क्यों भूल जाना चाहेंगे आप, हिन्दी मीडियम देखने के बाद

हिन्दी मीडियम फ़िल्म अपने आख़िरी सीन में ज़्यादा क्रूर है। वास्तविक और ईमानदार है। इरफ़ान अंग्रेज़ी और अमीर समाज के ज़रिये देश को नैतिकता का लेक्चर देते हैं मगर बदले में उन्हें सन्नाटा मिलता है। कोई ताली नहीं बजाता है। एक दो लोग इरफ़ान की बातों की प्रतिक्रिया में कुर्सी से हिलते हैं मगर उनकी पत्नियां हाथ पकड़ लेती हैं। मतलब नैतिक और ईमानदार भाषणों से जज़्बात में नहीं बहना है, हमने जिन समझौते से बड़े स्कूलों में अपने बच्चों का एडमिशन कराया है, उसे भावुकता में वापस में नहीं लेना है। उस सीन और हॉल से इरफ़ान को अकेले निकलना पड़ता है। वो सिर्फ इरफ़ान का अकेलापन नहीं था, हम जैसों का भी अकेलापन है, जो समझते हैं कि लिख देने से, बोल देने से दुनिया को फर्क पड़ेगा।

श्याम चाचा, जिनके बच्चे का एडमिशन नहीं होता है, मगर वो पिया को देखकर अपने हक़ का सवाल भूल जाते हैं। दिल्ली के भारत नगर में ख़ुद को ख़ानदानी ग़रीब कहने वाला श्याम चार दिनों के लिए ग़रीब होने का अभिनय करने वाले राज बत्रा के परिवार के संपर्क में आता है। इतने कम समय में श्याम राज बत्रा की बेटी पिया के लिए अपना हक़ छोड़ देता है। लेकिन वर्षों से आते-जाते ग़रीबों को देखते रहने वाले वसंत विहार जैसी जगहों की मानसिकता वाले लोग ग़रीबों के हक़ के लिए हॉल से बाहर नहीं आते हैं। हिन्दी मीडियम, समाज में पहले से मौजूद इस अंतर को जस का तस धर देती है।

2009 में बना था सबको शिक्षा का अधिकार कानून। दशक की लड़ाई के बाद बना था। इस लड़ाई में वो लोग नहीं थे जो आज फेसबुक या ट्वीटर पर लिबरल या मानवाधिकार या सामाजिक कार्यकर्ताओं को गरियाते रहते हैं, उन्हें भारत विरोधी बताते रहते हैं। अनिल सदगोपाल, दिवंगत विनोद रैना, अनिता रामपाल, अशोक अग्रवाल जैसे लोगों ने काफी संघर्ष किया। 8 साल बाद इस कानून को केंद्र में रखकर किसी ने फ़िल्म बना दी है। फ़िल्म लिखने वाली ज़ीनत लखानी लगता है कि क़ैफ़ी आज़मी के दौर की लेखिका है। ऐसे लोगों को अम्मू जैसी फ़िल्म लिखनी चाहिए। निर्देशक साकेत चौधरी और उनके कैमरामैन की तारीफ बनती है, बग़ैर समाज के समझ की, तस्वीरें नहीं बनती हैं। निर्देशन होता नहीं है। इरफ़ान की तारीफ़ अब क्या करें। राज बत्रा, यादगार किरदार रहा है। हिन्दी मीडियम पति कैसे अपना हिन्दीपन भूलता है और जब उस पर लौटता है तो अपनी मुक्ति के लिए न कि दुनिया में बाग़ी पैदा करने के लिए। चांदनी चौक से वसंत विहार के सफ़र में कितना कुछ गंवा देना पड़ता है, यह अंतर देखकर रवीश की रिपोर्ट की याद आ गई। भारत नगर के बहाने शहरों के व्यापक यथार्थ को क्या ख़ूब पकड़ा है। डेंगू चिकनगुनिया के मोहल्लों और पानी के झगड़े।

सरकारी स्कूल ऐसे ही खंडहर नहीं हुए हैं। कांग्रेसी राज में भी खंडहर हुए हैं और भाजपाई राज में भी। जहां भाजपा पंद्रह पंद्रह साल से राज कर रही है, उन राज्यों में वही हालत है, जहां कांग्रेस दशकों से राज करती रही है। यह एक एजेंडे के तहत हुआ है जिससे न कांग्रेस को नफ़रत है और न भाजपा को। इसलिए सरकारी स्कूलों पर तरस खाकर बेंच लगवा देने, बाथरूम बनवा देने की नैतिकता से भी असहज होना चाहिए। जो पैसा सरकारें स्कूलों के लिए तय करती हैं, वही ईमानदारी से ख़र्च हो जाएं, तो आपको हमको इस असहजता से गुज़रने की ज़रूरत नहीं होगी। इस फिल्म में इसी बिन्दु पर मुझे लगा कि हॉल से बाहर चले जाना चाहिए, ठीक वैसे जैसे आख़िरी सीन में इरफ़ान हॉल से बाहर चले जाते हैं। सरकार के बजट का पैसा लूट के रास्ते चुनावी ख़र्चों में बहने लगे, और हम पर ये अपराध बोध थोपा जा रहा है कि अपने पैसे से स्कूल बनवा दें। बेहतर होता कि फिल्म इस सवाल से भी दर्शकों को दो चार होने देती कि आपने सरकार को टैक्स तो दिया है मगर उस पैसे को वही लोग लूट ले गए जो एडमिशन के बदले शराब और बंदूक के लाइसेंस बांट रहे थे।

