क्या अब आप साथ नहीं हैं ?

किसी राजनीतिक दल को उसके भीतर के अंतर्विरोध ही ज़िंदा रखते हैं। जहां विरोध और अंतर्विरोध समाप्त हो जाता है, वहां राजनीति का उद्देश्य समाप्त हो जाता है। इस लिहाज़ से पीडीपी और बीजेपी का मिलना तमाम आलोचनाओं के बीच एक बड़ी कामयाबी है, क्योंकि यहां दोनों दल अपने अपने विरोध को छोड़ मिल रहे थे। ऐसा करते हुए वे सिर्फ समझौते ही नहीं कर रहे हैं बल्कि यह संभावना भी पैदा कर रहे हैं कि राजनीति में दो छोर मिल सकते हैं।

हिंदुस्तान की राजनीति में दो ध्रुवों की ऐसी बहुत मुलाकातें हुई है। दलों के स्तर पर भी और नेताओं के स्तर पर भी। कांग्रेस-गैर कांग्रेस की दोस्ती और कांग्रेस के खिलाफ समाजवादियों और भाजपाइयों की दोस्ती। राजनीति में अंतर्विरोधों को साधना भी एक बड़ी राजनीति है। कम से कम इसी बहाने पीडीपी बीजेपी को करीब से देख लेगी और बीजेपी पीडीपी को। देश की राजनीति के लिए यह अच्छा संकेत है।

इससे पहले कि यह बदलाव अफज़ल गुरु के अवशेषों की मांग और आतंकवादियों का शुक्रिया अदा करने के विवादों की भेंट चढ़ जाए राजधानी दिल्ली में एक और मुद्दे की बरसात होती रही। रात भर की बारिश के साथ आम आदमी पार्टी के भीतर इतना कुछ भीग गया कि सुबह के बयानों ने सूखी ज़मीन की तमाम संभावनाओं को समाप्त कर दिया था। योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण अचानक खलनायक की तरह पेश किए जाने लगे जो अरविंद केजरीवाल को पार्टी के संयोजक पद से हटाना चाहते हैं। ऐसे आरोपों की चिट्ठी देखी और फिर प्रेस में नेताओं के बयान।

सोशल मीडिया पर ‘आई ट्रस्ट केजरीवाल’ तो ‘केजरीवालकल्ट’ का हैशटैग चलने लगा। कोई अरविंद पर विवाद को सुलझा लेने का भरोसे को ज़ाहिर कर रहा था तो कोई योगेंद्र पर लांछन लगा रहा था। किसी ने उनका बिना नाम लिए लिखा कि जब हम अन्ना आंदोलन में लाठियां खा रहे थे कुछ लोग राहुल गांधी की दलाली खा रहे थे।

योगेंद्र के घर खुले लैपटॉप पर हिन्दी में लिखे इस ट्वीट पर यह सोच कर ध्यान चला गया कि कहीं मेरा ट्वीट तो यहां नहीं पढ़ा जा रहा है! लेकिन ट्वीट पढ़ कर यकीन सा हो गया कि इंटरव्यू में सब कुछ सीमा के भीतर होने की योगेंद्र की विनम्र आशावादिता पर भरोसा नहीं करना चाहिए। योगेंद्र ने बार-बार पूछे जाने पर यही कहा कि अरविंद पर भरोसा है। वह बड़े नेता हैं। इतिहास में उनकी ऐसी भूमिका है जैसी कम नेताओं ने निभाई है। मैं बार बार योगेंद्र से पूछे जा रहा था कि आप आम आदमी पार्टी में हैं या नहीं। क्या आपके और अरविंद के बीच संवाद समाप्त हो गया है। योगेंद्र हर बार यही कहे जा रहे थे कि आप यह क्यों पूछ रहे हैं कि सारी संभावना समाप्त हो गई है। हमारी पार्टी कोई कमज़ोर पार्टी नहीं है। वहां सवाल नही उठेंगे तो कहां उठेंगे।

फिर भी हिन्दी में लिखा दलाली वाला वह ट्वीट खटक रहा था। अन्ना आंदोलन में किसने क्या किया ये हिसाब होने लगा है। अपने थोड़े से अनुभव से जानता हूं। जब दोस्तों के बीच हिसाब की यह नौबत आ जाए तब दोस्ती को कोई नहीं बचा सकता है। वह समाप्त हो जाती है। होली के पहले दोस्ती की यह अदावत दिलचस्प भी लगी। लगा कि पत्रकारिता क्या क्या दिखाती है। जिस योगेंद्र यादव के पास हममें से कई राजनीति को समझने जाया करते थे उस योगेंद्र से पूछ रहा था कि आपकी कोई महत्वकांक्षा तो नहीं है। पेशे की यही निर्ममता मुझे पसंद है। यही इम्तहान का वक्त होता है। उसी तरह अरविंद और अरुणा राय जब सन 2000 के साल के आस पास सुन्दरनगरी में सूचना के अधिकार पर बाइट देते थे, तो लगता था कि ये अधिकार क्या बला है। ये लोग किस दुनिया की बात कर रहे हैं। दिल्ली चुनाव के दौरान उस अरविंद से भी पूछा कि सरकार है या दुकान। अरविंद का बयान था कि मैं बनिया हूं बिजनेस जानता हूं।

