रोक इस दुनिया को..अभी रोक, मैं इससे उतर जाना चाहता हूं।- शालीन

मध्यमता मर गई है. मध्यमता( mediocrity) अमर रहे

सोशल मीडिया ने साबित कर दिया है कि हमारी ज़िंदगी छुट्टियों की मौज मस्ती की तस्वीरों से भरी हुई है। इन तस्वीरों में सब कुछ परफेक्ट है। हम सब कितने किस्मत वाले हैं कि प्यार करने वाली, समझने वाली जीवनसाथी मिली है, बच्चे कितने प्रतिभाशाली हैं, और तो और जिनके साथ हम काम करते हैं,कितने शानदार और समझदार हैं। हम सब मां-बाप को बेहद प्यार करते हैं, स्कूल के दिनों को मिस करते हैं( तब भी जब घंटों मुर्गा बनते थे और छड़ी से मार पड़ती थी)और हां, सास ससुर को भी कितना स्नेह करते हैं( भले ही ये सब सुनने में ज़रा विचित्र लगे)

हम अनगिनत अतिविशिष्ट चीज़ों से घिरे हुए हैं, बल्कि साधारण चीज़ों के लिए तो कोई जगह ही नहीं बची है। सब कुछ असाधारण है। अद्भुत है। हम सब अतिप्रतिभाशाली हैं, जीनियस हैं भाई। यकीन नहीं तो आप फेसबुक और व्हाट्स अप पर जो तस्वीरें देख लीजिए, यक़ीन हो जाएगा कि दुनिया कभी इतनी हसीन नहीं थी जितनी कि आज है। इससे पहले हमारी इस प्यारी धरती पर कहां इतने कहां वरदानी, अवतारी, भाग्यशाली और ख़ुशहाल लोग हुआ करते थे।

आख़िर वे सारे अभागे, नाख़ुश और मध्यम दर्जे के लोग चले कहां गए?

मेरे बचपन के वे साधारण पल कहां हैं, जब छुट्टियों का मतलब रोडवेज़ की बस में पसीने से तरबतर और गंघाते यात्रियों के साथ बैठकर लुधियाना से गुरदासपुर जाना होता था। जब पिताओं के पास पैसे कम होते थे और मांओं के पास गुस्सा ज़्यादा होता था। जब क्लास के पांच छह बच्चे ही तेज़ विद्यार्थी माने जाते थे और बाक़ी को उनसे कोई फ़र्क नहीं पड़ता था। और छुट्टियों की तस्वीरें ! हर तस्वीर से पहले हम चर्चा करते थे कि क्या सीन होगा, क्या पोज़ होगा, ज़ाहिर सी बात है तब एक रील में 32 फोटो ही लिये जा सकते थे। आम भारतीय घरों में फैमिली फोटोग्राफ के वक्त ख़राब चेहरा बनाने के लिए चांटा पड़ जाता था, डांट पड़ जाती थी, कई बार घूंसा भी। अब तो मां बाप बच्चों से गिड़गिड़ाते हैं कि प्लीज़ हंस दे, ‘चीज़’ बोल दे, दुलार किया जाता है कि ‘फनी’सा फेस बना दे ताकि फोटोशाप से हाइलाइट कर पोस्ट कर सकें, यादगार रहे कि तुझे सब कितना प्यार करते थे।

इस आधुनिक दुनिया में फेसबुक या सोशल मीडिया के ज़रिये इंसान या परिवार का हिसाब लगाना शुरू कीजिए। सब कुछ वैसा ही अच्छा दिखेगा जैसा करवा चौंथ के दिन उत्तर भारत के घरों में दिखता है। अब भी पंजाबी पति की उसकी अहसानमंद पत्नि कितनी निष्ठा से पूजा करती है, जबकि बहुतेरे साधारण भारतीयों के लिए, इस लेखक के लिए भी, पूरे साल में वही एक दिन होता है जब पत्नियां इस बात का शुक्र मनाती हैं कि चलो कम से कम पति है तो।

1980 के दशक में जब हम बड़े हो रहे थे तब सारे अंतरिक्षयात्री, पायलट और प्रधानमंत्री बनना चाहते थे लेकिन आज सारे मां-बाप को विश्वास हो चला है कि उनका बच्चा भावी प्रधानमंत्री है, नोबल पुरस्कार विजेता है।

पहले तो पूरे मोहल्ले में एक या दो लोग होते थे जिनके पास प्रखर और दूरंदेशी होने की कापीराइट हुआ करती थी, लेकिन आज हर गांव में कोई इडियट भी अपने को भावी विचारक समझता है। व्हाट्स अप मैसेज और फेसबुक पोस्ट के ज़रिये हमारे ऊपर सदविचारों की बमवर्षा की जा रही है। कुछ दोस्तों का तो मिशन ही है कि सुबह 6 बजे से लेकर मध्यरात्रि के बीच अच्छे संदेश पोस्ट करते रहना है। उनका यही लक्ष्य है, ऐसा लगता है कि हमारे आस पास कितने वोल्तेयर हैं, रुसो हैं। आप भले ही ग्रुप से निकल जायें, फेसबुक बंद कर दें लेकिन आप उनके असर से बच नहीं सकते हैं।

