अमेरिकन शिक्षा छात्र राजनीति, और कुछ महत्वपूर्ण जानकारियाँ

University of Central Florida (UCF) के बीचों-बीच और लाइब्रेरी के पीछे एक बिल्डिंग है Student Union (SU), जहाँ पर अलग-अलग गतिविधियों के इलावा खाना खाने और उठने-बैठने की जगह है। अगस्त 2014 में पीएचडी ज्वाइन करने के बाद लगभग रोज़ तरनजीत सिंह भाटिया (Mars Man) के साथ लंच करने SU आने लगा। एक दिन SU के बाहर कुछ छात्रों के काउंटर लगे हुए देखे, तरन ने बताया कि Student Government Association (SGA) के इलेक्शन चल रहें हैं। ज्यादा जानकारी के लिए एक काउंटर पर गए तो एक लड़की ने कहा कि वोट करो और फ्री में टी-शर्ट ले लो। अपनी पहले की समझ मुताबिक मुझे लगा कि टी-शर्ट लेने के लिए इस लड़की की पार्टी के उम्मीदवारों को ही वोट देना होगा। पूछने पर लड़की ने बताया कि किसी को भी वोट दो, टी-शर्ट्स तो वोटिंग को प्रमोट करने के लिए है। उस समय पहली बार मैंने खुद को राजनीतिक तौर पर भारत से बाहर महसूस किया था।

अब बताता हूँ कि UCF का छात्र संघ SGA क्या-क्या सेवाएं मुहैया करता है। SGA छात्रों को कॉन्फ्रेंसों में शोध पत्र प्रस्तुत करने के लिए साल में एक बार कम से कम $250 देता है। उन्होंने SU बिल्डिंग में ही साइकिल रिपेयर करने की एक वर्कशॉप खोली है जहाँ पर कोई भी छात्र फ्री में साइकिल ठीक करवा सकता है। SGA सभी छात्रों को हफ्ते में 100 पेज फ्री में प्रिंट करने की सहूलियत देता है, इससे ज्यादा प्रिंट करने के लिए खुद से अतिरिक्त ब्लेंक पेज लाकर प्रिंटर का उपयोग कर सकते हैं। छुट्टियों के समय में SGA छात्रों को ट्रैवल करने के लिए Orlando Internationl Airport तक फ्री बस सर्विस उपलब्ध करता है। इसके इलावा SGA सभी छात्रों के लिए साल में एक बार Universal Studios फ्री जाने का इंतजाम भी करता है, हालाँकि टिकट लेने के लिए घंटो तक लाइन में लगना पड़ता है। इन सब के इलावा SGA साल भर में कई इवेंट्स आयोजित करता है।

अब आते हैं अमेरिका के एजुकेशन सिस्टम पर। इससे पहले बता दूँ कि मैंने UCF आने से पहले Panjab University (PU) चंडीगढ़ से मास्टर डिग्री की है और इन दोनों संस्थानों में अपने अनुभव लिख रहा हूँ। हो सकता है कि UCF और PU के इलावा दूसरे संस्थानों में सिस्टम कुछ अलग हो, इसलिए सामान्यीकरण (generalization) अथवा तुलना ना करें। तो सबसे पहले बात करते हैं विषयों की। UCF में दूसरे संस्थानों से किये हुए विषय ट्रांसफर करवाने की अनुमति है। मैंने अपना पीएचडी का कोर्सवर्क जल्दी पूरा करने के लिए PU से किये हुए विषय ट्रांसफर करने की कोशिश की। कुल मिलाकर PU के 24 में से UCF में 5 विषय ट्रांसफर के लिए मंजूर हुए, क्योंकि बाकी सारे विषय UCF में अंडरग्रेजुएट लेवल में पढ़ाये जातें हैं जो कि मैंने PU में ग्रेजुएट लेवल पर किये थे। विषयों के सिलेबस और उनमे पढ़ाये जाने वाले मटीरिअल, टेक्सटबुक्स पर कुछ नहीं कहूंगा।

