मैं छुट्टी पर होकर भी छुट्टी पर नहीं हूं।

दोस्तों, मैं छुट्टी पर हूँ। रोज़ रात नौ बजे आपमें से किसी न किसी का मैसेज आ जाता है कि आप कहाँ हैं ? मैसेज पढ़ते ही किशोरावस्था का एक भय कौंध जाता है, जब समय पर घर नहीं लौटने पर पिताजी खोजना शुरू कर देते थे। दरवाज़े पर ही बैठ जाते थे। आपका मैसेज और मिस्ड कॉल एक बार के लिए कँपा देता है। अपराध बोध से भर जाता हूँ कि छुट्टी पर हूँ। कई बार तो लगा भी कि ऑफ़िस पहुँच जाए। वैसे ही इस ज़्यादा पहचाने जाने के कारण बाहर घूमने की स्वाभाविकता ख़त्म हो गई है । इस तकलीफ और छटपटाहट को बयां करना छोड़ दिया है क्योंकि यार दोस्त ही यक़ीन नहीं करते हैं। ख़ैर,यह कोई मसला नहीं है।

मेरी छुट्टी यही बताने में बीत जाती है कि हम आजकल कहाँ हैं!आज की रात क्यों नहीं आएं। ज़्यादातर दर्शकों की चिंता वाजिब भी रहती है। इसलिए उनका पूछना बिलकुल ग़लत नहीं है लेकिन हम दुनिया को कैसे बतायें कि छुट्टी पर हैं। अजीब तो लगेगा ही,अहंकारी भी प्रतीत होगा। कोई कहेगा,आप छुट्टी पर हैं तो ! बहुतों को चिन्ता होती है कि कहीं सरकार बहादुर ने मुझे चलता तो नहीं करवा दिया। आधे समय इसी का जवाब देता रहता हूं। किसी लोकतंत्र में सरकार की ऐसी छवि बन जाए,अच्छा नहीं है। अब मैं सिर्फ अपनी छुट्टी की घोषणा के लिए तो नहीं लिखूंगा। इसी बहाने कुछ और साझा करना चाहता हूं। पहले भी इससे मिलता-जुलता लिख चुका हूं।

सोमवार शाम मैंने टीवी देखा। सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया है कि राजनीति में धर्म और जाति के इस्तमाल नहीं होगा। इस पर तमाम चैनलों में बहस चल रही थी।निहायत ही फालतू। आप मुझे दंभी कह सकते हैं,मुमकिन है कि मैं भी इसी टाइप की बहस करता लेकिन उन बहसों को फालतू कहने का जोखिम उठाना चाहता हूं। बहस में वही प्रवक्ता थे जिन्हें न धर्म से मतलब है और न राजनीति से। मुद्दा कोई हो ,इनका काम अपने दल का समर्थन करना होता है और दूसरे दल का विरोध। पुरानी बातें ही दोहराते रहे। ग़ौर से देखेंगे तो ये डेटा फीट किये हुए रोबोट की तरह बोलते हैं। राजनीतिक दलों ने आप पर जो थकाऊ और शातिर प्रवक्ता थोपे हैं,उसका इलाज मेरे पास भी नहीं हैं। इन कार्यक्रमों का मकसद तो यही था कि इससे किसी मसले पर नए नए विमर्श पैदा हों। तरह तरह के जवाब आएं और राजनीति में जवाबदेही बढ़े। क्या आप मानते हैं कि इन बहसों से सिस्टम में कोई जवाबदेही आई है,राजनीतिक दलों का व्यवहार कुछ बेहतर हुआ है? अगर हां तो आपके मानने का आधार क्या है? ज़ाहिर है ये बहसें महज़ नक़ली कुश्ती का काम करती है,आपके भीतर की खाज को सतह पर लाकर खुजलाहट के आनंद से भर देती हैं। सवाल,जवाब सब फिक्स हो गए हैं। धर्म और राजनीति पर सिर्फ कांग्रेस बीजेपी के प्रवक्ता बोलेंगे ये भी फिक्स है। बाकी दल आचार डालें।

