गेस्ट ब्लॉग : कभी स्वपन में आना महात्मा

यह कविता कस्बा के पाठक अतुल कुमार नें लिखी है।

Gandhi

 

 

 

 

 

मेरे स्वपन में आना कभी महात्मा
दिव्य-स्वपन न देखा कभी बंद आँखों से,
अधिकार है तुम पर सुन ऐ अमर आत्मा
तेरे देश वंसज देखते सपने खुलीं आँखों से।

मानस पटल से धूमिल होती माँ की छवि
अनजान सा हुँ सजीव निस्छल आँखों से,
व्यस्त हो तो पुज्य प्रार्थना करता तुच्छ कवि
दुविधा हो तो सँवाद भेजना नेताजी की आँखो से।

तुम्हारे उपदेश की चाह नहीं रखता है अब मुल्क
स्वपन मे आना अन्यथा मेरी तरह सिसकियाँ भरोगे,
बचकर आना नहीं तो हवा पर भी लगता है शुल्क
निशा ओढ़ना नहीं तो भक्तोँ की अलग सुनोगे।

सुना वाणी से सम्मोहित होती थी जन मानस
रक्त कतरा-कतरा अनुरोध पर मिलता था तुम्हे,
खुन गैर का आज भी आह्वाहन पर है आनन फ़ानन
छद्म मंज़िल हासिल तो रास्ते से क्या मतलब हमेँ।

तेरी आँखों में जो था सच्चाई, कशिश का अफ़साना
पुस्तकों मुर्तियों और चित्रों तक ही सिमट गयीं है,
मक्कारी, घृष्टता, प्रतिशोध, अवमानना, और कायराना
आँखें पढ़ने की ईच्छा शक्ति भी हमसे निपट गयी हैं।

हम और हमारे सियासतदां एक दूजे से हैं कतराते
धर्म, उन्माद, भ्रष्ट, विकास, कि कंटस्थ हैं परीभाषा,
शिक्षा और श्रवण से हम भारत -संतान हैं घबराते
वात्सल्य भरी मुस्कुराती आँखों में कितनी बची आशा।

हालात -ए- मुल्क तब बदलते है सियासतदां
अवाम जब तलक पूछती औ पकडती है गिरेबान।

फोटो क्रेडिट : कार्थिक  अय्यर