महानैतिकताओं का महाराष्ट्र

“एन सी पी का समर्थन लेने से हमारी बदनामी नहीं होगी।“ महाराष्ट्र बीजेपी के नेता एकनाथ खडसे का यह बयान भारतीय राजनीति के नैतिक बयानों में से एक है क्योंकि भारतीय राजनीति की नैतिकता भी यही है। विश्वासमत के ठीक पहले राजीव प्रताप रूडी ने भी तो कह दिया था कि हम कांग्रेस छोड़कर किसी से भी समर्थन ले सकते हैं। खडसे साहब जानते हैं कि जो पब्लिक उन्हें चुनती है वो कोई नैतिकता का तराजू लेकर सबको नहीं तौलती है। चुनाव से ठीक पहले रातों रात तमाम दलों से आने वाले नेताओं को टिकट मिलना, बेहिसाब पैसे से होने वाली रैलियों और सजावटों को पब्लिक अपनी आंखों से देख रही होती है। क्या आप उसकी समझदारी और नैतिकता पर सवाल कर सकते हैं। दूसरे का रिजल्ट निकालकर वो खुद को पास घोषित कर चुकी है। एकनाथ खडसे का बयान ही ईमानदार बयान है बाकी पब्लिक की तथाकथित नाराज़गी पाखंड से ज़्यादा कुछ नहीं है।

ठीक है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को नेचुरली करप्ट पार्टी कहा। यह भी कहा कि कांग्रेस – एनसीपी का गोत्र एक ही है। जल्दी ही कोई हरियाणा से कहेगा कि एक गोत्र वाले की शादी अनैतिक थी। अब जाकर नैतिक हुई है जब अलग गोत्र वाली बीजेपी और एन सी पी का गंधर्व विवाह हुआ है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के बारे में प्रधानमंत्री मोदी ने क्या क्या नहीं कहा। जनता को लगा होगा कि एन सी पी कांग्रेस से मुक्ति का वक्त आ गया है। पर क्या उस जनता को यह नहीं दिखा था कि चौबीस घंटे पहले तक इन पार्टियों में रहने वाले नेता बीजेपी के टिकट पर लड़ने आ गए हैं। शायद बीजेपी गंगा है जिसमें डुबकी लगाते ही सब पवित्र हो जाते होंगे। अब उस जनता ने इन उम्मीदवारों को वोट तो दिया ही। गुजरात विधानसभा में भी बीजेपी के टिकट से कई कांग्रेसी विधायक हैं। संसद में भी हैं। केंद्रीय मंत्रिमंडल में शिव सेना, आर जे डी और कांग्रेस से आए नेता मंत्री बने हैं। बीजेपी अब बीजेपी नहीं है। यह एक प्लेटफार्म है जहां कोई भी राष्ट्रवाद का टिकट कटाकर गाड़ी पकड़ सकता है। यहां पूर्व अलगाववादी लोन राष्ट्रवादी हो सकते हैं और इसके मंच पर पार्टी अध्यक्ष के साथ डी पी यादव भी वोट मांग सकते हैं। बीजेपी के नेता गोलवलकर, सावरकर और हेडगेवार नहीं हैं। ये संघ के नेता हैं वैसे। बीजेपी एक नई कांग्रेस है जिसके नेता नेहरू, पटेल और गांधी हैं। पुराने दौर की कांग्रेस भी तो आज के बीजेपी जैसी थी। दक्षिणपंथी, सांप्रदायिक, राष्ट्रवादी, वामपंथी, सर्वोदयी और भी कई प्रकार के कंफ्यूज़ विचारधारा वाले लोग, सब होते थे वहां।

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्ट टू का विस्तार हो रहा है। जिसके हाथ में कांग्रेस है उसे पार्टी के नेता इंडियन एक्सप्रेस में इंटरव्यू देकर और लेखकर सलाह दे रहे हैं कि राहुल गांधी को कौन सी किताब का कौन सा चेप्टर पढ़ना चाहिए और क्या क्या करना चाहिए। दिलचस्प बात यह है कि आज राजनीति का रोज़ सीधा प्रसारण हो रहा है। आप इसे रियालिटी शो की तरह देख सकते हैं। बिल्कुल बिग-बास जैसा है।