टीवी में प्रवक्ताओं की प्रमुख रूप से तीन कैटेगरी है। पहला,राजनीतिक मुख्यालय से रोस्टर के आधार पर भेजा गया प्रवक्ता। दूसरा,राजनीति दल की अधकचरी विचारधारा का समर्थन करने वाले तय विद्वान। पहला औपचारिक प्रवक्ता लगता है,दूसरा अनौपचारिकता के आवरण में औपचारिक प्रवक्ता लगता है। बहुत दलों के पास विचारक की सुविधा नहीं हैं,सिर्फ उनका प्रवक्ता ही होता है। टीवी ने इसका हल एक तीसरी कैटगरी से निकाला। उन दलों को बीट की तरह कवर करने वाले वरिष्ठ पत्रकारों को बुलाया जाने लगा। उनसे विशेष टिप्पणी की जगह प्रवक्ता वाले सवाल ही पूछे गए। इससे दर्शकों के ज़हन में जाने-अनजाने में उनकी छवि पार्टी के प्रवक्ता की बन गई। कालक्रम में एंकर उनसे इस तरह सवाल करने लगा जैसे वे पार्टी प्रवक्ता हों। दर्शकों को भी ऐसा लगना स्वाभाविक था। फिर धीरे धीरे इन पत्रकारों को चलता कर दिया गया क्योंकि इनमें से ज़्यादातर उन दलों के बीट को कवर करने वाले हैं जिनकी पार्टी विपक्षी मानी जाती है। अब वही पत्रकार आ रहे हैं जो सत्ता प्रतिष्ठान के उपासक हैं। ये पत्रकार कभी सपोर्टर,कभी रिपोर्टर तो कभी विचारक के तौर पर आते हैं। थ्री इन वन हैं। इनकी तटस्थता पर कोई सवाल नहीं करता। इन्हें मैं स्वागत योग्य पत्रकार सह प्रवक्ता कहता हूँ ।

अब आप राजनीतिक दलों के प्रवक्ता के जवाबों का अध्ययन कीजिये। आपको यह काम इसलिए करना चाहिए क्योंकि आप टीवी देखने के लिए केबल और इंटरनेट डेटा पर बहुत पैसे ख़र्च करते हैं। इन प्रवक्ताओं के जवाब तय हैं। उनकी पार्टी देवतुल्य, विरोधी पार्टी असुर दल। एंकर जब विपक्ष को घेरता है तो उसके तेवर और सवाल देखियेगा। लगेगा कि सरकार की तरफ से तीर चला रहा हो। सरकार से सवाल पूछता है तो उसके तेवर देखियेगा। लगेगा कि वो सलाहकार की भूमिका में है। आप दर्शकों को यह समझना चाहिए कि एक सरकार के लिए आप पूरी पत्रकारिता को ही मिट्टी में क्यों मिला देना चाहते है? क्या उन सरकारों ने अपनी तमाम ज़िम्मेदारियों पूरी कर ली हैं? आप क्यों साथ दे रहे हैं? ेय सिलसिला कब तक चलेगा। चैनल से पूछो तो जवाब आता है कि दर्शक ऐसे हैं, दर्शक से पूछो तो जवाब आता है कि हम क्या करें, आप जो दिखाते हैं,वही देखना पड़ता है। क्यों भाई चैनलों ने आपको सोफ़े से बाँध डाला है क्या?

भारत की संसद का दुर्भाग्य देखिये। एक से एक क़ाबिल वक्ता होंगे मगर दो मुख्य दलों के प्रवक्ताओं की सूची देखिये। उसमें सांसद न के बराबर मिलेंगे। वो भी जो सांसद होंगे वो सिर्फ अंग्रेज़ी चैनलों पर जायेंगे। राजनीति हिन्दी की करेंगे, नाम संस्कृत का लेंगे और दुकान चलायेंगे अंग्रेज़ी में। आख़िर टीवी के लिए ये दैनिक प्रवक्ता कहाँ से आते हैं? आप इनका इतिहास पता कीजिये। इनकी जनता के बीच राजनीतिक गतिविधि कम मिलेगी, पार्टी मुख्यालय से जुड़ी दफ़्तरी ज़िम्मेदारियों का ही इतिहास मिलेगा। हर कोई तरक्की करता है, इन्हें भी पूरा हक है मगर यहाँ बात तरक्की की नहीं हैं। ऐसे प्रवक्ता ख़ास कारणों से रखे गए हैं। राजनीतिक दलों द्वारा दर्शकों पर सज़ा के तौर पर भेजे गए हैं।

