मेरे लिए एक चिट्ठी आई है…..

पत्रकार अपने काम से दर्शक और पाठक को क्या देता है, इसका लेखा-जोखा करना मुश्किल है। उसी तरह दर्शक और पाठक एक पत्रकार को क्या दे जाते हैं, इसका भी लेखा-जोखा करना मुश्किल है। उन सबको सहेज कर रखने की क्षमता स्मृतियों में नहीं है। मुझे हर दिन किसी न किसी दर्शक की चिट्ठी मिलती है। काश मैं सबको सहेज कर रख पाता। न जाने कितनी बोरियों में भर कर उन्हें ख़ुद से दूर जाते देखता रहा हूं। बहुत से ख़त उठा भी लाता हूं। कुछ बैग में भरकर घर आ जाते हैं, कुछ दराज़ में पड़े रह जाते हैं। मैं इन पत्रों में यही देखता रहता हूं कि एक समाज एक पत्रकार को कैसे देख रहा होता है। उसकी अपनी समझ में पत्रकारिता क्या है, क्यों है। क्यों लोग एक पत्रकार का हौसला बढ़ाते हैं, उससे अपनी समस्या बताते हैं और उसे लिखने की कोशिश करते हैं?

हर चिट्ठी मुझे रहस्यों की दुनिया में घेर लेती है। एक चिट्ठी की बात करना चाहता हूं जो पिछले हफ़्ते आई थी। मेरे पिताजी ने मुझे कभी पत्र नहीं लिखा, इस पत्र को उनका ही लिखा हुआ समझ कर पढ़ लिया। ज़िंदगी की किसी कमी को कोई और पूरी कर देता है।

मैंने विष्णु जी को फोन कर दिया। पहली आवाज़ में पहचान गए। अरे बेटा तू है जीता रह। परिचय का आदान प्रदान भी नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि जो गीता भेजी है उसे साथ रखो और रोज़ पढ़ो। बहुत बातें बताईं। कहा कि जब मैं तुम्हारा प्रोग्राम देखता हूँ तो कुछ लोग बोलने लगते हैं कि इसे क्यों देखते हैं, ये एंटी मोदी, एंटी इंडिया है तो वे कहते हैं कि पहले इसकी बात को सुनो, समझो। सबके भले की करता है। हम्म्म। बहुत ज़ोर लगा दी भाई लोगों ने मुझे लेकर!

84 साल की उम्र में मेरे लिए किसी ने हाथ से लिखा है, 9 पन्नों की चिट्ठी। आप बताइये मुझे क्यों नहीं ख़ुश होना चाहिए, क्यों नहीं ख़ुशी के मारे रोना चाहिए……मैं आपके लिए इस पत्र को टाइप कर रहा हूं।

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प्यारे बेटे रवीश,

सदा सुखी रहो। मेरी आयु 84 साल है। पार्टिशन से पहले पाकिस्तान के लाहौर शहर में रहते थे। वहां से ख़ाली हाथ आए थे। हिन्दु-मुस्लिम लड़ाई अपनी आंखों से देखी। इसके बावजूद भी मेरे मन में किसी कौम के प्रति द्वेष ज़रा भर भी नहीं। तुम मेरे को अपने बेटे से ही प्यारे लगते हो। मैंने सारे चैनल खंगाल डाले हैं पर NDTV जैसा कोई नहीं जंचा। NDTV पर भी तुम्हारा 9 से 10 प्राइम टाइम देखने के लिए मैं सबकुछ छोड़ कर देखता हूं। जिस दिन तुम्हारा प्रोग्राम नहीं आता तो कुछ खाली खाली सा महसूस होता है। यदि किसी कारण रात का प्राइम टाइम छूट जाता है तो अगले दिन दोपहर को देखना नहीं भूलता। मैं हर प्राणी को प्यार करता हूं। यह मेरे गुरु महाराज श्री रामसुख दास जी की क्रिया है। मैंने अपने जीवन में बहुत सन्त देखे। कहीं मन नहीं अटका। जब से स्वामी श्री रामसुख दास जी को देखा तब से कहीं और जाने को ज़रूरत ही नहीं पड़ी। स्वामी जी का नाम तो आपने सुना ही होगा। स्वामी जी ने 18 वर्ष की आयु में सन्यास धारण कर लिया था। 18 वर्ष के होने के समय से शरीर त्यागने तक उन्होंने पैसे को हाथ लगाना छोड़ दिया था। 103 साल की आयु में प्राण त्यागा।

