क्यों नहीं हो रही है कश्मीरी पंडितों की हत्या की जांच

कश्मीर को लेकर हिन्दी मीडिया में और हिन्दी जनता में दोयम दर्जे की समझ है और बहस भी। इस बहस को समृद्ध करने के लिए जानकारी लाने के लिए भी श्रम नहीं दिखता है। सारी बहस बनी बनाईं धारणाओं पर ही चलती रहती है। 8 अगस्त 2017 के इंडियन एक्सप्रेस के मुज़ामिल जलील ने कश्मीरी पंडितों की हत्या की जांच पर एक लंबी रिपोर्ट फाइल की है। इसे पढ़कर कश्मीर और कश्मीरी पंडितों के बहस के लिए नई जानकारी मिलती है। मुज़मिल ने लिखा है कि पिछले हफ्ते जब सुप्रीम कोर्ट ने आतंकवाद शुरू होने से अब तक कश्मीर में मारे गए कश्मीरी पंडितों की जांच फिर से होने की याचिका ख़ारिज की तो लंबे समय से न्याय का इंतज़ार कर रहे पीड़ितों के हाथ से एक बड़ा मौका चला गया। इस तरह की जांच से कुछ तथ्य साबित होते, नए तथ्य रिकार्ड पर आते और कश्मीरी पंडितों के ख़िलाफ़ हिंसा करने वाले को सज़ा मिलती है।

मुज़मिल जलील कश्मीर के ही हैं और कश्मीर पर लगातार लिखते हैं। उनका जब यह मानना है तब ज़रूर इस बात में दम है। कोर्ट ने ही ख़ारिज किया है, सरकार तो अपनी तरफ से ये काम कर ही सकती है। उसे यह भी बताना चाहिए कि बीजेपी की सरकार बनने के बाद जम्मू कश्मीर में पंडितों के लिए क्या नया और अच्छा हुआ है। कश्मीरी पंडितों की राजनीति का लाभ तो ख़ूब उठाया जाता है मगर कोई हिसाब न मांगता है और न देता है कि तीन साल दिल्ली में और दो साल श्रीनगर में सरकार चलाने का लाभ पंडितों को क्या मिला। सरकार और उसके समर्थक इन सवालों के जवाब नहीं देते हैं उल्टा हम जैसे पत्रकारों से सवाल पूछते हैं जैसे हमीं को जनता ने चुना हो।

मुज़ामिल कहते हैं कि इससे कश्मीरी समाज में ज़ख़्मों को भरने का मौक़ा मिलता। कश्मीरी पंडितों का एक संगठन है ROOTS, उसने यह याचिका दायर की थी। इनकी मांग थी कि कश्मीरी पंडितों की हत्या से संबंधित एफ आई आर,, जांच की फाइल राज्य से बाहर भेजी जाए। इनकी जांच सी बी आई या एन आई ए करे। हालांकि सिख दंगों से संबंधित तमाम कमेटियों का हश्र हम जानते हैं फिर भी इस मांग से एक प्रक्रिया तो शुरू होती ही। आज तक जम्मू कश्मीर पुलिस ने इन मामलों में कुछ नहीं किया है जबकि एफ आई आर दर्ज हुए 26 साल होने को आए हैं। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने याचिका रिजेक्ट करते हुए कहा कि 27 साल गुज़र गए हैं इसलिए साक्ष्यों का मिलना अब मुश्किल है।

जम्मू कश्मीर सिविल सोसायटी संगठन( JKCCS) का मानना है कि अपराध तो कभी मरता नहीं है। जम्मू कश्मीर में पंडितों और अन्य अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ जो हिंसा हुई उसकी जांच कभी तटस्थ तरीके से हुई ही नहीं। आज तक सबूत होने के बाद भी किसी को सज़ा नहीं मिली। यह संगठन जम्मू कश्मीर में ही काम करता है। कश्मीर के नाम पर चैनलों पर उन्माद फैलाने वाले इस तरह के ठोस प्रयास कभी नहीं करेंगे। उन्हें बस मुद्दा चाहिए ताकि भुना सकें। JKCCS का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश से राज्य को उसके दायित्व से मुक्ति मिल गई है। राज्य के कारण जांच और इंसाफ़ में देरी हुई इसके लिए पीड़ित ज़िम्मेदार नहीं हैं। राज्य है।

2008 में जम्मू कश्मीर पुलिस ने एक रिपोर्ट तैयार की थी। 1998 के बाद से आतंकवादियों ने 209 कश्मीरी पंडितों की हत्या की है। 1990 में ही 109 पंडित मारे गए थे। घाटी के थानों में 140 मामले दर्ज हुए थे। 24 मामलों में ही आरोप पत्र दायर हुए और बाकी 115 में मारने वालों की पहचान ही नहीं हुई। इन 24 केस में 31 स्थानीय आतंकवादियों को गिरफ्तार किया गया।

1 नवंबर 1989 को रिटायर जज नील कंठ गंजू की हत्या की जांच सीबीआई को दी गई थी। जस्टिस गंजू ने जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के अध्यश्र मक़बूल भट्ट को मौत की सज़ा दी थी। जम्मू कश्मीर पुलिस के रिकार्ड के अनुसार प्रभावती नाम की पंडित महिला सबसे पहले आतंकवादियों का शिकार हुई। 14 मार्च 1989 को हत्या हुई थी, आज तक उनके हत्यारों का पता नहीं चला। 25 जनवरी 1999 को वंधामा में 23 पंडितों की हत्या हुई थी। इन्हें मारने वाले दो आतंकवादी पाकिस्तानी थी जो एक एनकाउंटर में मार दिए गए।

पुलिस रिकार्ड के अनुसार श्रीनगर शहर में अल्पसंख्यक समुदाय के 82 लोग मारे गए थे। गांदरबल और पुलवामा में 28-28 लोगों की हत्या हुई थी। मार्च 2010 में जम्मू कश्मीर के तब के मुख्यमंत्री ओमर अब्दुल्ला ने विधानसभा में कहा था कि 1989 से अब तक 219 कश्मीरी पंडितों की हत्या हुई है। उस वक्त राजस्व मंत्री ने एक आंकड़ा दिया था कि 38,119 परिवारों ने पलायन किया था। 1,42,042 लोगों ने पलायन किया। इनमें से ज्यादातर पंडित थे। 2011 में कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति ने कहा कि 1989 से लेकर 2011 तक 399 पंडितों की हत्या हुई है।

मुज़मिल ने लिखा है कि पीडीपी के एक वरिष्ठ नेता का भी मानना है कि इस तरह की जांच से समाज में ज़ख्मों को भरने में मदद मिलती। मुज़िमल ने यह भी लिखा है कि जांच को लेकर केंद्र सरकार भी उत्साहित नहीं है। जबकि संघ परिवार ने कश्मीरी पंडितों का मसला उठाकर ध्रुवीकरण का कितना प्रयास किया।

उम्मीद है कि आपको इस तरह के लेख या रिपोर्ट उन हिन्दी अख़बारों में भी मिले होंगे जहां कश्मीर को लेकर ज़्यादातर कूड़ा और भड़काऊ लेख छपते रहते हैं।