ग़ैर निर्वाचित प्रवक्ताओं की यह टोली एक तरह से आउटसोर्स डिपार्टमेंट की तरह काम करती है क्योंकि नेता और सांसद के आने से हर बयान की जवाबदेही बढ़ जाती है। टीवी पर जो प्रवक्ता आते हैं वे प्रतिनिधित्व तो राजनीतिक दल का करते हैं मगर उसकी जवाबदेही का नहीं करते। इनकी भाषा में जवाब कम होता है, दंभ ज़्यादा होता है। पूरी कोशिश होती है कि सवाल को अपने मैदान में ले आए,फिर कुछ बीस साल पुराने तर्कों और तथ्यों को निकाल कर उसकी धुनाई करें और अपना समय किसी तरह काट लें। जलेबी की तरह घुमा घुमा कर बोलते रहते हैं। जवाब कम मिलता है, समय ज़्यादा खप जाता है।

इन प्रवक्ताओं को कारपोरेट कम्युनिकेशन हेड के करीब रखता हूँ। वैसे तो कंपनी का मालिक बिना कम्युनिकेशन हेड की जानकारी के माडिया को इंटरव्यू देता रहता है लेकिन जब सवालों के जवाब नहीं देने होते हैं तो कम्युनिकेशन हेड को आगे कर देता है। आप टीवी पर रोज़ शाम ऐसे ही प्रवक्ताओं को देखते हैं। मुझे तो शक है कि इनकी छह महीने में एक बार भी अपने अध्यक्ष या सरकार प्रमुख से मुलाकात भी होती होगी। ये सभी अलग-अलग दलों से आपके टीवी पर हर शाम आते हैं। भारत के हर मसले पर बोलते हैं। साल भर बोलते हैं। अब तो ये भी थक गए हैं।पहले स्टुडियो आते थे,अब घर से ही बोलते हैं। किसी मसले को कुतर्कों से गोबर में बदलने में इनकी भूमिका सराहनीय है। इनका काम आपको अराजनीतिक बनाना है। क्या आप अराजनीतिक होना समझते हैं? कस्बा पर डिबेट फार्मेट को लेकर एक लेख लिखा था। जनमत की मौत।

ज़्यादातर प्रवक्ता ऐसे ही हैं।यह हमारे लोकतंत्र,टीवी पत्रकारिता और दर्शकों का दुर्भाग्य है। आप अपनी नियति बदल सकते हैं मगर संसाधनों की वास्तविक और अवास्तविक कमियों से जूझ रहे टीवी को नहीं बदल सकते। आप भारत में घटिया और लंपट टीवी देखने के लिए एक दर्शक के नाते अभिशप्त हैं। टीवी खंडहर में बदल गए हैं जहाँ राजनीतिक दलों ने सरकारों के हिसाब से क़ब्ज़ा कर लिया है। इसी कस्बा पर टीवी को लेकर कई लेख लिखे लेकिन न टीवी को फर्क पड़ा न दर्शकों को और न इस पेशे में मेरे दोस्तों को।उल्टा धीरे धीरे मैं भी उसी कालचक्र का हिस्सा होता चला गया।

हम भी इसे बदल नहीं सकते हैं। मैं निराशा से नहीं कह रहा बल्कि उम्मीदों से लबालब होकर कह रहा हूँ। इसके लिए ख़ास योग्यता और संसाधान की ज़रूरत होती है जो हमारे पास नहीं है। पत्रकार से अख़बार निकाल कर दिखा देने की उम्मीद सिनेमाई है। रोज़ इच्छा तो होती है कि कुछ नया किया जाए मगर इसकी एक लागत होती है। जिन्हें पत्रकार बनने का मौका मिला है वो अपने आप को तैयार ही नहीं करना चाहते। कम से कम हिन्दी की बात कर सकता हूँ। जिन्हें मौक़ा नहीं मिला,उनकी क्या बात करें।

जो चैनल रेटिंग के दंभ भरते हैं,उनकी पत्रकारिता का मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि उस रेटिंग और राजस्व से उन्होंने स्पीड न्यूज़ के अलावा कौन सा मानदंड बनाया। क्या रेटिंग के राजस्व से वे योग्य पत्रकार रख पाये या रिपोर्टिंग पर ख़र्चा कर किसी क़ाबिल को पत्रकार बना एक एंकर को लेकर चेहरा बना दिया गया है। वही सबका विकल्प है। आपको रिपोर्टिंग का फर्क समझना है तो कुछ दिन के लिए propublica, the atlantc, the wire.in, scroll.in पर जाकर देखिये। वहां आपको किसी खास मुद्दे पर टीवी से बेहतर समझ मिलेगी और रिपोर्टिंग की शैली का ज्ञान भी होगा। the wire.in पर असम पर आपको लंबी रिपोर्ट मिलेगी। उसे पढ़िये तो पता चलेगा कि उतना लिखने के लिए कितनी मेहनत लगी होगी।आप टीवी देखिये। हर जगह स्टंट है। एक ही लाइन बार बार पंच लाइन बन कर आती है। कभी तो आप दर्शक ख़ुद से सवाल करेंगे कि आप क्यों देख रहे हैं ये टीवी। ठीक है कि टीवी के पास संसाधन नहीं हैं, क्या उनके पास भी नहीं हैं जो रेटिंग में टाप हैं। फिर क्या आप उन चैनलों में रिपोर्टिंग की ऐसी विविधता नज़र आती है। आप फेसबुक पर जाकर देखिये। हर जगह इन्हीं वेबसाइट की ख़बर साझा हो रही है। टीवी की न्यूज़ बहुत कम साझा होती है। लोग एंकर को जोकर की तरह देखने लगे हैं।