PU में मुझे अतिरिकित समय के लिए कंप्यूटर साइंस डिपार्टमेंट की लैब में बैठने की अनुमति नहीं थी। लेकिन UCF में आते ही रिसर्च लैब में एक केबिन मिला जिस पर दो कंप्यूटर लगे थे। लैब में रात-दिन किसी भी वक्त आने-जाने के लिए कुछ ही दिनों में मुझे एक विशेष चाबी भी मिल गई। यहाँ पर यह भी बताना चाहूंगा कि PU की कंप्यूटर लैब में बैठने की अनुमति ना होने की वजह से ही मैं PU की लाइब्रेरी के बारे में जान सका था, जो कि आने वाले सालों में मेरा दूसरा घर बन गया, और लाइब्रेरी का सारा स्टाफ परिवार का मेंबर। अब जब भी अमेरिका से भारत जाता हूँ तो एयरपोर्ट से सीधा PU, और गेस्ट हाउस में सामान रख कर सीधा लाइब्रेरी! लेकिन उस कंप्यूटर लैब की सीढ़ियों पर चढ़ने का हौंसला अभी तक नहीं हुआ।

अब बात करते हैं फंडिंग की। UCF सभी पीएचडी और कुछ मास्टर स्टूडेंट्स को असिस्टेंटशिप के रूप में फंडिंग देती है, जिससे ट्यूशन फीस के साथ-साथ रहन-सहन का खर्च निकल जाता है। इस बार PU गया तो अमनदीप से मिला जो कि PU में रिसर्च स्कॉलर है। कुछ महीने पहले अमन का एक शोध पत्र ऑक्सफ़ोर्ड में “Best Paper” चुना गया था और वो वहां पेपर प्रेजेंट करने गई थी। मुलाकात के दौरान अमन ने बताया कि पेपर के चक्कर में अब तक की सारी सेविंग निकल गई, और यूनिवर्सिटी से कोई नैतिक समर्थन या सराहना भी नहीं मिली। मैं इसी अप्रैल में एक शोध पत्र प्रेजेंट करने के लिए सैन फ्रांसिस्को गया था, जिसके लिए एक महीना पहले ही ट्रैवेल ग्रांट मिल गई। पिछले साल भी अलग-अलग शोध पत्र प्रेजेंट करने के लिए न्यूयॉर्क में कोलंबिया यूनिवर्सिटी और बोस्टन गया था और ग्रांट मिली थी। मुझे अभी तक कोई “Best Paper” अवार्ड नहीं मिला है। कुछ समय पहले PU के वाईस चांसलर ने कहा था कि फंड्स नहीं होने की वजह से यूनिवर्सिटी बंद होने की कगार पर है। हाल ही में PU प्रशासन ने इसका हल 10 गुना तक फीस बढ़ा कर निकाला है, जिसे सही ठहराने के लिए जनप्रतिनिधित्व और निष्पक्षता का दावा करने वाले कुछ मीडिया वालों ने तुलनात्मक अध्ययन किया है कि दूसरे संस्थानों के मुकाबले PU की फीस बहुत कम है। और छात्रों पर मुक्कदमें होना तो आम सी बात है।

UCF में पीएचडी पूरी करने के लिए कम से कम 10-12 शोध पत्र प्रकाशित करने की जरूरत होती है। भारत में शोध की बुनियादी समझ के लिए पता करिए कि यहाँ के विश्वविद्यालयों से पीएचडी करने के लिए UGC के दिशा निर्देशों अनुसार कितने शोध पत्रों की आवश्यकता है। शोध पत्र प्रकाशित करने के लिए कॉन्फ्रेन्सेस/जर्नल्स के चयन के मापदंडों पर अभी कुछ नहीं कह रहा हूँ, और ना ही शोध प्रकाशन की पूरी प्रक्रिया की सही जानकारी पर।

अब बताता हूँ UCF की लाइब्रेरी के बारे में। पिछले साल परीक्षा के दिनों में एक किताब वापिस करने का समय पूरा हो गया था। लाइब्रेरी स्टाफ से किताब कुछ और दिनों के लिए देने की मांग की तो उसने बताया कि उसी किताब की प्रार्थना किसी दूसरे छात्र ने भी की है इसलिए वापिस करनी ही होगी। लेकिन उसने सामने लगी एक मशीन की तरफ इशारा करते हुए बताया कि तुम यह किताब स्कैन कर सकते हो। तब मैंने पहली बार बड़ा सा स्कैनर देखा जो 500-600 पेज की किताब को 25-30 मिनटों में स्कैन कर सकता है। ऐसे स्कैनर की PU लाइब्रेरी को बहुत सख्त जरूरत है। किसी दूसरे दिन एक दोस्त के साथ लाइब्रेरी गया तो पता चला कि वहाँ पर कुछ घंटे पढ़ाई के लिए अलग से कमरा रिज़र्व कर सकते हैं। ऐसे ही एक और दिन लाइब्रेरी स्टाफ ने बताया कि एक टाइम में 200 तक किताबें इशू करवा सकते हैं। अगर कोई किताब उपलब्ध नहीं है तो आस-पड़ोस की संस्थाओं से मंगवा सकते हैं। और अगर वहां भी नहीं है तो लाइब्रेरी को वह किताब खरीदने के लिए बोल सकते हैं।