तुम ने गीता प्रेस गोरखपुर की कई पुस्तकें पढ़ी होंगी। गीता प्रेस गोरखपुर ने हमारे जीवन में बहुत बड़ा योगदान किया है। भारत का एक मात्र संस्था है जिसने लाभ हानि के बिना साहित्य की सेवा की। पिछले 85 साल से कल्याण नाम की पत्रिका निकाल रहे हैं। परन्तु उसमें एक भी advertisement नहीं छपते। यह संसार की एकमात्र पत्रिका होगी जो बिना विज्ञापन के नाम मात्र सालाना चंदे पर छप रही है। गीता प्रेस के तीन संस्थापक थे। पहिल, श्री सेठ जयदयाल जी गोयन्दका, दूसरे भाई हुनमान प्रसाद पोद्दार जी और तीसरे स्वामी रामसुख दास जी थे। इन तीन PILLER पर गीता प्रेस खड़ा हुआ।

स्वामी रामसुख दास जी के कुछ सख़्त नियम थे। 1. स्वामी की फोटो खींचने की सख़्त मनाही थी। 2. कोई पैसा नहीं चढ़ाएगा। 3. गले में फूल माला पहनाना मना था। 4. राधे-राधे कहते हुए कोई भाई-बिन अपन हाथ ऊपर नहीं उठाएगी। 5. कोई भी स्वामी जी के चरणों को हाथ नहीं लगाएगा। 6. व्याख्यायन के लिए स्पेशल सिंहासन नहीं बनाएगा, साधारण चद्दर बिछाई जाए। स्वामी जी ने एक वसीयत एक संत की वसीयत के नाम से लिखी थी। उसकी एक प्रति आपको भेज रहा हूं। ऐसी वसीयत आज तक किसी ने नहीं लिखी होगी।

स्वामी जी ने कोई चेला नहीं बनाया, परन्तु मेरे जैसे अनेक सेवक पूरे भारतवर्ष में लाखों की संख्या में होंगे। उनके सेवकों में बिड़ला, डालमिया जैसे सेवक थे। कोलकाता में उनके व्याख्यान में लाखों की भीड़ होती थी। यदि आप ऋषिकेश जायें तो गंगाजी के उस पार गीता भवन है। स्वामी जी के अनुयायियों ने अब तक 7 गीता भवन बना दिए हैं। वहां रहने का कोई किराया नहीं लेते। वहां आप जितने चाहें रह सकते हैं। जीवन की हर आवश्यकता, बिस्तर, कमरा, गैस स्टोव, बरतन, इत्यादि मिलती है। अगली बार आप चाहें तो अपनी इच्छानुसार पर्ची कटवा सकते हैं। मैं आपको एक पौकेट भागवत गीता भी भेज रहा हूं। समय मिले तो इसको पढ़ सकते हैं। इस गीता को आप अपने बैग में रख लेना।

एक और बात आपको बताना चाहूंगा। मैंने जैसे पहिले भी लिखा कि मैं प्राणी मात्र को प्यार करता हूं। अपने किताब के काम में कश्मीर से कन्याकुमारी तक हर शहर और कस्बे में घूमा हूं। सब स्थानों पर चाहे हिन्दू हों, मुस्लिम हो, ईसाई हों या सिख हों। सबने बहुत प्यार दिया है। पता नहीं लोग धरम के नाम पर क्यों लड़ते हैं। सभी धर्मों में आम आदमी बहुत अच्छे हैं।