अरे, आपने नोटिस किया कि उपवास करना कितना कूल हो चुका है, अब तो पोलिटिकली करेक्ट करवां चौथ होने लगा है, जहां आदमी और औरत साथ साथ उपवास करते हैं( ये लोग मेरे जैसे असहिष्णु के लिए मुश्किल कर देते हैं जो उपवास रखने में ज़रा धीमा है)

तब हम यूं ही अपने आप खेला करते थे,दौड़ा करते थे लेकिन अब तो यह सब ‘एक्टिविटी’ है जिसे हर किसी को करनी ही चाहिए, हो सके तो रोज़ करनी चाहिए।

और हां, हमारे प्रिय और पूजनीय सूरज भगवान जो अनंत काल से हमारी ऊर्जा और चमक के सोर्स थे आज कल विटामिन डी के भी सोर्स हो गए हैं। सर्दी की धूप में लेटना और सुस्ताना तो कब का ख़त्म हो चुका है। अब तो सुंदर और सुंदरियां बनियान और हाफ पैंट पहने धूप में लेटे हुए हैं। बाहों और पांवों को फैलाये हुए ताकि उनके ज़रिये डाक्टरों का बताया हुआ विटामिन डी कंचन काया में प्रवेश कर सके।

दुनिया सचमुच पागल होती जा रही है। हम सबको पागल बनाए जा रही है।

हर बात में पोलिटिकली करेक्ट होने का दौर है। यही स्टाइल है। शारीरिक चुनौतियों का सामना करने वालों के प्रति भले हमारी करुणा वैसी की वैसी हो मगर हमने “विकलांग” को “दिव्यांग” कहना शुरू कर दिया है। अब सिर्फ वो गर्भवती नहीं होती, ‘हम’ होते हैं, ब्रेक अप तो आम बात है, दिल का टूटना और दर्द-ए-दिल आउट आफ फैशन है। हमारी जवानी के दिनों में तो यही बड़ी बात थी कि कोई गर्लफ्रैंड है। अब तो ये कोई बात ही नहीं। ऐसा लगता है कि हर किसी के पास गर्लफ्रैंड है।

करुणा, दान या मदद कुछ भी कीजिए, रिकार्ड होने चाहिए, एकांत का कोई पल नहीं रहा, प्राइवेसी को तो लोग भूल ही चुके हैं। अपनी सेहत के लिए कसरत भी करते हैं तो सबको पता चलना चाहिए। अगर हम अच्छा खाना खा रहे हैं तो उसकी तस्वीर ज़रूर ली जाए। शेयर भी हो। ( ये देखिये हमने आज चिली पनीर खाया, ये देखो घर का बना सूजी का हलवा है, भाभीजी ने क्या ख़ूब केक बनाया है..) सबसे मज़ेदार था जब एक दूर के रिश्तेदार ने फेसबुक पर एक वीडियो पोस्ट किया। उनका बेटा लाल बत्ती पर फुटपाथ पर रहने वाले एक बच्चे की मदद करने की कोशिश कर रहा था। आजकल अच्छा होना भी कितना मुश्किल है न, आपको मदद भी करनी है और वीडियो भी बनाना है।

लोग बताने के लिए मरे जा रहे हैं ( कुछ तो सेल्फी लेने के चक्कर में मर भी गए)

भाषा भी बदल रही है। चंडीगढ़ और दिल्ली में रहने वाले देसी मां-बाप को अंग्रेज़ी में अपने बच्चों और कुत्ते बिल्लियों से बात करते हुए देखकर आप निश्चिंत हो सकते हैं कि अब हमारी मातृभाषा भी वही है जो युवा प्रिंस चार्ल्स की महारानी मां की थी।( टॉमी सिट डाउन, पम्मी कम हियर, टिम्मी डोंट पुट द फिंगर इन योर नोज, कुछ समुदाय और हमारे जैसे परिवारों में तो अब नाम भी एक जैसे होते हैं, उन नामों की अदला-बदली होती रहती है।)

अंत में, उम्र का बढ़ना भी पहले जैसा नहीं रहा। मैं जॉगिंग करने जाता हूं तो मेरे चार दशक पुराने जोड़ चरमराने लगते हैं, शरीर कराहने लगता है। मुझे लगता है कि मन को उदास करने वाली इन बातों को क्यों किसी से साझा करूं बल्कि पर्सनल फिजिशियन को भी न बताऊँ । मुझसे उम्मीद की जाती है कि 40 में ‘नॉटी’ लगूं। मेरे साथ कुछ तो गड़बड़ है। अकेले मुझे ही लगता है कि इस उम्र में शरीर और दिमाग़ के लिए शरारती होना अब मुश्किल है। मैं समझता हूं और कोशिश भी करता हूं कि नए ज़माने के इस फार्मूले को अपना लिया जाए, ये तो बस मेरा शरीर है जो थोड़ा राज़ी नहीं होता है, बल्कि मानता ही नहीं है। जब 60 से ऊपर वाले अंकल और आंटी को देखता हूं कि बाज़ार में बिकने वाले सबसे अच्छे और महंगे केमिकल से अपने बालों को रंगने के बाद हर चीज़ ‘नेचुरल’ खा रहे हैं, तो मैं क्यों नहीं इस दुनिया सा हो जाता हूं, उनकी तरह हो जाता हूं। फिलहाल मुझे भी एक ब्रेक की ज़रूरत है।

इस दुनिया को रोको, अभी रोको, मैं इससे उतर जाना चाहता हूं।

शालीन, आईपीएस अधिकारी हैं।