एक बार आप भी सजग दर्शक के नाते सोचकर देखिये कि स्पीड न्यूज से आपको क्या सूचना मिलती हैं। भदर-भदर हथिया बारिश की बूँदों की तरह ख़बरें गिरती आती हैं और जब तक पता चलता है, ग़ायब हो जाती हैं। क्या वाक़ई आप स्पीड न्यूज़ से कुछ जान पाते हैं? या जानने का भ्रम पालते हैं? क्या यही रिपोर्टिग है? जो पत्रकार लाखों रुपये देकर पत्रकारिता की पढ़ाई करते हैं, उनसे पूछिये कि स्पीड न्यूज बुलेटिन बनाते वक्त आप किस तरह के पत्रकार बन रहे होते हैं। बाकी कार्यक्रमों का भी वही हाल है। इसमें कोई भी चैनल अपवाद नहीं है। बग़ैर रिपोर्टिंग के आप कोई चैनल कैसे देख सकते हैं?आप उन लोगों से बात कीजिये जो स्पीड न्यूज़ देखते हैं। उनसे बात कीजिये जो ये डिबेट शो देखते हैं। क्यों एक ही प्रवक्ता और एक ही जवाब के लिए रोज़ रात को डिबेट देखते हैं। क्यों ख़बरों के नाम पर दिल्ली से आई राजनीतिक बयानों और घटना प्रधान तस्वीरों वाली ख़बरें देखते हैं। टीवी का रिपोर्टर अब जोखिम क्यों नहीं उठाता है। दूर दूर जाकर खबरों को क्यों नहीं खोजता है। ख़बरों के नाम पर यह स्पीड न्यूज आपकी दर्शक क्षमता का मज़ाक उड़ाती है। मेरे एक मित्र ने बताया कि रेटिंग में कई चैनलों के स्पीड न्यूज़ शीर्ष दस कार्यक्रमों में शामिल रहते हैं। वो कौन सा दर्शक है जो कई सालों से किसी बगदादी के मारे जाने का वीडियो टीवी पर देख रहा है? न्यूज़ रूप में आइडिया की हत्या हो चुकी है। कई बार हत्या हो चुकी है। क्योंकि ख़बर तो होती नहीं है, कतरन से आइडिया लेकर बुलेटिन भरनी होती है। ज़ाहिर है कतरन भी अब धूल कण में बदल चुकी है। आप एक फुटेज से कितनी बार कार्यक्रम बनायेंगे।

मैं जानना चाहता हूँ कि लंपट टीवी देखने की आपकी क्या मजबूरी हो सकती है? आप जो डिबेट देखते हैं,उससे आपको जानकारी मिलती है या कांग्रेसी भाजपाई होने के अहं को तुष्टि मिलती है? आप एक दर्शक के नाते क्यों नहीं पूछते कि कब तक भारत के नाम पर हमें सिर्फ उत्तर भारत के ढाई राज्य देखना होगा। वो भी उन ढाई राज्यों के चप्पे चप्पे की तस्वीर नहीं दिखती। वही ढाई प्रवक्ता दिखते हैं, जिन्हें हर शाम राजनीतिक दल एंकर और रेटिंग की हैसियत के हिसाब से टीवी पर भेजता है। बहरहाल, मैं छुट्टी पर हूं। मैं कैसे छुट्टी पर हो सकता हूं। दिमाग़ तो उसी सब में है। इसलिए हम छुट्टी पर हों या न हों, छुट्टी पर नहीं होते हैं दोस्त। न कर पाने की बेचैनी सिर्फ निराशा नहीं होती है। वो कुछ और होती है जो कभी न कर पाने वालों को समझ नहीं आएगी।