नैनो नाम के सपने की मौत हो रही है…एलान बाकी है

टाटा नैनो ने भारत की राजनीति में बड़े कांड कराए हैं। बंगाल से लेकर गुजरात तक। इस कार ने लोगों की आंखों में खूब सपने झोंके। मुझे याद है कि जब प्रगति मैदान में नैनो आई थी तो उसे देखने के लिए लोग कैसे कैसे सपने लेकर आए थे। विदेशों में भी इस कार ने खूब दिलचस्पियां पैदा की थीं। एक बार उन सपनों, मीडिया कवरेज और राजनीति को लौट कर देखना चाहिए। तब पता चलेगा कि बाज़ार के सपने कितने बाज़ारू होते हैं।

बिजनेस स्टैंडर्ड की ख़बर है कि डीलर ने टाटा नैने कार का आर्डर देना बंद कर दिया है। अब साणंद के नैनो प्लांट में हर दिन दो ही नैनो कार बनती है। ज़ाहिर है इस कार के उत्पादन को लेकर कितना रोज़गार पैदा हुआ और अभी कितना है इसका भी मुल्यांकन किया जा सकता है। यह सब सूचनाएं हमें बेहतर कर सकती हैं बशर्ते हम पदमावती जैसे मसलों से छुटकारा पा लें।
हर शनिवार को T N NINAN बिजनेस स्टैंडर्ड में एक संक्षिप्त संपादकीय लिखते हैं। आपको पढ़ना चाहिए क्योंकि हिन्दी के बड़े अख़बारों के संपादकों से अब आपको कुछ मिलना नहीं है। वे बस किसी प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री से मुलाकात की यादों से प्रभावित होकर ही लिखने योग्य बचे हैं। उनकी पूरी ज़िंदगी बचाने में निकल जाती है और बाकी ज़िंदगी संस्मरण बताने में। उनसे बेहतर तो छोटे वेबसाइट के पत्रकार खुलकर लिख रहे हैं। इसलिए हिन्दी के बड़े अख़बारों को आप सावधानी से पढ़ें। ट्रक-ट्राली की टक्कर छाप समाचारों से ज्यादा जानना है तो।

हम जीएसटी की ख़ूबियों को जितना ज़्यादा समझने का प्रयास करते हैं उससे कहीं ज़्यादा सवाल उभरने लगते हैं। यह एक ऐसी हड्डी है जो अर्थव्यवस्था के गले में अटक गई है। टैक्स समस्या नहीं है। भारत की अर्थव्यवस्था मध्यम और छोटे-छोटे बिजनेस पर टिकी होती है। ये छोटे कारोबार टैक्स की जटिलता का सामना नहीं कर पा रहे हैं। क्या पहली बार टैक्स देने के कारण है या इसके फायदे से ज़्यादा नुकसान हैं। तब समझना चाहिए कि जीएसटी सिर्फ विकसित अर्थव्यवस्था के ही लिए उपयुक्त है। न कि वैसी अर्थव्यवस्था के लिए जो असंगठित क्षेत्रों के सहारे चलती है।

अच्छी ख़बर है कि जीएसटी से राजस्व वसूली शानदार हुई है। सरकार ने दरों में जो कटौती की है वह यह भी बताती है कि उसे राजस्व वसूली को लेकर भरोसा हो गया है। अगर आगे भी कटौती करती है तो यह इस बात का सूचक है कि सरकार राजस्व वसूली को लेकर आत्मविश्वास से लबालब है। लिहाज़ा टैक्स वसूली का पहला लक्ष्य हासिल कर लिया गया है।
लेकिन क्या हम उस इलाज को सफल कह सकते हैं जिसके बाद मरीज़ को दूसरी और बीमारियां हो जाएं। टैक्स भरने की प्रक्रिया ने छोटे कारोबारियों को तोड़ दिया है। इसके बाद टी एन नाइन कुछ उदाहरण रखते हैं।

70 लाख कारोबारियों ने जीएसटी अपनाया है। इसमें से 25 से 30 प्रतिशत ने अभी तक जीएसटी नहीं भरा है। जो जीएसटी फाइल कर रहे हैं उसमें से 40 फीसदी ने ज़ीरो रिटर्न भरा है। जो लोग टैक्स भर रहे हैं उनमें से 95 फीसदी ने 20,000 से अधिक टैक्स नहीं दिया है। इसका मतलब है कि उनका सालाना टर्नओवर 1 करोड़ से अधिक नहीं है। हो सकता है जो 25-30 प्रतिशत जीएसटी रिटर्न नहीं भर रहे हैं वे भी छोटे कारोबारी हों।

अब नाइन कहते हैं कि जब लाखों कारोबारी जीएसटी नहीं भर रहे हैं और जो भर रहे हैं उनके बीच जो खरीद बिक्री के बिल हैं, जीएसटी रिटर्न में मैच करना मुश्किल है। असंभव जैसा है। जब तक ख़रीद बिक्री के बिल मैच नहीं करेंगे तब तब जीएसटी का कोई मतलब नहीं रह जाता है। इसका मतलब है कि कच्चा पक्का बिल का सिस्टम चल रहा है। उम्मीद करनी चाहिए कि जीएसीट सिस्टम को और भी सरल किया जाएगा ताकि यह अंतर न रहे। इसके अलावा इस सोने की हड्डी को गले से निकाल फेंकने का विकल्प अब हमारे पास नहीं है। हम उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते हैं।