कोलकाता, केक और क्रिसमस 

Christmasसेंट पाॅल कथिडरल, कोलकाता । रात के दस बज रहे हैं । सैंकड़ों लोग चर्च के अंदर जाने के लिए क़तार में हैं । मैं भी क़तार के साथ- साथ धीरे धीरे सरक रहा हूँ । अलग अलग बोलियाँ सुनाई दे रही है । दूसरे प्रान्त से भी लोग आए हैं । कुछ पर्यटन के तौर पर तो कुछ धार्मिक मान्यताओं को निभाने । एक बड़ा तबक़ा ऐसा भी हो जो उत्सवधर्मिता को जीने आया है ।

टीका लगाए एक पंडित जी हैं तो भर मांग सिंदूर लगाए एक महिला लाइन धीरे धीरे सरकने के बाद भी उकता नहीं रही है । लड़कियों का एक समूह चर्च की तरफ़ से बनाई गई झाँकी पर टिप्पणी कर रहा है । अरे देखो, गड़ेरिया का बच्चा तो बंगाली है । कुर्ता पायजामा में है और शाल ओढ़े हैं । अंदर जाने का इंतज़ार लंबा होता जा रहा है । फिर भी इस अधीर वक्त में लोग धीरज के साथ खड़े हैं । चर्च की सादगी बरक़रार है । तड़क भड़क वाली सजावट नहीं है ।

अंदर प्रवेश करते ही आवाज़ आ रही है । महात्मा गांधी ने अहिंसा को सबसे शक्तिशाली हथियार बताया था । गांधी ने कहा था कि मरने के अनेक कारण हो सकते हैं लेकिन मारने का कोई कारण नहीं हो सकता है । शांति और मानवता के संदेश दिये जा रहे हैं । पेशावर में बच्चों की हत्या पर शोक व्यक्त किया जा रहा है । संबोधित करने वाले बिशप रेवरेंड अशोक विश्वास हैं । धर्म की इतनी ही बातें हुईं कि सब पर दया करो । पड़ोसी से प्यार करो । 

यह सुनते सुनते मैं चर्च के अंदर वहाँ खड़ा हो जाता हूँ जहाँ मीडिया के कैमरे लगे हैं । बहुत से चर्च देखे हैं लेकिन जीवन में पहली बार क्रिसमस की पूर्व संध्या पर मध्यरात्रि मास देखने आया हूँ । 1847 में कोलकाता का सेंट पाॅल कथिडरल बन गया था । 1857 की क्रांति से दस साल पहले । इसे उत्तर भारत के चर्चों का मातृ- चर्च कहा जाता है । चर्च के अंदर शांती की सामूहिकता है । टीवी पर जिस क्रिसमस को धूमधाम के अर्थ में देखा और जाना है उसके ठीक उलट शांति और खामोशी पसरी है । सारे लोग बैठे हैं और सबके सामने बाइबिल के कुछ अंश रखे हैं । भीतर अंधेरा है मगर सबके सामने मोमबत्ती जल रही है । 

ईसा मसीह के जन्म के मौक़े पर चर्च के भीतर ग़ैर ईसाई भी हैं । बिशप सबका आह्वान करते हैं । हिन्दुस्तान को आज़ादी मिलने के ठीक सौ साल पहसे बना यह चर्च यूरोपीय वास्तुकला का बेहतरीन उदाहरण है । जल्दी ही ख़ास तरह का एक दान-पात्र घूमने लगता है । लोग उसमें अपनी ईच्छा के अनुसार पैसे डाल रहे हैं । हज़ार से लेकर दस रुपये के नोट तक । मेरी नज़र उस लड़की पर पड़ती है जो संकोच और सबसे नज़रें बचाते हुए दानपात्र में एक दो सिक्के डाल रही है । राजा हो या रंक सब अपने हिस्से में से कुछ न कुछ ईश्वर को देना चाहते हैं । 

चर्च से बाहर कोलकाता का मैदान दीवाली की तरह सज़ा है । क्रिसमस मनाना कोई कोलकाता से सीखे । रेडियो से लेकर टीवी और अख़बार तक में शारदा स्कैम के बाद क्रिसमस की तैयारियों का भी खूब कवरेज है । केक को लेकर तरह तरह की बातें हो रही हैं और नाना प्रकार के ब्रांड के विज्ञापन टीवी पर आ रहे हैं । गली मोहल्ले की छोटी छोटी दुकानें भी क्रिसमस के मौक़े पर सजी हुई हैं । 

दिल्ली में ठीक उल्टा है । वहाँ से वैसी ही ख़बरें आ रही हैं मानो क्रिसमस का मतलब सिर्फ सरकारी छुट्टी भर रह गया है । छुट्टी होगी या नहीं होगी इसी में क्रिसमस का भाव खो गया है । दिल्ली की हवा में तरह तरह की आशंकाएँ तैर रही हैं । लोग भूल जाते हैं कि राज सत्ता और लोकसत्ता दो अलग अलग चीज़ें होती हैं । कोलकाता के लोक में क्रिसमस सिर्फ ईसाई धर्म के अनुयायियों का त्योहार नहीं है । ईद, होली और दीवाली की तरह क्रिसमस भी सबका है। क्रिसमस मनाना हो तो कोलकाता आइये । दिल्ली के बस की बात नहीं है । वहाँ हर बात राज सत्ता से तय होती है । कोलकाता के लोग गुड गवर्नेंस की जगह गुड क्रिसमस मना रहे हैं । 

लौटते वक्त टैक्सी ड्राईवर से पूछा कि आप भी क्रिसमस मनाते हैं ? दीपांकर चुप रहा । थोड़ी देर बाद बोला कि टैक्सी ड्राईवर के लिए पूजा है न क्रिसमस । हमारा भी कोई त्योहार होना चाहिए ताकि हम चलते चलते मना सके । गढ़ना ही है तो ऐसा कोई नया लोक उत्सव गढ़ दीजिये । उत्सव को काम में बदल देने से उत्सव नहीं रह जाएगा । आधी रात को कोलकाता जगमगा रहा है । कोलकाता पुलिस मुस्तैदी से ट्रैफ़िक का संचालन कर रही है । तमाम महानगरों में कोलकाता जैसा महानगर कोई नहीं है । क्रिसमस भी कोलकाता जैसा कहीं और नहीं । 

(यह लेख एनडीटीवी की हिन्दी साइट पर प्रकाशित हो चुका है)