हे पाकिस्तान के परवरदिग़ार !

“मेरे बेटे ने 16 दिसंबर की घटना में अपने कई दोस्त गंवा दिये हैं। घटना की रात के बाद से वो खाना नहीं खा पा रहा है। अपनी मां से बात नहीं कर पा रहा है। हम कल्पना कर सकते हैं कि जिन्होंने अपने भाई बहन गंवाएं हैं उन पर क्या दिमागी असर पड़ा होगा। मुझे तो लगता है कि ये बच्चे ज़िंदा बचकर भी ज़िंदा नहीं हैं। अफगानिस्तान को कड़ा संदेश देना ही होगा। मैं अपने बच्चे को फिर से मुस्कुराता देखना चाहता हूं। अगर इस घटना के ज़िम्मेदार लोगों को सज़ा मिलेगी तो शायद वो फिर से मुस्कुरा सकेगा। “

ये बयान एक पाकिस्तानी बाप मोहम्मद शोएब का है जिसने पाकिस्तान के अखबार डान की वेबसाइट पर ज़ाहिर किया है। यह बयान बता रहा है कि पाकिस्तान का सब्र टूट गया है। वो आतंकवाद को कभी मज़हब तो कभी मुल्क की सियासत का नसीब मानकर जीता रहा होगा लेकिन अब ऐसा नहीं है। पहले भी पाकिस्तान में आतंकवाद के खिलाफ कुछ लोग आवाज़ उठाते रहे हैं लेकिन आज ये तादाद कई गुना बढ़ गई है। जनता ने आतंकवाद को ऐसे खारिज किया है कि वहां की सत्ता सेना और सियासत इन सबका आतंक से गठजोड़ भरभरा गया है। अब ये तीनों आतंकवाद के ख़िलाफ़ अपनी आवाम के सामने गंभीर दिखना चाहते हैं। कुछ करते हुए दिखना चाहते हैं। लोग हैं कि अब नतीजा चाहते हैं।

आतंकवाद के खिलाफ भारत से भी आवाज़ उठ रही है। ये आवाज़ इस बार पाकिस्तान के ख़िलाफ़ नहीं है बल्कि उसके साथ के लिए है। हिन्दुस्तान की संसद,स्कूल सब शोक मना रहे हैं। किसी से भी पूछ लीजिए ऐसा लगता है कि घटना पेशावर में नहीं उसके अपने शहर में हुई है। भारत में बड़ी संख्या में लोग ट्वीट कर रहे हैं कि हम पाकिस्तान के साथ हैं। पाकिस्तान में लोग कह रहे हैं कि अगर आतंकवाद को मिटाने में भारत के साथ की ज़रूरत है तो साथ लेना चाहिए। आतंकवाद के ख़िलाफ जनमत कभी इतना तार्कित नहीं हुआ था। वो इस बार भावुक से बहुत कुछ ज्यादा है। यह जनमत 26 नवंबर के मुंबई हमले के बाद के गुस्से से काफी अलग है। इस बार दोनों मुल्कों के लोग आतंकवाद के साथ मिलकर लड़ना चाहते हैं।

सोमवार को सिडनी की एक घटना ने हम सबको एक नया रास्ता दिखाया है। जिस वक्त कैफे में कई लोगों की जान फंसी हुई थी सिडनी के लोग ट्वीटर पर ये चिन्ता कर रहे थे कि आतंकवादी मुस्लिम होने के कारण कहीं सिडनी के मुस्लिम शहरियों को निशाना न बनाया जाने लगे। सिडनी के लोग ट्वीट कर रहे थे कि आप मुस्लिम पहचान और पहनावे के साथ ही शहर में निकलिये। हम आपके साथ आयेंगे ताकि आप पूरी तरह सुरक्षित महसूस करें। पहली बार ऐसा हो रहा है जब जान की कीमत पर भी लोग अपनी समझ पर पकड़ बनाए रखे हुए हैं। वे इसे किसी धर्म से जोड़कर उस धर्म के बाकी अनुयायियों की पहचान आतंकवादी के रूप में नहीं करना चाहते। सिडनी से चली यह समझदारी भारत और पाकिस्तान में भी पहुंच गई है।

इस वक्त लोगों ने धर्म के चश्मे से आतंकवाद को देखना छोड़ दिया है। वो यह समझ रहे हैं कि मज़हब का काम जितना रूहानी सुकून पैदा करना नहीं रह गया है उससे कहीं ज्यादा इसके नाम पर नफ़रत फैलाने वाली,हैवान पैदा करने वाली और संगठित रूप से ताकतवर जमातें पैदा हो रही हैं। अब इन लोगों को यह मौका नहीं मिलना चाहिए कि ये हमारी ज़िंदगी तय करें। तालिबान किसी धर्म की पैदाइश नहीं है। वो अमरीका रूस अफगानिस्तान ब्रिटेन की रणनितियों के बीच से जन्मा वो नासूर है जो अब पाकिस्तान को ही लील रहा है जो अब तक उसकी शरणस्थली बना हुआ था। पाकिस्तान ने तालिबान के खिलाफ ज़र्ब-ए-अज़्ब नाम से आपरेशन चला रखा है। दावा किया जा रहा है कि इसके तहत 1800 से भी ज्यादा तालिबानी मारे गए हैं। पर क्या इसके बाद भी तालिबान का इतना हौसला बचा रह गया कि वो सेना के इलाके में ही स्कूल में घुस कर बच्चों को मार दे। यह सब सवाल है जिसे आने वाले दिनों में सेना को देना होगा।