जैसे पंद्रह साल पहले सूचना के अधिकार को लेकर मैं अपने सीमित अनुभवों से सवाल करता था और शंका के साथ लौटता था वैसे ही किसी पार्टी के भीतर स्वराज के सवाल पर हैरत और शंका से लौट आया। ये और बात है कि आज उसी सूचना के अधिकार के लिए कितने देशभक्तों ने गोली तक खा ली। मैं पंद्रह साल बाद ग़लत साबित हो गया और आज इसके पैमाने पर कई दलो की कापी चेक होती है। क्या पता वाकई कोई पार्टी अपने भीतर स्वराज को लागू करेगी। लेकिन अगर आप ने दावा किया है तो इस आधार पर भी कापी तो चेक होगी ही। फिलहाल योगेंद्र भी अपने सवालों को लेकर पीछे नहीं हटना चाहते। यह ज़रूर कहा कि हम किसी डेडलाइन की बात नहीं कर रहे हैं। हमारे सारे सवालों पर आने वाले समय में धीरे धीरे ग़ौर किया जा सकता है।

सुबह टीवी पर के सी त्यागी और तारिक अनवर के बयान देख रहा था। उनके बयान ज्यादा संयमित थे। शिवसेना के एक नेता तो यह कहने से इनकार कर दिया कि उनका आंतरिक मामला है हम क्या कहें। यह उन दलों के नेताओं की प्रतिक्रिया थी, जिनके यहां विवाद होते ही नेता को दो मिनट में निपटा दिया जाता है। कोई हैरानी भी नहीं ज़ाहिर करता। निकलने वाला भी दो मिनट में अपना गुट बनाकर अपने पूर्व नेता की मज़म्मत करने लगता है। सबने इसी राजनीति को तो देखा है और जाना है।

आम आदमी पार्टी में दो ध्रुव बन गए हैं। अरविंद और योगेंद्र के बीच अब बहुत पानी बह चुका है। अन्य पत्रकारों और पार्टी के भीतर कई लोगों से बात कर लगा कि वापसी का रास्ता नहीं बचा है। इसलिए कई बार योगेंद्र से इसी आधार पर सवाल किया कि आप निकाल दिए जाएंगे ऐसा कहा जा रहा है। एक बार तो वह डबडबा गए, लेकिन उनके जवाब से ऐसा लग रहा था कि वे खुद को सुना रहे हैं। कोई उनकी सुनने वाला नहीं हैं। रास्ते अलग हो चुके हैं। कई बार जो जवाब दिया जाता है दरअसल वो सवाल की तरह होता है।

राजनीति में संकट हो यह पत्रकारों के लिए सबसे सुखद वक्त होता है, लेकिन यह सारे सवाल कुछ ऐसे हैं। जिस पर दूसरे दल के लोग शायद ही बोलें। चंदे के सोर्स के साथ साथ खर्चे का हिसाब दीजिए, उम्मीदवार का बोयेडेटा और डिटेल वेबसाइट पर डालिए, पार्टी में स्वराज लाइये और राज्य इकाइयों को स्वराज के माडल पर फैसला लेने दीजिए। कौन पार्टी इस बवाल को अपने सर पर लेगी। क्या आम आदमी पार्टी खरी उतरेगी। इस वक्त इस सवाल के जवाब की उम्मीद करना इस पार्टी से भी ज्यादती होगी। फिलहाल सवाल यही है कि क्या अरविंद केजरीवाल और योगेंद्र यादव साथ हैं। मुझे तो लगता है कि नहीं हैं। मगर असली जवाब तो तब मिलेगा जब इस मसले पर अरविंद बोलेंगे।
 
एक पत्रकार को आदतन शक करना ही चाहिए। शक से ही सवालों को रास्ता मिलता है। दिल्ली की राजनीति हैरान है। जिस दल को 67 सीटों का ऐतिहासिक समर्थन दिया उस दल के दो नेता महीना भर भी साथ नहीं रह सके। यह भी एक इतिहास ही होगा। राजनीति ऐसे इतिहासो को जल्दी हजम कर जाती है। एक इतिहास तो यह भी है कि अरविंद से जो लड़ा वो इतिहास बन गया। लेकिन क्या यह लड़ाई भी भुला देने वाले इतिहास की एक और किताब है या कुछ और। बस लोग वही पुराना सवाल ज़रूर पूछेंगे कि आप दूसरों से अलग कैसे। क्या इसलिए कि आसानी से अलग हो जाते हैं।