कांग्रेस की बनाई राजनीतिक परंपराएं लहलहा रही हैं। नई पंरपरा कोई नहीं बना रहा। बीजेपी एक दिन कांग्रेस का भी समर्थन ले सकती है। एन सी पी और कांग्रेस में क्या फर्क है। वैसे हर दल एक दूसरे के सहयोगी रहे हैं और हो सकते हैं। एक दिन घूमते फिरते कांग्रेस और बीजेपी हाथ मिलाकर सरकार बना लें तो गड्ढे में कूदने मत चले जाइये।

6 अप्रैल 2014 के दिन इंडियन एक्सप्रेस में एक रिपोर्ट छपी है। बीजेपी के नेताओं ने चुनाव आयोग से शिकायत की है कि प्रफुल्ल पटेल के जन्मदिन पर एक किताब छपी है, विकासनामा। इस किताब में पटेल और मोदी की एक तस्वीर है। पटेल मोदी की लोकप्रियता का लाभ उठाना चाहते हैं। महाराष्ट्र के गोंदिया ज़िले के विकास पुरुष के तौर पर प्रफुल्ल पटेल पर छपी इस किताब में कई नेताओं के साथ पटेल की तस्वीर छपी है। तब बीजेपी कितनी संवेदनशील थी कि मोदी पर पटेल की छींटे न पड़ जाए, लोग न समझ लें कि मोदी साहब पटेल जैसे नेताओं के साथ मिलते जुलते हैं। इसलिए पार्टी सतर्क हो गई थी। गूगल में दिवंगत नेता गोपिनाथ मुंडे का भी एक बयान मिला जो उन्होंने लोक सभा चुनाव के दौरान दिया था। उन्होंने साफ साफ कहा था कि प्रफुल्ल पटेल के लिए बीजेपी में कोई जगह नहीं है। यह सब अफवाह उनके गुरु( शरद पवार) फैला रहे हैं। तीन फरवरी को समाचार एजेंसी एएनआई की रिपोर्ट है कि भारतीय जनता पार्टी के नेता बलबीर पुंज ने मांग की है कि नागरिक विमानन मंत्री प्रफुल्ल पटेल के खिलाफ विशेष जांच होनी चाहिए। कनाडा के अखबार में किसी रिपोर्ट के छपने का ज़िक्र है जिसमें आरोप है कि पटेल को रिश्वत दी गई है। पटेल ने इन आरोपों का खंडन कर दिया था।

पी टी आई पर बीजेपी नेता सुब्रह्मण्य स्वामी का एक बयान है कि प्रफुल्ल पटेल को जांच से नहीं भागना चाहिए। पटेल जब निर्दोष समझते हैं तो जांच से क्यों भाग रहे हैं। विनोद राय ने दावा किया था कि उन पर आडिट रिपोर्ट से प्रफुल्ल पटेल का नाम हटा देने का दबाव था।इसी 19 अक्तूबर को प्रकाश जावड़ेकर का छपा एक बयान मिला जिसमें उन्होंने कहा कि हमने कांग्रेस और एन सी पी  के भ्रष्टाचार के खिलाफ चुनाव लड़ा है। हमने दराज़ से भ्रष्टाचार के कंकालों को निकाले हैं। एन सी पी के साथ गठबंधन का कोई सवाल ही नहीं होता। यह तो हमारे और मतदाताओं का अपमान होगा। बीजेपी नेता एकनाथ खडसे का बयान फिर से पढ़िये। एन सी पी का समर्थन लेने से हमारी बदनामी नहीं होगी। ठीक ही तो कहा है। जावडेकर साहब ने कहा था कि अपमान होगा। खडसे कह रहे हैं बदनामी नहीं होगी। दोनों में अतंर है। अपमान और बदनामी की अलग अलग व्याख्या है। अपमान जनता का हो सकता है लेकिन बदनामी बीजेपी की नहीं हो सकती है।