पेशावर की आर्मी पब्लिक स्कूल की एक एक तस्वीर पाकिस्तान को रूला ही नहीं रही,जगा भी रही है। वो अपने नेताओं और सेना से अब कुछ ऐसा चाहता है जिससे आतंकवाद ख़त्म होता दिखे। वो आतंकवाद को भारत से बदला लेने की तरकीब मानकर चुप नहीं रहने वाला। वो समझ गया है कि यह नासूर अब उसके आवाम को चुभ रहा है। पाकिस्तानी सेना को सबसे व्यवस्थित संस्था माना जाता है। इस सेना के बीच के क्रम के अफसरों का धार्मिक कट्टरवाद काफी बढ़ा है लेकिन मारे गए बच्चे इन्हीं अफसरान के हैं। सेना हिल गई है। उसकी साख उसी पाकिस्तान में कमज़ोर पड़ गई है जहां लोग इस बात को दाल में नमक के साथ स्वीकार करते हैं कि आई एस आई के कब्ज़े में आतंकी सलाहुद्दीन है तो हाफिज़ सईद। कई सियासी दलों के ताल्लुकात तहरीके तालिबान से रहे हैं। अब यह सब गठजोड़ कमज़ोर पड़ता दिख रहा है। ठीक है कि मुंबई हमले के आरोपी आतंकी लखवी के ज़मानत पर रिहा होने की खबरें आ रही हैं,लेकिन उसी वक्त जब भारत के टेलीविजन चैनल आग उगल रहे थे पाकिस्तान के टीवी चैनल पेशावर जेल में आतंकवादियों के फांसी दिये जाने की तैयारी की ख़बरें दिखा रहे थे। पाकिस्तान ने फैसला किया है कि आतंक के आरोप में जेलों में बंद कैदियों को फांसी दी जाएगी। मुशर्रफ जैसे लोग भारत विरोधी बयान देते रहेंगे । ऐसी आवाज़ें इतनी जल्दी नहीं बदलेंगी लेकिन हम अगर इन्हीं आवाज़ों के आस-पास चक्कर काटते रहे तो उन लाखों लोगों की आवाज़ को अनसुना कर देंगे जो पाकिस्तान और भारत ही नहीं,पूरे दक्षिण एशिया से आतंकवाद के ख़ात्मे के ख़िलाफ आगे आ रहे हैं।

कमज़ोर न होता तो पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल राहील पेशावर हमले के मास्टरमाइंड की तलाश में अगले ही दिन काबुल रवाना नहीं होते। राष्ट्रपति ने उन आठ आतंकियों की फांसी की सज़ा की अपील रद्द न की होती जो 2012 से उनके पास पड़ी है । नवाज़ शरीफ़ ने फांसी की सज़ा पर लगी रोक न हटाई होती जिससे वहां की जेलों में बंद 8000 आतंकियों की जान बची हुई थी। सोशल मीडिया पर पाकिस्तानी आवाम का गुस्सा वैसी ही भड़का है जैसा 26 नवंबर को मुंबई हमले के बाद यहां भड़का था। पाकिस्तान के लोग इन सभी आतंकवादियों को 48 घंटे के भीतर फांसी पर लटका देने की मांग कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर पाकिस्तानी लिख रहे हैं कि पाकिस्तान ही नहीं दक्षिण एशिया को ही आतंकवाद से मुक्त करना होगा। वो समझ गए हैं कि यह कहीं भी हो बेकसूर लोगों की जान लेता है। इसे मज़हब और मुल्क के नाम पर जायज़ नहीं ठहराया जा सकता।

उम्मीद की जानी चाहिए कि पाकिस्तान की घटना सकारात्मक नतीजे लाएगी। इस नतीजे में सबसे बड़ा नतीजा होगा कि इस पार या उस पार हम सब धर्म के नाम पर ऐसे हिंसक संगठनों को भावुकता या आस्था के पैमाने से देखना बंद कर देंगे। हम समझने लगेंगे कि तालिबान हो या आतंकवाद या सांप्रदायिकता ये सब ऐसे स्कूलों की तलाश में हैं जहां हमारे बच्चों को मार सकें या फिर उन्हें अपने जैसा वहशी बना सकें। आतंकवाद से नेता नहीं लड़ सकते। इन्हीं नेताओं ने अलग अलग कारणों से इसे जन्म दिया है और पाला पोसा है। वे इंटरनेट पर नए नए पासवर्ड बनाकर या नए नए कमांडो फोर्स बनाकर इसे नहीं मिटा सके हैं। हर मुल्क में कोई न कोई नया ए वन या बी वन कमांडो फोर्स पैदा हो जाता है मगर आतंकवाद अपना रास्ता खोज लेता है। ज़रूरी है कि अब अवाम यानी जनता आतंकवाद से लोहा ले। इस लड़ाई की पहली शर्त है कि वो अपने सांप्रदायिक पूर्वाग्रहों से लड़ना सीखे।

( यह लेख प्रभात ख़बर में छप चुका है)