कितनी ख़ूबसूरत ये कश्मीर है…

“मैं दस दिन कश्मीर में रही लेकिन अकेली लड़की होने के बाद भी दस सेकेंड के लिए असुरक्षित महसूस नहीं किया। किसी को देखकर असहजता महसूस नहीं हुई। ये भी पएक कश्मीर है जो शायद टीवी की डिबेट में मारो जला दो फूँक दो की ज़ुबान में नहीं दिखती है।”
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उपमा गांधीनगर की रहने वाली हैं। अकेले कश्मीर के गडसर पास ट्रेक पर जाने का फ़ैसला करती हैं। तब जब कुछ दिन पहले अमरनाथ यात्रियों पर हमले में गुजरात के ही लोग मारे गए थे। थोड़ी आपत्ति के बाद भी माता पिता जाने देते हैं और उपमा अपनी ज़िद से पीछे भी नहीं हटती हैं। मैं तो यही जानकर रोमांचित हो गया कि जिस कश्मीर को लेकर हिन्दी भाषी भारत प्रोपेगैंडाग्रस्त है,उस कश्मीर को एक नौजवान गुजरातन अपनी आँखों से देखने का फैसला करती है। कश्मीर और ख़ुद को एक्सप्लोर करने के लिए। उपमा कविता भी लिखती हैं। व्हाट्स अप में उपमा का मैसेज पढ़कर चौंक गया कि ” मुझे किसी ने अपनी नज़रों से न तो डराया न अकेली लड़की होने का अहसास कराया।”
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क्या हम सोच सकते हैं कि जो कश्मीर टीवी पर जलता हुआ दिखता है वहाँ कुछ लोग ट्रेक पर जाने का इरादा बना रहे होते हैं? इंटरनेट के ज़रिये पहली बार मिलते हैं और यात्रा शुरू कर देते हैं। इस ग्रुप में गांधीनगर, फ्रांस, चीन, पुणे और बंगलुरू के लोग थे। कारपोरेट वाले !
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उपमा भी यह देख कर हैरान हो गईं कि कश्मीर टीवी की बहस के बाहर ‘नार्मल’ भी दिखता है। ग्रुप के साथ चल रहे लोकल कश्मीरी के साथ राष्ट्रीय राइफल्स के जवान क्रिकेट खेलने लग गए। मेरे लिए भी यह तस्वीर कल्पना के बाहर की लगी। कितना कुछ बचा हुआ है कश्मीर में। उपमा ने महसूस किया कि सेना और लोकल का खलनायकीकरण दोनों ही ग़लत है। सेना और अर्ध सैनिक बलों के जवानों का मुश्किल हालात में काम करते हुए भी लोकल के साथ एक रिश्ता बन जाता है। इस तनातनी में दोनों ओर से समझने का प्रयास भी दिखा और भरोसा भी।

उपमा ने बताया है कि बहुत लोग भारत और अलगाववादियों की भूमिका को लेकर कंफ्यूज़ हैं। वो दोनों को समान दूरी से देखने का प्रयास करते हैं। कभी उन्हें लगता है कि अलगाववादी ग़लत कर रहे थे तो इस बात को लेकर चिंतित भी हैं इस्लामिक कट्टरपंथी अपना पाँव फैलाते जा रहे हैं। मगर कभी वे भारत के प्रति नज़रिये को हम यात्रियों पर नहीं थोपते। जिस तरह से शेष भारत के लोग किसी कश्मीरी को देखते हैं। इतनी हिंसा के बाद भी हम उनके बीच सहज होकर घूमते रहे। पूरा कश्मीर इस बहस की चपेट से अलग सामान्य ज़िंदगी भी जी रहा है।
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उपमा ने बताया कि दीवारों पर गज़वा ए हिन्द लिखा देखकर दुख भी हुआ,गुस्सा भी आया लेकिन क्रिकेट मैच का यह नज़ारा देखकर अच्छा भी लगा। इसके बाद भी जगह जगह सुरक्षा के बीच ज़िंदगी साँस ले रही थी। चाय की दुकान पर यहाँ भी चार लोग जमा थे। उनकी आँखें भी कुछ खोज रही हैं। शायद हल या उससे पहले ग्राहक।

कश्मीर में आसान है किसी न किसी पक्ष की तरह हो जाना या सोचना लेकिन इस तनावपूर्ण माहौल में ऐसे बहुत से मिले जो ख़ुद को किसी साँचे में नहीं रखना चाहते हैं। पत्थर के पीछे छिप कर हमें देखती दो पहाड़ी गुर्जर बच्चियों की तस्वीर हमसे कोई नया रास्ता पूछ रही हो।
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