आवश्यकता है हिन्दी मीडियम सोशलाइट की

अंग्रेज़ी टीवी चैनलों में तमाम मुद्दों पर बोलने के लिए कुछ सोशलाइट लोग भी दिखते हैं। ‘सिंगर’ होते हैं, ‘ऑथर’ होते हैं या ‘एगनी आंटी’ कॉलम लिखते हैं, जिन्हें पाँच साल से फिल्म में कोई काम नहीं मिल रहा होता है, ऐसे सपोर्टर होते हैं। ये लोग जिस बहस में आमंत्रित होते हैं, उस विषय के न तो जानकार होते हैं और न ही जानना चाहते हैं। आप देखेंगे कि चैनलों के डिबेट बक्सों में बीजेपी कांग्रेस और ‘सो कॉल्ड न्यूट्रल’ के बाद ऐसे ही ‘सोशलाइट’मसनद पर बिठाये जाते हैं। डिबेट के बाद इनमें से कई वैसी पार्टियों में दिखते हैं जो हमारे सो जाने के दो घंटे बाद शुरू होती हैं।

इनकी ख़ास बात ये होती है कि भारत को यह सिलीगुड़ी या खजुराहो देखकर नहीं जानते बल्कि पेरिस या हिथ्रो एयरपोर्ट देखकर जानते हैं। हफ्ते में कभी कभार हवाई अड्डे के शोचालय में फ्लश ठीक से काम न करने पर ट्वीट कर चुके होते हैं और भारत को सिंगापुर से ‘ग्रेट’ बनाने का ख़्वाब देखते हैं। अगर कोई ‘कॉप’, सिपाही नहीं, इनकी बातों पर ध्यान नहीं देता है तो ये मुख्यमंत्री को ‘टैग’ कर ट्वीट करते हैं।

भारत या उसके मसलों के बारे में कम जानने का लाभ ये होता है कि इनकी बातों और आहों में ओ माय गॉड ‘ ओएमजी’ फ़ैक्टर होता है। ‘ सच थिंग’ इंडिया में ‘हैपन’ हो रहा है, इस पर ये ‘काँट विलिव’ करते हैं। हिन्दी के आदमी के साथ यही दिक्कत है। वह भारत और उसकी समस्याओं को इतनी गहराई से जानता है कि अचरज नहीं करता है। हतप्रभ नहीं होता। चौंकता ही नहीं है। उसकी बातों में ‘ओएमजी’ फ़ैक्टर नहीं होता है। उसका रिएक्शन ठंडा होता है। पता नहीं वो ‘ब्रेक अप’ पार्टी में जाती या जाते भी हैं या नहीं और पार्टी के बाद सुबह तक’ कॉन्टी’ पार्टी करते हों या न करती हों।
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अंग्रेज़ी के ‘सोशलाइट’ शैटिन कुर्ता या कुर्ती पहनते हैं। मैं इन्हें ‘ सैटिन सोशलाइट’ कहता हूँ। इनके बाल बिखरे होते हैं, (आयुर्वेदिक शैम्पू से नहीं) और असली डायमंड के रिंग कानों से लटक रहे होते हैं। ये लोग पार्टियों में पालन की जाने वाली नैतिकता को पूरे भारत पर लागू करना चाहती हैं या चाहते हैं। जब डिबेट में कोई दूसरा मोड़ नहीं आता है तब ये ‘सोशलाइट’ मोर्चा संभाल लेते हैं , लेती हैं। दिल्ली हवाई अड्डे पर बोलने के लिए आते हैं लेकिन एम्सटर्डम एयरपोर्ट के बारे में बता कर चले जाते हैं। इनकी मौजूदगी से टीवी का स्टुडियो गुलज़ार लगता है। ये लोग ख़ुद ख़ानदानी अमीर होते हैं मगर राजनीति में परिवारवाद के ‘अगेन्स्ट’होते हैं। इनसे घिरा एंकर ‘न्यू इंडिया’ का ताक़तवर लगता है। पता चलता है कि एंकर सीधा मोतिहारी से नहीं गिरा है। इसे दिल्ली मुंबई के बड़े लोग भी जानते हैं। एंकर का फ़र्स्ट नेम या ‘निक नेम’लेकर बुलाते हैं।

हिन्दी में ऐसे सोशलाइट क्यों नहीं है? जो किसी भी घटना पर न जानते हुए अपने विचित्र और विस्मय बोधक प्रतिक्रियाओं को रख सकें । क्यों जरूरी है कि हिन्दी के सोशलाइट सब जानते ही हों। जाने भी तो ‘ओएमजी’ भाव से बता तो सकते ही कि पहली बार जाना कि उनके ग़रीबी रेखा से नीचे के भारत के ऊपरी तबके में ये सब भी होता है। हाय राम या दैय्या रे दैय्या टाइप का भाव क्यों नहीं दे सकते। ऐसा करते वक्त वे खाते पीते अघाये घरों के भी लगे और चमकदार कपड़े भी पहने। एकाध कुर्ता सैटिन का सिलवा कर रख लें। हिन्दी में जो सोशलाइट आते हैं या आती हैं वो अंग्रेजी से ही कंट छँट कर आते हैं या आती हैं। उनमें मूल हिन्दी के नही होते जो शाम से ही सिंगल मॉल्ट में डूबे हो और घर के बाहर ओबी वैन चालू होने के बाद इंडिया को लेकर आक्रामक हो जायें। ये लोग ऐसे हों जो लिबरल या लेफ़्ट कवि से नफरत करते हों मगर उन्हीं के साथ जयपुर लिट फेस्ट में इंडिया आफ्टर नेहरू पर बोलते हों। मतलब ऐसे लोगों को एक्सपोज़ करते हों।

ऐसे ‘ सैटिन सोशलाइट’ के बिना हिन्दी सूनी लगती है। लगता है कि यहाँ उदासी ही संपत्ति है। संपत्ति वाला प्रभु वर्ग नए कपड़े सिलवाता ही नहीं और अपने कुतर्की और अ-बौद्धिक पहचान को लेकर गर्व नहीं करता है। हिन्दी वाला बौद्धिक पहचान को लेकर सीरीयस रहता है। हमेशा ‘सेंस’ वाली बात करने के चक्कर में ‘नानसेंस’ मिस कर जाता है।

इसलिए यहाँ एक विज्ञापन दे रहा हूँ । आवश्यकता है हिन्दी सोशलाइट की जो भारत के हर मसले पर पश्चिमी नज़रिया रखे मगर उसके भीतर इंडिया के हिन्दू अतीत को लेकर गौरव भी हो। ये ‘सैटिन सोशलाइट’ हमेशा प्रधानमंत्री का सपोर्टर हो। कभी कभी उनके मंत्रियों से नाराज़ हो कर प्रधानमंत्री से ही अपील करता हो। उनके साथ प्रेम करता हो। उन्हें प्रभु मानता हो। इन सबसे ज़्यादा ज़रूरी है कि वह भारत के हर विपक्ष को लोकतंत्र के लिए ‘शेम’मानता हो और वो स्टुडियो में आने के बाद घर जाने की जल्दी में न हो। इंडिया को’शेप’ करने का काम आसान नहीं होता। ऐसे सोशलाइट ख़ुद भक्त भीड़ का हिस्सा हों लेकिन वीकेंड कॉलम में ‘मॉब मॉंतालिते’के ख़िलाफ़ लेख लिखे।