पब्लिक ट्रायल अरविंद केजरीवाल की अलोकतांत्रिक सोंच !

“तो ये समझ में आने लगा कि सीधे जनता को कानूनन यह ताकत देनी होगी कि यदि राशन वाला चोरी करे तो शिकायत करने की बजाय सीधे जनता उसे दण्डित कर सके। सीधे-सीधे जनता को व्यवस्था पर नियंत्रण देना होगा जिसमें जनता निर्णय ले और नेता और अफसर उन निर्णयों का पालन करे। “

साल 2012 में अरविंद केजरीवाल ने अपनी किताब के पेज नंबर 30 पर यह सवाल उठाया है। वे पूछ रहे हैं कि क्या ऐसा हो सकता है कि जो जनता संसद और नौकरशाही को निर्णय लेने का अधिकार सौंप सकती है क्या उससे वापस नहीं ले सकती। अरविंद लिखते हैं कि इन्हीं सब प्रश्नों की खोज में हम बहुत घूमे, बहुत लोगों से मिले और बहुत कुछ पढ़ा भी। जो कुछ समझ में आया उसे इस पुस्तक के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। स्वराज में अरविंद इस नतीजे पर पहुंचते तो नहीं दिखाई दिये कि जनता सीधे दण्डित करेगी लेकिन लगता है उनके मन में यह प्रस्ताव अब भी किसी नई किताब का इंतज़ार कर रहा है।

“अगर आप देखते हैं कि किसी चैनल ने कुछ गलत दिखाया है जो कि तथ्यात्मक रूप से गलत था, उसको चैनल का नाम लेकर आप उठाएंगे। जैसे इन भाई साहब ने बहुत अच्छा सुझाव दिया, कि एक पब्लिक ट्रायल भी किया जा सकता है। दिल्ली के अंदर आप 8-10 जगह फिक्स कर दीजिए। और वहां जनता को इकट्ठा कीजिए। और दिखाइए कि इस चैनल ने ये दिखाया था। ये झूठ है। ये जनता का ट्रायल शुरू किया जा सकता है।”

३ मई को एक न्यूज़ वेबसाइट के लांच के वक्त जब वहां मौजूद किसी व्यक्ति ने सुझाव दिया तो मंच पर बैठे दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने तुरंत लपक लिया कि मीडिया का पब्लिक ट्रायल होना चाहिए। आए दिन हमें ट्रेन से लेकर बस स्टाप पर ऐसे बहुत से लोग मिलते रहते हैं जो भारत की समस्याओं का निदान भीड़तंत्र और तानाशाही में बताने लगते हैं। आप जानते ही हैं कि भीड़तंत्र में फैसला वहां लाई गई जनता मारने का फैसला करती है कानून नहीं। ऐसे लोगों को लगता है कि फलां नेता हिटलर हो जाता तो सबको ठीक कर देता। ये वो लोग हैं जो खुद बीमार होते हैं और दुनिया को दवाई बांटते रहते हैं। एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के मन में इस ख़्याल के प्रति सहमति बता रही है कि बहुत कुछ गड़बड़ है। अरविंद केजरीवाल लोकतंत्र और संविधान के प्रति अपनी निष्ठा को ही संदिग्ध बना रहे हैं। पब्लिक ट्रायल की कानून में कोई व्यवस्था नहीं है। यह सीधे सीधे लोगों को उकसाना है।

अरविंद केजरीवाल ने पब्लिक ट्रायल के प्रस्ताव से सहमति जताने से पहले मीडिया के कुछ हिस्से की भूमिका के बारे में जो कहा उससे कोई असहमति नहीं है। यह पाठकों को जानना चाहिए कि कई चैनल आम आदमी पार्टी का बहिष्कार करते हैं। चुनावों के दौरान उनका कोई पक्ष नहीं रखा जाता था। उनकी तभी कवरेज़ होती है जब किसी न्यूज़ में विवाद की संभावना होती है। उन चैनलों की भाषा देखेंगे तो निश्चित रूप से टारगेट किया जाता लगेगा। जैसे ठान लिया गया हो कि इस पार्टी को खत्म कर देना है। यही नहीं मीडिया ट्रायल का यह काम एक और ख़तरनाक स्तर पर चला गया है। दो चैनलों की खुलेआम लड़ाई सार्वजनिक हो चुकी है। आए दिन इन चैनलों पर एक दूसरे के प्रबंधन के खिलाफ ओछी बातें की जाती हैं। पर कमियां गिना कर जो सुझाव दिया जा रहा है वो अपने आप में महामारी है।

