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  • अकेलेपन का अंडमान भोगते आडवाणी

    अकेलेपन का अंडमान भोगते आडवाणी

    भारतीय जनता पार्टी का यह संस्थापक विस्थापन की ज़िंदगी जी रहा है। वो न अब संस्कृति में है न ही राष्ट्रवाद के आख्यान में है। मुझे आडवाणी पर दया करने वाले पसंद नहीं हैं, न ही उनका मज़ाक उड़ाने वाले। आडवाणी हम सबकी नियति हैं। हम सबको एक दिन अपने जीवन में आडवाणी ही होना है। सत्ता से, संस्थान से और समाज से। मैं उनकी चुप्पी को अपने भीतर भी पढ़ना चाहता हूं। भारत की राजनीति में सन्यासी होने का दावा करने वाला प्रासंगिक हो रहे हैं और सन्यास से बचने वाले आडवाणी अप्रासंगिक हो रहे है। आडवाणी एक घटना की तरह घट रहे हैं। जिसे दुर्घटना के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।