अपने जीवन की बहुत हैं लेकिन एक घटना आप से शेयर करना चाहूंगा। घटना आरम्भ होती है सन 1954-55 से। मैं अपने काम के लिए कश्मीर गया था। उस समय वहां सादक की गर्वमेंट थी। उस समय पीर गियासुद्दीन स्पीकर की पोस्ट पर थे। उनसे मुलाकात हुई। पता नहीं चला यह मुलाकात प्यार में बदल गई। जब वे दिल्ली आते थे तो मेरो को पिक करते थे। कश्मीर भवन में ठहरते थे। मेरे को साथ लेकर घूमते और रात को मेरे घर छोड़ कर जाते। उन दिनों मैं हर साल कश्मीर जाता था। अपनी फैमिली को लेकर जाता था। उनका श्रीनगर में नेहरू नगर में 8 कमरे का क्वार्टर था। हमें खाने पर बुलाते तो हमारे लिए वेजिटेरियन खाना बनाते थे। मेरी फैमिली के घूमने के लिए कार भेज देते थे। श्रीनगर में मैं लाल चौक के पास अमोरा कदल क पास जेहलम नदी में दो मंज़िल का खासला हिन्दू होटल एक सरदार जी का था। मैं उसी होटल में ठहरता था। उन दिनों मैं हर साल कश्मीर जाता था। कश्मीर का कोई कोना नहीं होगा, जहां मैं नहीं गया।

बच्चे छोटे थे। इसलिए हर साल कश्मीर जाता था। इस तरह पीर गियासुद्दीन से मिलता ही रहता था। मेरे पास कैमरा था। इसलिए अपनी, पीर की फैमिली उनके बच्चों की फोटो खींच कर लाता था। वह फोटो आज भी मेरे पास है। पीर जी से इतना प्रेम हो गया कि उनने जो शब्द कहे आज तक मेरे कान में गूंजते हैं। उन्होंने कहा कि “कश्मीर में बाहिर के लोग प्रोपर्टी ख़रीद नहीं सकते, परन्तु मैं दो प्लाट ख़रीदूंगा। हम दोनों भाई साथ-साथ मकान बनाकर साथ-साथ रहेंगे। “

उसके बाद मेरे बच्चे बड़े हो गए तो दाल-रोटी के चक्कर में पड़ गया। भारत के दूसरे शहरों में घूमना आरम्भ कर दिया। कई साल कश्मीर नहीं जा सका। कई साल बाद एक बार जम्मू गया। उस समय पीर जी कैबिनेट मिनिस्टर आफ इंडस्ट्री बन गए थे। मैंने उनका पता लेकर मिलने गया। वहां पता लगा कि पीर जी मीटिंग में गए हुए हैं। शाम तक आएंगे। मैं अपने ठिकाने पर आया तो फीवर आ गया। वाइफ़ मेरे को लेकर दिल्ली आ गई। फिर कई साल बाद मैं अपने मित्र को लेकर कश्मीर गया। पीर जी को मिलने गया। एक पलंग पर लेटे हुए थे। उठ कर गले लगे और ख़ूब रोए। कहने लगे मैंने तुम्हें बहुत ढूंढा पर आप नहीं मिले। मैं सोचता था मैं आपको कोई इंडस्ट्री लगवा देता। मेरे बच्चे भी आपके साथ काम में लग जाते। अब क्या हो सकता है, समय निकल गया है।

श्री तुलसीदास जी ने ठीक कहा है होई सोई जो राम रची राखा। ऐसी कई घटनाएं हैं। मेरे पत्र में कई त्रुटियां होंगी, English और urdu लाहौर में पढ़ी। हिन्दी यहां भारत में पढ़ी। इसलिए jack of all trade but master of none

ऐसी कई घटनाएं मेरी जीवन में भरी पड़ी हैं। अब पोते पोतियों वाला हो गया हूं। बच्चों ने दो फोन दे रखे हैं। पर मैं केवल फोन करना और सुनना जानता हूं। फोन का कोई और फंक्शन मैं जानता ही नहीं। दो साल पहले मेरी HIPP DISCLOCATION हो गई। दो महीने चारपाई पर सीधा और 5 केजी वज़न लटका कर पड़ा रहा। इसलिए टांगों में कमज़ोरी के कारण वाकर के सहारे पर ही हूं। मैं जीवन में बहुत चला। अब शायद भगवान ने चलने का कोटा समाप्त कर दिया। पर बहुत ख़ुश हूं। कोई तक़लीफ़ नहीं है। समय लेने का धन्यवाद।

आपका बहुत बड़ा FAN
Vishnu Bhagwan Sharma
Paschim vihar new delhi-63