बाढ़ में खुशी की खोज

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यह पोस्ट गिरीन्द्रनाथ झा नें लिखा है । ट्विटर हैंडल : @girindranath

देश के अन्य इलाक़ों की तरह बिहार भी हर साल बाढ़ से जूझता है। बिहार के कई ज़िले के लोगों का बाढ़ से जूझना कोई नई बात नहीं है। जुलाई से सितम्बर के बीच बाढ़ उनके जीवन का हिस्सा रहा है। ब्रेकिंग न्यूज़ के इस काल में बाढ़ भी ख़बर है लेकिन टेलीविजन सेट्स से दूर बाढ़ को भोग रहे लोगों को ख़बर में बने रहने का शौक़ नहीं रहा है क्योंकि उन्हें पता है कि वे दुःख के बाज़ार के बस मॉडल हैं। इसलिए वे इससे दूर रहने की कोशिश करते हैं।

तो बात यह है कि बाढ़ का रोना रोने वालों से कोसों दूर हम आज आपको दो गाँव की कहानी सुनाते हैं, जहाँ वैसे तो सैकड़ों एकड़ ज़मीन में लगी फ़सल पानी में समा गई है लेकिन तय समय पर राहत सामग्री पहुँच जाने की वजह से बाढ़ पीड़ितों के चेहरे पर रौनक़ लौट आई है। वैसे मुझे ‘पीड़ित’ शब्द लिखना अच्छा नहीं लगता है क्योंकि प्रकृति का अपना काम होता है, वह कुछ न कुछ करती रहती है। जिसे लोगबाग को स्वीकार करना चाहिए।

हम जिस गाँव पहुँचे उसका नाम तालाबड़ी और रंगरैया लाल टोली है। यह पूर्णिया ज़िले का हिस्सा है। पूरा इलाक़ा जलमग्न। दूर दूर तक बस पानी ही पानी। रंगरैया में एक मदरसा दिखा, जिसकी दूसरी मंज़िल पर आठ के क़रीब गाय दिखी। पानी से बचाव के लिए इन मवेशियों को यहाँ रखा गया था। वहाँ सईद भाई मिले, वे गाय को चारा मुहैया करा रहे थे। सईद भाई ने कहा “इसी के नाम पर सब राजनीति करते हैं न? यहाँ देखिए गाय- इंसान सब एक साथ हैं। महानंदा और कनकई की धारा से हम हर साल दो-तीन हाथ करते हैं, लेकिन डरते नहीं हैं जनाब! नदी है तो ग़ुस्सा करेगी ही। सब ठीक हो जाएगा। ”

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सईद भाई की बातें और वह भी इस जल प्रलय में। उनका नदी पर भरोसा, मेरे लिए एक सीख है। मुझे यहाँ तक लाने वाले पूर्णिया के एसपी निशांत कुमार तिवारी ने कहा- ” यही है जीवन, ये लोग ख़ुशी तलाश लेते हैं। हार नहीं मानते हैं। दुख में भी सुख खोज लेते हैं। यही इनकी ताक़त है। ”

बाढ़ से सबसे अधिक प्रभावित तालाबाड़ी में तो मैं और भी रिचार्ज हो गया। यहाँ मुझे थर्मोकोल का नाव दिखा, जिस पर एक बूढ़ी महिला बैठी थी और वह अपने खेत को निहार रही थी। हम अपने नाव से उनके पास पहुँचे। मैंने पूछा क्या देख रही हैं? पटसन की फ़सल तो डूब रही है। उसने कहा- ” अरे पानी का क्या है, दो-चार दिन में घट जाएगा, फिर सब सामान्य हो जाएगा..”

मुझे ख़ुद पर ग़ुस्सा आया कि मैं इतना नेगेटिव क्यों हूं। लोगों के भीतर ऐसी विकट परिस्थिति में भी सकारात्मक विचार बने हुए हैं, यह बड़ी बात है। मुझे इस तरह का सवाल नहीं करना चाहिए।

तलाबाड़ी में ही फ़रीदा मिली। केले के थम्ब के नाव पर वह अपने दो बच्चों के साथ थी। खाना बना रही थी और हाँ, मुस्कुरा रही थी। सचमुच बाढ़ में रोने के अलावा दैनिक जीवन को पढ़ना सबसे ज़रूरी चीज़ है।

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और जब हम बाहर निकले तो राहत शिविर में एक छह साल की बच्ची मुस्कुराती हुई पास आई तो मेरे मित्र चिन्मया नंद सिंह के मोबाईल कैमरे में उसकी ख़ुशी क़ैद हो गई।

बच्ची की माँ ने बताया – “बाढ़ कोई नया थोड़े है। हर साल आना इसका काम है। हमें कोई परेशानी नहीं है। राहत का सामान मिल ही रहा है। दवा मिल ही जाती है। और सबसे ज़रूरी चीज़, हमें तैरना आता है, हम बच्चे को सबसे पहले तैरना सिखाते हैं।”

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पूर्णिया लौटते वक़्त मैं रास्ते भर यही सोचता रहा कि ये लोग ख़ुशी तलाशते रहते हैं और एक हम हैं कि दुःख की खोज में लगे रहते हैं। क्या हम ज़्यादा नेगेटिव तो नहीं हो गए हैं? यह एक बड़ा सवाल है, जिससे हमें जूझना चाहिए।