पड़ोस में स्कूल की नीति तो बन जाती है मगर पड़ोस में स्कूल ही नहीं होते हैं। पार्क तक नहीं होते और पार्कों की ज़मीन पर बिल्डर, नेता मिलकर एक और अपार्टमेंट बना देते हैं। मुझे एक दिवंगत आई ए एस अफ़सर की याद आती है। मदन मोहन झा की। बहुत दिनों तक उनकी इस मसले पर किताब अपने पास रखा, पढ़ा भी मगर दूर कर दिया क्योंकि होता तो कुछ है नहीं। सरकारी स्कूल अब नहीं बनते हैं। अच्छे शिक्षक वहां बहाल नहीं होते हैं। उन्हें शिक्षक सिर्फ शिक्षक दिवस को समझा जाता है, बाकी समय वे मंत्रियों और योजनाओं के चाकर होते हैं। यह सब कल भी था, यही सब आज भी है। दिल्ली के सरकारी स्कूलों पर ध्यान तो दिया जा रहा है मगर वो अभी भी पब्लिक स्कूल का विकल्प नहीं बन पाया है।

हिन्दी मीडियम फ़िल्म के दर्शक जानते हैं, फ़िल्म देख लो मगर इससे ज़्यादा प्रभावित न हो। बाहुबली देख लो, उससे प्रभावित हो लो, क्योंकि उसमें हो सकता है लोगों को संस्कृति दिख जाए। संस्कृति के मिथकों या मिथकों की संस्कृति से किसी को एतराज़ नहीं है, लेकिन सरकार की संस्कृति बेहतर हो, उससे किसी को परवाह नहीं है। यह फ़िल्म यथास्थितिवादी फिल्म है। ईमानदारी से कहती है कि जो बदलने की बात करेगा, उसे अकेले हॉल से बाहर जाना होगा लेकिन बता भी देती है कि ग़रीबों का हक़ कौन मार रहा है। मैंने प्राइम टाइम में स्कूलों की मनमानी पर जनसुनवाई की। आठ दिनों तक। सबने कहा किसी को फर्क नहीं पड़ता। लिखा भी लोग स्कूलों के ग़ुलाम हो चुके हैं। इससे भी किसी को फर्क नहीं पड़ा। मैं भी अपने हॉल में अकेले हो गया। स्कूलों के मसले से तौबा ही कर लिया।

हिन्दी मीडियम, हिन्दी बनाम अंग्रज़ी की कुंठा वाली फ़िल्म नहीं है। इस फ़िल्म को वहीं तक सीमित करना ठीक नहीं होगा। यह फिल्म कई स्तरों पर हमारे समाज के मानसिक विकारों को खरोंचती है। भारत नगर ले जाकर स्वाभाविक रूप से बच्चों के खेलने और गिरने के दृश्य की याद दिलाती है। मिट्ठू तो चांदनी चौक की गलियों में ही बड़ी हुई थी, मगर क्लास और अंग्रेज़ी के चक्कर में वो वसंत विहार आती है। आज कल के नौटंकीबाज़ मम्मियों की तरह अपनी बेटी को बड़ा करना चाहती है। दोस्त बनाने के लिए पार्टी देती है मगर फिर भी दोस्त हासिल नहीं कर पाती है। यह फिल्म बताती है कि अंग्रेज़ी और अमीर समाज को, बल्कि आज के मिडिल क्लास भारत को कुछ फर्क नहीं पड़ता है। उसे बाक़ी भारत से कोई मोह नहीं है। वो अपने समझौतों को छिपाने के लिए भारत भारत करता रहता है। राष्ट्रवाद का सहारा लेता है। शानदार फिल्म है। इस फिल्म को इंग्लिश विंग्लिश के साथ देखा जाना चाहिए। कम से कम छात्रों को पहले इंग्लिश विंग्लिश देखनी चाहिए फिर हिन्दी मीडियम। फिर भाषा के सवाल को लेकर समाज और सिस्टम पर चर्चा करनी चाहिए।