रूडी ने साफ कर दिया था कि हम कांग्रेस के अलावा किसी से भी समर्थन ले सकते हैं। यानी कांग्रेस अनैतिक है और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी नैतिक। रूडी की इस लाइन से अब एकमात्र भ्रष्ट पार्टी कांग्रेस बच गई है। बाकी सब उसके साथ आकर या दूर से हाथ हिलाकर ईमानदार हो चुके हैं। जो लोग फड़नवीस साहब के पुराने ट्वीट निकालकर मज़े ले रहे हैं वो दरअसल अनैतिक दिलजले हैं। क्या हुआ फड़नवीस ने कहा दिया कि हम एन सी पी के साथ नेवर, नेवर, नेवर गठबंधन नहीं करेंगे। गठबंधन कहां किया। समर्थन कहां मांगा। वो तो एन सी पी का लोड है। जिसने बिना मांगे दिया है। जैसे रामविलास पासवान की पार्टी से गठबंधन हुआ तो क्या जनता ने आत्महत्या कर लिया कि उसके बीच रात दिन काम करने वाले रघुवंश प्रसाद सिंह को हरा कर विवादास्पद रामा सिंह को विजयी बनाने जा रही है। क्या बिहार की जनता बीमार पड़ गई कि पासवान की पार्टी में विवादास्पद सूरजभान सिंह जैसे नेता हैं। अब कोई सूरजभान जी को बाहुबली बोलकर दिखाए। इसलिए महाराष्ट्र में जो कुछ भी हुआ वो ठीक हुआ है। जो ठगा गया है वो ठगे जाने लायक था इसलिए वो ठगा हुआ समझता रहे। ऐसे मूर्खों की जेब कटने पर हम और आप कब रोते हैं। यही कहते हैं कि ठीक से नहीं चलोगे तो जेब कटेगी ही। यानी जेबकतरा ठीक है और जिसकी जेब कटी है उसमें कमी है।

एन सी पी जैसी पार्टी कभी न हारे। इनकी जीत ही भारतीय राजनीति की नैतिकता की जीत है। शरद पवार और प्रफुल्ल पटेल की राजनीतिक समझ से जलने वाले उन्हें क्या क्या न कहे जा रहे हैं। कम से कम इतनी ईमानदारी तो होनी चाहिए कि चुनाव हार कर भी ये जीत गए हैं तो बधाई दे दें। जीत सिर्फ मतगणना के दिन नहीं होती। विश्वासमत के दिन भी होती है। एन सी पी जीत गई है। वो अब सत्तारूढ़ दल है। जो भी इन पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाए उसके खिलाफ जांच होनी चाहिए कि कहीं आरोप लगाने वाला कांग्रेसी तो नहीं है। क्योंकि अनैतिक और भ्रष्ट तो सिर्फ कांग्रेस है।

बस एक फर्क है। दिल्ली में कांग्रेस ने बिना समर्थन मांगे ख़ुद से लिखकर दे दिया था। महाराष्ट्र में पवार ने बिना लिखे प्रेस कांफ्रेंस कर दे दिया। माडल वही है बस रंग अलग है। दिल्ल में जो बीजेपी ने आम आदमी पार्टी को कहा और आम आदमी पार्टी उसका लोड लेकर नैतिकता के मोह में फंस गई। रही बात एन सी पी के खिलाफ आरोपों की तो वो बस आरोप थे। सरकार बदले की भावना से कार्रवाई नहीं करती। सिर्फ विपक्ष को बदले की भावना से आरोप लगाने की छूट होती है !

महाराष्ट्र की जनता को सरकार मिल गई। उसकी नैतिकता की खोज समाप्त होती है । ज़रूर बीजेपी ने भावुकतावश कह दिया कि एन सी पी भ्रष्ट पार्टी है। एन सी पी की उदारता देखिये। वो आहत भी न हुई और न ही माफी मांगने के लिए कहा। ये होता है लोकतंत्र। जो इसे समझौते का खेल समझते हैं उन्हें इतिहास की हर घटनाओं को बैक डेट से सही घोषित करने में लग जाना चाहिए। क्योंकि नैतिकता और क्रांतिकारी पड़ोसी के घर पैदा हों तो अच्छा। अपने घर ठीक नहीं है। राजनीतिक घटनाओं पर व्यंग्य करना सीख लीजिए। तंज करेंगे तो मारे जायेंगे। महाराष्ट्र में ऐसा कुछ नहीं हुआ है कि आप रोते फिरे। मकसद क्या है। भारत को दुनिया का नंबर वन देश बनना या यही सब टटपुंजिये बातों पर सर धुनना। अभी सफाई का कितना काम पड़ा है और आप हैं कि सोशल मीडिया पर नैतिकता का कचरा फैलाने में लगे हैं। नैतिकता की इस हार पर लड्डू बांटिये। कम से कम अनैतिक काम करते वक्त यह तो टेंशन नहीं रहेगा न कि कोई देख लेगा। खुलेआम हुआ क्या यह नैतिक नहीं है। हां आप यह सोच रहे हैं कि आप कुछ नहीं कर सकते तो ये बीमारी टीवी देखने के कारण आई है। टीवी देखना कम कर दीजिए।

फोटो क्रेडिट : इंडिया डॉट कॉम