UCF की ऑन-कैंपस हाउसिंग काफ़ी महँगी है, जिसके मुकाबले में PU के होस्टल बहुत अच्छे हैं। हालाँकि UCF आस-पास की ऑफ-कैंपस हाउसिंग कम्युनिटीज के लिए फ्री बस मुहैया करती है। मैं ऑफ-कैंपस रहता हूँ और साइकिल पर कैंपस जाता हूँ। वैसे यहाँ पर साइकिल को बाइक कहते हैं। और PU की आउटडोर वाई-फाई सर्विस UCF के आउटडोर इंटरनेट से बेहतर है।

अब बात करते हैं कि अमेरिका की यूनिवर्सिटियों से मास्टर या पीएचडी करने के लिए दाखिला कैसे लिया जा सकता है, माने प्रक्रिया क्या है। GRE और TOEFL एग्जाम के बारे में शायद आपने सुना ही होगा, नहीं तो इंटरनेट से मदद लीजिये। ज्यादातर अंतरराष्ट्रीय छात्रों का दाखिला अगस्त-सितंबर महीने में शुरू होने वाले Fall सेशन के लिए होता है, और इसके लिए तैयारी कम से कम एक साल पहले शुरू करनी पड़ती है। आने वाले Fall सेशन के लिए एडमिशन की एप्लीकेशन भरने की अमूमन आखिरी तारीख नवंबर-दिसंबर में होती है। एप्लीकेशन पूरी करने के लिए GRE, TOEFL, ग्रेजुएट-पोस्टग्रेजुएट की ऑफिशियल ट्रांसक्रिप्ट, स्टेटमेंट ऑफ़ पर्पस/रिसर्च स्टेटमेंट, तीन रिकमेन्डेशन लेटर्स, रिसर्च अनुभव (जरूरी नहीं, पर अगर हो तो), और $80-$120 एप्लीकेशन फीस चाहिए। GRE और TOEFL एग्जाम साल में कभी भी अपॉइंटमेंट ले कर दे सकते हैं, लेकिन एप्लीकेशन भरने तक इनका स्कोर आ जाना चाहिए। 3-4 महीनों में एप्लीकेशन का नतीजा आ जायेगा, और अगर एडमिशन मिला तो फिर वीजा, टिकट, पैकिंग, दोस्तों से मुलाकात, और अमेरिका पहुँचने का उत्साह !

एक बात और बताना चाहता हूँ। भारत के सबसे शीर्ष संस्थानों, जैसे कि IITs, IISC, IIMs, TIFR, TISS, JNU, DU इत्यादि, से पढ़े छात्रों को अमेरिका के MIT, Stanford, Princeton, Harvard, UCLA, Caltech, UC Berkeley जैसे शीर्ष संस्थानों में एडमिशन मिलने का ज्यादा चांस होता है। इसके कारण जानना आप पर छोड़ता हूँ। अब हो सकता है कि कोई दलित या गरीब छात्र IITs, IIMs ना पहुँच सके, जिसकी वजहें बहुत सारी हो सकती हैं। हो सकता है कि छात्र गरीबी की वजह से स्कूल की रेगुलर पढ़ाई छोड़ कर प्राइवेट एग्जाम दे रहा हो और साथ-साथ मजदूरी/देहाड़ी कर रहा हो। यह भी बहुत ही व्यावहारिक परिस्थिति है कि छात्र के पास IITs, IIMs के एंट्रेंस एग्जाम की कोचिंग के लिए पैसे ना हों, और खुद से तैयारी करने में बहुत ज्यादा समय लग जाए। यह भी संभव है कि स्कूल टाइम में छात्र को IITs, IIMs का पता ही ना हो, और इन संस्थाओं में दाखिले के लिए जरूरी विषय उसने पढ़े ही ना हों। हमारे गांव/देहात के सरकारी स्कूलों में ऐसी जानकारी बहुत कम दी जाती है, जबकि शहरों के प्राइवेट स्कूलों में इसकी अच्छे से कॉउंसलिंग होती है। अपने आस-पास या दूर-दराज के गांवों के सरकारी स्कूलों में पढ़ रहे बच्चों से इसके बारे में पूछने से आप समझ जायेंगे कि मैं क्या कह रहा हूँ। इसलिए Harvard, MIT, Stanford पहुँचने के लिए हार्डवर्क के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि का भी बड़ा योगदान है। इसको टेक्निकल भाषा में चेन ऑफ़ इवेंट्स, रिप्पल इफ़ेक्ट, या कैसकेड इफ़ेक्ट कहते हैं। इन चेन ऑफ़ इवेंट्स को समझे बगैर आप हमारे देश की आर्थिक नीतियों पर कुछ हार्वर्ड, ऑक्सफ़ोर्ड वाले विद्वानों के गढ़ की पहेली नहीं सुलझा सकते। और हाँ, ऊपर बताई कुछ कठिन परिस्थितियों में भी अच्छी शिक्षा हासिल कर पाने की मिसाल के लिए डॉक्टर अंबेडकर का उदाहरण मत दीजियेगा। उम्मीद है कि थोड़े से सामान्य बोध से ही आप समझ लेंगे कि मैं यहाँ उदाहरणों से बात नहीं कर रहा, बल्कि प्रथम सिद्धान्तों (first principles) के आधार पर बात कर रहा हूँ।