मीडिया ट्रायल का स्वरूप बदल गया है। तमाम दलों के आई टी सेल आए दिन किसी चैनल या पत्रकार का ट्रायल करते रहते हैं। इस खेल में वे अपने विरोधी नेताओं का भी ट्रायल चलाते हैं। अचानक से किसी बात पर सैंकड़ों ट्वीट का हमला हो जाता है। यह सब प्रायोजित और सुनियोजित होता है। इस क्रम में अब सिर्फ मीडिया ट्रायल नहीं होता है। राजनीतिक दल भी मीडिया का ट्रायल करते हैं तो मीडिया भी राजनीतिक दलों का ट्रायल करता है। मीडिया में मीडिया का भी ट्रायल चलता है और सोशल मीडिया में तो किसी का भी ट्रायल लांच हो सकता है। पब्लिक ट्रायल के पहले से ही पब्लिक ट्रायल चल रहा है जिसमें इन पार्टियों के आई टी सेल और उऩके समर्थकों का समूह शामिल है।

बांग्लादेश में धार्मक अंधभक्ति के ख़िलाफ अभियान चलाने वाले ब्लागर अविजित राय को सरेआम मार दिया गया। फ्रांस में शार्ली एब्दो पत्रिका के पत्रकारों को गोलियों से भून दिया गया। क्या हम जाने अनजाने में पब्लिक ट्रायल की बात कर ऐसी मानसिकता को बढ़ावा नहीं दे रहे हैं। आम आदमी के प्रवक्ता आशुतोष ने कहा कि अदालतें फैसला देने में देरी करती हैं। क्या इस आधार पर तमाम फैसले जनता अपने हाथों में ले और चौराहे पर बिना वकील और दलील के ही सज़ा सुना दे। सबको जल्दी न्याय का इंतज़ार है लेकिन एक दल को इतनी बेसब्री क्यों है। अदालत के ट्रायल में तो वकील दलील गवाह सबूत सबका मौका मिलता है। पब्लिक ट्रायल का आइडिया तो अदालत की संस्था को भी चुनौती है।

क्या अरविंद केजरीवाल पब्लिक ट्रायल का आइडिया सौंप कर उस पब्लिक को रोक पायेंगे कि फलां चैनल के अलावा किसी का ट्रायल मत करना। तब क्या होगा जब कोई दूसरा दल किसी और चैनल की सुपारी ले ले जैसे कि कुछ चैनल कुछ दलों की सुपारी लिये बैठे हैं। हालत इतनी बिगड़ चुकी है कि आंतरिक नियंत्रण के नाम पर बनी मीडिया पंचायत भी बेअसर साबित हो रही है। पर यही काम तो सोशल मीडिया के आई टी सेल के ज़रिये भी हो रहा है। इसका मतलब यह नहीं कि किसी को गठिया है तो उसे कैंसर का रोग पकड़ा दिया जाए कि कैंसर की पीड़ा के आगे गठिया का दर्द कम हो लगेगा। तब क्या होगा जब नेताओं का पब्लिक ट्रायल होने लगे। हम कहां जा रहे हैं सोचना चाहिए।

मीडिया को ज़रूर अपने अंदर झांकना चाहिए। यह सवाल उठाने के लिए दिल्ली के मुख्यमंत्री के पास अनेक अवसर और तरीके हैं। वो ख़त लिखने से लेकर अखबारों में लेख तक लिख सकते हैं। उनके पास कुप्रचारों का मुकाबला करने के प्रचुर साधन है लेकिन अपने खिलाफ उठते आरोपों से निपटने का काम पब्लिक को सौंप देने के विचार से सतर्क रहना चाहिए। मीडिया को लेकर नेताओं की सहनशीलता आए दिन कम होती जा रही है। इस पैमाने पर कोई नेता खरा नहीं उतरता है। सभी अपने तरीके से मीडिया को साधने के खेल में लगे रहते हैं। उनकी यही लत  किन्हीं कमज़ोर क्षणों में ऐसे सुझावों की तरफ धकेल देती है जो लोकतंत्र और एक सभ्य समाज के लिए बेहद ख़तरनाक हो सकता है।

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