तो मैं चेन्नई इसलिए गया था…

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पिछले शनिवार मैं एक शाम के लिए चेन्नई में था। बाला कैलासम स्मृति पुरस्कार के लिए। जहां तक याद है, मैंने कभी किसी पुरस्कार के बारे में नहीं लिखा है। अजीब लगता है लिखना। मंच पर आप नायक जैसे बिठा दिये जाते हैं तभी अपने काम की बहुत सारी कमियां याद आने लगती हैं। वहीं से मन दुखी और सुखी का कॉकटेल हो जाता है। मैं वैसे ही इन सब मौकों पर समभाव रहना पसंद करता हूं। कभी किसी पुरस्कार का जश्न नहीं मनाया। ख़ुद से कम ही किसी को बताया है। अब सही में पुरस्कारों से जी भरता जा रहा है। जब आप इनाम लेते जाते हैं तब ऐसे अवसरों पर बोले गए विशेषण आपको पेशे से बड़ा बताने लगते हैं।तभी लगता है कि आप कितने छोटे हैं।अंतत: आप बहुत सारे अंतर्विरोधों को चीरते हुए निकलते हैं और वहां से आकर होटल के कमरे में बंद हो जाते हैं।बहुत अधिक उम्मीदें घातक हो जाती हैं।अंत में आपको अपने स्वभाव और क्षमता अनुसार ही चलना पड़ता है।मैं अपने पेशे का प्रतिनिधि नहीं हूं।इस बात को लेकर मेरे मन में कोई भ्रम नहीं है। न तो सारी ख़बरें पढ़ता हूँ और न ही करने का प्रयास करता हूँ । मैं ख़ुद का प्रतिनिधि हूं। अचानक बेचैनियों से निकले हुए कुछ कर देना और फिर वापस अपने आप में सिमट जाना।सुबह शाम इसी में बीत जाता है कि आज शाम क्या करना है,करने के लिए संसाधन हैं या नहीं,कर पायेंगे या नहीं।उसके बाद एक औसत किस्म का शो करते करते आप बीत जाते हैं।तमाम हो जाते हैं।

मैं बाला कैलासम स्मृति पुरस्कार के बारे में लिखना चाहता हूं। पहले तो कई बार मैसेज आया कि पुरस्कार दिया जा रहा है। चेन्नई से शायलजा बात करना चाहती है। दम फूल गया कि चेन्नई से मैसेज है तब तो अंग्रज़ी की धार चमकानी होगी। अपने पास अंग्रेज़ी का स्टॉक इतना कम है कि दो चार लाइन के बाद समाप्त हो जाता है। ग़लत अंग्रेज़ी बोलना मुझे पसंद नहीं। सिर्फ मुसीबत के वक्त बोल कर निकल जाता हूं। शायलजा चेतलुर तमिल फिल्म जगत की एक्टर रही हैं। जब सीरीयल सास बहू टाइप हो गए तो काम ही करना छोड़ दिया। अब इनके मित्रों ने एक क्लब बनाया है, Www.cinemarendezvous.com । कई मैसेज के बाद शायलजा को सच्चाई बता दी गई कि अंग्रेज़ी नहीं आती,मैं वहां आकर क्या करूंगा। दो लाइन नहीं बोल सकता। शायलजा खूब हंसी। कहा कि हम कुछ कर लेंगे। आप आ जाइये। किसी से कहेंगे जो आपकी हिन्दी का अनुवाद अंग्रेज़ी में कर देगा।

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शायलजा ने बताया कि सिनेमा रोंदेवू मुझे पत्रकारिता के लिए पुरस्कार देना चाहता हैं।कहा कि हम तमिल लोग एक हिन्दी वाले को पुरस्कार देना चाहते हैं। आपका काम अच्छा है। हम पूरा तो नहीं समझ पाते लेकिन देख देखकर फिगरआउट कर लेते हैं। मैंने हां कर दी।जब जाने के दिन क़रीब आए तो गूगल में सर्च करने लगा कि वो कौन है जिसकी स्मृति में पुरस्कार लेने जा रहा हूं। बाला कैलासम के बारे में हिन्दू अख़बार में मीडिया पर लिखने वाले पनीरसेल्वम ने लिखा है कि बाला टीवी को बदलने के लिए प्रयासरत थे। वे मानते थे कि लोकतंत्र में टीवी की सही भूमिका हो सकती है और इसके लिए बकायदा कंपनी बनाकर एक विकल्प देने का प्रयास भी किया। टीआरपी से समझौता न करने की ज़िद पर अड़े रहे। उन्होंने पोपुलर कल्चर की घटिया क्वालिटी को स्तरीय बनाने का बीड़ा उठा लिया। बाला कैलासम के पिता तमिल फिल्मों के स्थापित नाम हैं। उन्हें दादा साहब फाल्के पुरस्कार भी मिला है। बाला कैलासम बीमारी के शिकार हो गए और चल बसे।