अब कुछ और जरूरी जानकारी। भारत सरकार के सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय की तरफ से “अनुसूचित जाति इत्‍यादि के अभ्‍यर्थियों के लिए राष्‍ट्रीय ओवरसीज छात्रवृत्ति की केन्‍द्रीय क्षेत्र स्‍कीम” (“Central Sector Scheme of National Overseas Scholarship for SC etc.”) का प्रावधान है। इस स्कीम के तहत अनुसूचित जाति के छात्रों को अमेरिका या इंग्लैंड में मास्टर या पीएचडी डिग्री करने के लिए स्कालरशिप मिलती है। सूचना के अभाव में लोग इस स्कीम का फायदा नहीं उठा पाते और अक्सर नियमित सीटें खाली रह जाती हैं। विस्तृत जानकारी के लिए नीचे दिया लिंक चेक करें या उपरोक्त मंत्रालय से संपर्क करें। इसी तरह से यूरोपियन यूनियन भी भारत समेत कई देशों के छात्रों को यूरोप के कुछ चयनित संस्थानों में उच्च शिक्षा के लिए फंडिंग देती है। इंटरनेट पर खोज करिए।

और एक बात। ऐसा नहीं है कि अमेरिका के एजुकेशन सिस्टम में खामियां नहीं हैं। यहाँ पर मेरा मकसद शिक्षा के बुनियादी ढांचे को साँझा करना है। अमेरिका में एजुकेशन लोन एक गंभीर समस्या है। याद रखिये कि एजुकेशन लोन आपको “लोन डिग्री” से आगे की पढ़ाई से वंचित कर देता है। और शिक्षा आपका मौलिक अधिकार है, व्यापार करने की कोई वस्तु नहीं।

अंत में एक और अनुभव शेयर कर देता हूँ। पिछले दिनों कैंपस गया तो लाइब्रेरी के पास बड़े-बड़े बोर्ड लगे देखे, जिन पर अजन्में बच्चों के खून से लथपथ फोटो थे। 20-25 साल के 10-12 छात्र बता रहे थे कि महिलाओं को एबॉर्शन करवाने का अधिकार क्यूँ नहीं होना चाहिए। कुछ सालों से अमेरिका में औरतों के “रिप्रोडक्टिव राइट्स” के कानूनी प्रावधानों पर बहस चल रही है। इस मुद्दे पर ज्यादा समझ ना होने और समय की कमी की वजह से मैं वहाँ नहीं रुक सका, लेकिन छात्रों द्वारा इतने संवेदनशील मसले पर विमर्श करना, खुले मंच पर अपने विचार रखना, और पक्ष-विपक्ष के सभी पहलुओं पर तर्कसंगत बातचीत करना अच्छा लगा। संवाद करिए, उन्माद नहीं।

साभार: दिव्या ने इस लेख की हिंदी ठीक करने में सहायता की है। कुलदीप इसके लेखक हैं।

http://socialjustice.nic.in/SchemeList/Send/28?mid=24541