध बनाया जा रहा हो, वहाँ मुग़ल ए आज़म को फिर से देखते के सुख से ख़ुद को वंचित नहीं करना चाहिए।

मुग़ल-ए-आज़म का यह लव जेहाद भारत की संस्कृति और संगीत के ज़रिए इतिहास की इस प्रेम कहानी को फिर से गढ़ रहा है। शायद चुनौती दे रहा है। दावा कर रहा है कि गाथाओं की एक ख़ूबी होती है। उनकी हुकूमत कोई बादशाह नहीं बदल सकता है। बल्कि उनमें ताक़त होती है कि बादशाह की हुकूमत बदल दे।

इस महानाटक में अक़बर यहां महान होने के दावे से मुक्त है। वो उससे भी ऊपर इतिहास का एक ऐसा किरदार है,जिसका बोझ उठाने की कूव्वत नया इतिहास लिख रही राजनीति में नहीं है। फ़िरोज़ संकीर्ण राजनीति का धूल झाड़कर फिर से अकबर को स्थापित करते हैं। प्रथम और आख़िरी सीन का अकबर काफी ऊँचा बैठा है। उस जगह पर बैठे किसी नायक को किताब की कवर से हटाया जा सकता है, इतिहास के नैरेटिव से नहीं।

शायद इसी वजह से फ़िरोज़ अब्बास ख़ान की जोधाबाई सलीम से ‘राजनीति’ और मोहब्बत के फ़र्क समझने के लिए कहती है। यह शब्द को वर्तमान में ले आता है। लग रहा था जैसे आज की राजनीति में फंसे हैं। बादशाह और बाप में साहस नहीं कि वे अपने लख़्त-ए-जिगर को उसकी अनारकली बख़्श दें। जोधा अपने बेटे को राजनीति से मोहब्बत निकाल कर नहीं दे पाती है। राजनीति में मोहब्बत है भी नहीं।

मैंने नाटक कम देखे हैं। इसलिए नाटक पर लिखने की न तो योग्यता है न ही उसके लिए ज़रूरी शब्द। पर जो देख रहा था वो अदभुत था। भव्य कहकर कहने से बचना नहीं चाहता। मैंने सोचा भी नहीं था कि मुग़ल-ए-आज़म को लेकर दो अलग अलग अनुभव होंगे। एक बार भी मधुबाला याद नहीं आई। एक बार भी दिलीप कुमार याद नहीं आए। एक बार भी पृथ्वीराज कपूर याद नहीं आए। एक बार भी दुर्गा खोटे याद नहीं आईं। मानसिंह याद नहीं आए।

सारे कलाकारों ने बेहतरीन अभिनय किया है। अनारकली की आवाज़ वाक़ई जादू करने वाली है। अभिनय पर कोई अलग से लिखे। फ़िरोज़ की अनारकली मधुबाला से अनारकली को निकाल लाई है। वो अब नई मधुबाला हैं। सारे गाने स्टेज पर लाइव गाए। दर्शकों ने पूछ कर हैरान कर दिया कि वाक़ई जो हम सुन रहे हैं, सच है? आयोजकों को बार बार कहना पड़ा, हाँ यही सच है। अनारकली लाइव गा रही हैं। फिर भी शक बढ़ता गया कि नहीं ऐसा हो ही नहीं सकता। तभी तो नाटक ख़त्म होने के बाद उनसे कहा गया कि आप गाकर दिखा दें। अभिनय करते वक्त इतना से गाने का शऊर किसकी बख़्शीश रही होगी, मैं नहीं जानता। लगा कि नय्यरा नूर की आवाज़ है। संगीत और साउंड के बारे में क्या कहें। नाटक में हर कलाकार ने शानदार अभिनय किया है। इतनी भी तारीफ़ न कर दूं कि आप जब देख कर लौटे तो नुक़्स निकालने का लुत्फ़ चला जाए! फ़िरोज़ अब्बास ख़ान के निर्देशन में उन सभी को बधाई जिन्होंने इस नाटक को जीया है।

रंगमंच पर सीन लगातार बदल रहे थे। रौशनी सीन को बदल रही थी। रौशनी का हर रंग अपने आप में एक सीन था। इतिहास का एक अलग पन्ना। के आसिफ़ की आत्मा मंच पर नहीं, दर्शक दीर्घा में आराम फ़रमा रही होगी। यह देखकर उनके मुग़ल-ए-आज़म को किसी ने कम नहीं किया है बल्कि एक और मुग़ल-ए-आज़म का निर्माण किया है जो उनसे कम बेहतर नहीं है।

आज के राजनीतिक माहौल में मुग़ल-ए-आज़म आउट आफ सिलेबस हो चुका है, मगर रंगमंच पर लाकर फ़िरोज़ साहब ने इसे एक ऐसे सिलेबस का हिस्सा बना दिया है, जिसकी नक़ल में न जाने कितने नाटक बनेंगे मगर के आसिफ़ की तरह कोई दोबारा फ़िरोज़ का मुग़ल-ए-आज़म नहीं बना सकेगा। इस नाटक में अकबर का इंसाफ़ ही नहीं था बल्कि फ़िरोज़ साहब का भी इंसाफ़ था। जिस जवाबदारी से उन्होंने फ़िल्म को मंच पर उतारा है, उसके लिए उन तक मेरा सलाम पहुंचे। खड़े होकर ताली बजाई है मैंने।

टीवी के फ्रेम से बाहर आकर एक एक पल में ज़िंदगी नज़र आ रही थी। यक़ीन पैदा हो रहा था, ऐसा ही जुनून फिर से हो सकता है। कोई काम फिर से मुकम्मल तरीके से किया जाए। मंच में सलीम अपनी रग़ो में दौड़ते ख़ून की बात कर रहा था,सामने बैठा मैं अपनी रग़ों में दौड़ता हुआ ख़ून महससू कर रहा था। हमें जीने के लिए ज़िंदगी के किस्सों में जाना होगा। वही मनुष्य बने रहने की संभावनाएं हैं। जहां कुछ लोग महीनों रियाज़ कर चुपचाप कुछ नया रच रहे होते हैं, जिन्हें देखकर आप शोर से भर उठते हैं। तुम कब रचोगे, तुम्हारे पास भी तो माध्यम है। उसमें संगीत है। संवाद है। दृश्य है। फिर वो ज़िंदगी से महरूम क्यों हैं।

दोस्तों, मेरे लिखे पर न जाइयेगा, देख आइयेगा। 9 से 17 सितंबर तक इसके शो हैं। दरअसल, मैंने कुछ भी नहीं बताया कि क्या देखा है। जो देखा है, वो बता ही नहीं पा रहा हूं। ज़रूर मुझ पर जादू हुआ है, जो अब तक नहीं उतरा है। तस्वीर लेने की इजाज़त नहीं थी। अगर मिल गई तो यहां बाद में लगा दूंगा।