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किसी की स्मृति में पुरस्कार लेना आसान नहीं होता। आप अचानक से उसके सपनों का हिस्सा बन जाते हैं। ख़ैर पुरस्कार की शाम आ गई। सौ दो सौ लोग जमा हुए। बहुत उत्सुकता से सुनने आए। मेरी हिन्दी और टूटी फूटी अंग्रेज़ी सुनते रहे, समझते रहे। मैंने ख़राब अंग्रेज़ी बोलकर थोड़ा निराश ही किया। उन्हें लगा होगा ये तो वो नहीं जिसे हमने बुलाया है। मुझ तक पहुँचने की उनकी हसरतों को देख कर लगा कि काश मैं तमिल जानता तो धड़ाधड़ तमिल बोल कर सबके दिलों में उतर जाता।कार्यक्रम में आईं रागिनी ने कहा कि क्या ऐसा हो सकता है कि प्राइम टाइम तमिल सबटाइटल के साथ चलाया जाए। मेरा जवाब यही था कि टीवी बहुत महंगा माध्यम है। संसाधन इतने कम हैं कि आम दर्शक या पाठक को क्या क्या बताया जाए। जितना हो जाता है,वही बहुत है। एन राम ने वहां अध्यक्षीय भाषण दिया। हवा हल्की ठंडी थी। आयोजकों ने बहुत ख़ूबसूरती से सबकुछ सजाया था। कम संसाधन में उन्होंने भी बहुत मेहनत की।आत्मीयता से सबको पुरस्कार दिया। स्क्रोल न्यूज़ वेबसाइट के पत्रकार एम राजशेखर, हिन्दू की हेल्थ और साइंस एडिटर विद्या कृष्णन, फ्रीलांस पत्रकार मंदाकिनी गहलोत के साथ डाक्यू मेकर चंद्रशेखर रेड्डी को दिया गया। रेड्डी की डाक्यूमेंट्री फायरफ्लाइज़ इन दि एबिस को कई पुरस्कार मिले हैं। राजशेखर हम टीवी वालों से बहुत अच्छा काम करते हैं। हिन्दी के युवा पत्रकार उन्हें ज़रूर पढ़ें।

जिस आदर और आत्मीयता से शायलजा की टीम ने सम्मानित किया,उसे मैं याद रखना चाहूंगा। पुरस्कार देने से पहले इन सबने मेरी बहुत सारी रिपोर्टिंग देखी थी। कई शो देखे थे। यही नहीं अगली सुबह शायलजा और उनके पति अरुण ने अपनी इनोवा कार में चेन्नई का भ्रमण करा दिया। इतना तो घूमा ही दिया कि उस शहर से एक विज़ुअल रिश्ता बन गया। शायलजा को शहर और धर्म के इतिहास का ठीक ठाक ज्ञान है। उन्होंने महान कवि सुब्रह्मण्यम भारती का गीत भी गा दिया जिसका अर्थ था कावेरी किनारे पान को हम गंगा किनारे के गेंहूं से बदल लेंगे। सिंधु नदी में तमिल गाते हुए नाव चलायेंगे। कम समय में भारतीयता का शानदार व्याख्यान लगा।वो अंग्रेज़ी में बताती रहीं और मैं हिन्दी में समझता रहा।

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शायलजा चाहती हैं कि कोई हिन्दी वाला चेन्नई आए और तमिल समाज और संस्कृति के किस्सों और अंतर्विरोध को कवर करे जिससे देश का इस हिस्से से एक रिश्ता बने। उनसे बहुत बातें हुईं। वैसे हम उत्तर भारतीय यहां से दक्षिण कहते हैं। चेन्नई में लोगों का एक परिचय यह भी है कि वे ख़ुद को डाउन साउथ का बताते हैं। दक्षिण में भी सुदूर दक्षिण है। उत्तर में भी पूरब पश्चिम है। उत्तर में कुछ भी उत्तर जैसा नहीं होता। दक्षिण भी दक्षिण जैसा नहीं होता है।
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आपने कस्बा में चेन्नई को लेकर तीन चार पोस्ट देखे होंगे। मैं शनिवार को बारह बजे वहां पहुंचा। 1873 में बना कास्मोपोलिटन क्लब में रूका। इस क्लब में गांधी जी भी ठहरें हैं। यह क्लब ही अपने आप में एक इतिहास है। 2016 के दिसंबर में 1873 की उन शामों को याद करता रहा। इस क्लब के कमरे, सीढ़ियों से उस दौर के हंसने की आवाज़ें आ रही थीं।क्लब के पदाधिकारियों के नाम को उन्नीसवीं, बीसवीं सदी और इक्कीसवीं सदी के खांचे में बांट दिया गया था।
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