राम का नाम बदनाम न करो

व्हाट्स अप के गुप्त संसार में कोई तो है तो मेरे नाम से अनाप-शनाप मैसेज बनाकर फैलाता रहता है। ये शख़्स या समूह प्रधानमंत्री मोदी के विरोध की कुंठा या इच्छा रखता है। ख़ुद अपना चेहरा सामने नहीं रख सकता तो हम जैसों का इस्तमाल करता है। मूर्खता के इस दौर में अच्छे भले लोग भी इन्हें सही मान लेते हैं। भला हो उन मित्रों का जिन्होंने चिन्ता जताई कि इस तरह के मैसेजों का प्रसार ठीक नहीं है। यह काम दोनों तरह के लोग कर सकते हैं। एक जो विरोधी हैं और वो जो प्रधानमंत्री के समर्थक हैं। इस तरहतो मैसेज फैलाने से अंत में यही मैसेज चला जाता है कि मैं कोई मोदी विरोधी पत्रकार हूँ और उनके ख़िलाफ़ अनाप-शनाप बोलता लिखता रहता हूँ। समर्थक समूह का काम बन जाता है। आम लोग यही समझ लेते हैं कि मैंने कोई विरोध का झंडा उठाया हुआ है क्योंकि पढ़ते तो हैं नहीं। बस व्हाट्स अप देखा, मान लिया।

अक्सर मेरे बारे में ऐसी राय रखने वाले वो लोग होते हैं जिन्होंने न तो कभी मेरा शो देखा होता है और न ही कस्बा पर मेरा लेख पढ़ा होता है। जब मैं उनसे पूछता हूं कि बताइये किस शो में ऐसा कहा है तो चुप हो जाते हैं। मैंने जो भी लिखा है वो इसी कस्बा(naisadak.Org) और ndtv.in पर लिखा है। बाकी हिन्दी के अख़बार 2014 के बाद से मुझे लिखने लायक नहीं समझते हैं। उसके पहले इतना फोन आता था कि लगता था कि मैं न लिखूं तो अख़बार न छपेगा। उन्हें भी यही डर लगता होगा कि कहीं कुछ सरकार को लेकर लिख दिया तो तोंद पर सिकुड़े स्वेटर के धागे ढीले हो जाएँगे। वैसे आजकल के संपादक स्मार्ट होते हैं! देखने में भी और लिखने में भी। वैसे एक अख़बार है जिनके संपादक फोन करते हैं। मैं ही नहीं लिख पाता क्योंकि मुझे लिखने के बाद देरी बर्दाश्त नहीं होती। तुरंत कस्बा पर छाप देता हूं।

बहरहाल मित्रों इस तरह के मैसेज देखें तो समझ लें कि मैंने नहीं कहा है। कभी कभार जो प्राइम टाइम या किसी भाषण में बोलता हूँ,उसका मैसेज बोर्ड बनाकर लोग चलाने लगते हैं। वो एकदम ठीक है क्योंकि वो मैंने बोला है लेकिन जो नहीं बोला है उसे लेकर इस तरह के अफवाह फैलाना उचित नहीं हैं। वो भी हमारे प्रात:स्मरणीय प्रियतम प्रधानमंत्री को लेकर,जिनकी विजय की मैं नित कामना करता हूँ। अगर किसी को प्रिय प्रधानमंत्री का विरोध करना है तो वो अपने दम पर करे। अपना चेहरा लगाए। यह कहाँ लिखा है कि मैं शूली लेकर घूमता रहूँ और हर चौराहे पर खड़ा करके उस पर टंग जाऊँ। मेरा काम विरोध करना नहीं है दोस्तों। सवाल करना। विरोध की ज़िम्मेदारी जिनकी है वो करें।

वैसे एक बात और कहनी है। अलग बनना एक तरह की सज़ा है जिसे हर मसले पर आप भुगतते रहते हैं। काश मैं भी सबके जैसा होता तो हर दूसरा मेरे अंतर्विरोधों की याद दिला कर मुझे झाड़ न रहा होता। जो सत्ता की धूल-मिट्टी में मिल गए, वहाँ से तो तिलक लगाते हैं। हैं न ! भाषण पढ़ लिया, अब वो तस्वीरें देखिये जिन्हें लेकर भाषण दिया।

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जैसे नीचे की तस्वीर में मुझे जो कोट किया है,वो लगता है कि मैंने प्राइम टाइम में बोला था। ये ठीक है। मगर ऊपर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर जो छपा है,मैंने इस पर कोई प्राइम टाइम नहीं किया। कहीं भाषण नहीं दिया। अव्वल तो इस फैसले को पढ़ा तक नहीं है।

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