ख्वाब दिखाये थे आशियाना सजाने के

उन्होंने ख्वाब दिखाये आशियाना सजाने के,
आँधियों ने जो बुझाये थे दीये,
उन्हें फिर से जलाने के ;

पर जब बारी हमारे दर्द बाँटने की आई,
तो कुछ  न था उनके पास,
सिवाय घड़ियाली आँसू बहाने के!

जब कुदरत ने बेहिसाब बेरहमी बरती,
और हमें मदद् की दरकार थी उनसे,
तो हाथ कुछ भी न लगा,
सिवाय बहानों के ख़ज़ाने के!

वो सब कुछ,जो दिन-रात की मेहनत से  किया था हासिल,
कुछ पलों में  ख़ाक हो गया,
ज़मीन पर हुई बर्बादी,
वो हवा से ही नापकर चल दिए!

शायद उनके पाँव भी नाकाबिल थे,
ज़मीं पर टिक पाने के!

यह कविता क़स्बा की पाठक प्रगति पाण्डेय नें लिखी है।