क्या रेलवे में दो लाख से ज़्यादा नौकरियां कम कर दी गईं हैं…..

आज के टाइम्स आफ इंडिया के पेज नंबर 20 पर प्रदीप ठाकुर की रिपोर्ट छपी है। रिपोर्टर ने तो अपनी तरफ से ख़बर छाप दी है मगर इस ख़बर के आंकड़ें बता रहे हैं कि सरकार रोज़गार को लेकर किस तरह से खेल करती है। अख़बार के अनुसार सरकार ने इस बार के बजट में 2 लाख 80,000 नौकरियों के लिए बजट का प्रावधान किया है। सबसे अधिक भर्ती आयकर विभाग में होगी जिसकी क्षमता को 46,000 से बढ़ाकर 80,000 करने की बात है। उत्पाद शुल्क विभाग में भी 41,000 लोग रखे जायेंगे। इस वक्त उत्पाद व शुल्क विभाग की क्षमता 50,600 है जिसे बढ़ाकर 91,700 किया जाएगा। किस स्तर की नौकरी है,उनकी प्रकृति क्या होगी, यह सब साफ नहीं है। यह भी साफ नहीं है कि कितने दिनों में भर्तियों का काम पूरा कर लिया जाएगा। क्या आयकर,उत्पाद व शुल्क विभाग ने एक साल के भीतर कभी भी अस्सी हज़ार भर्तियां कर सका है? रिपोर्ट से साफ नहीं है और मुझे भी नहीं लगता है।ऐसी रिपोर्ट अख़बारों में छपती है तो संख्या के कारण आकर्षक लगती है।

सातवें वेतन आयोग की रिपोर्ट में केंद्र सरकार के विभागों में मंज़ूर पदों और बहाल पदों को लेकर रोज़गार का अच्छा विश्लेषण है। आयोग ने तमाम विभागों से आंकड़ें जुटा कर तमाम तथ्य रखे हैं। (http://7cpc.india.gov.in/pdf/sevencpcreport.pdf) इस लिंक पर जाकर देख सकते हैं। इसकी एक तालिका से पता चलता है कि राजस्व विभाग में 2006 से 2014 यानी आठ सालों के बीच मात्र 25,070 बहालियां हुईं। इससे आप अंदाज़ा लगा सकते हैं या सवाल पूछ सकते हैं कि राजस्व विभाग में अस्सी हज़ार भर्तियां कब तक होंगी। कहीं 2030 तक तो नहीं! हर विभाग में नौकरियों की स्थिति का कच्चा चिट्ठा सातवें वेतन आयोग की रिपोर्ट में है।

टाइम्स आफ इंडिया की रिपोर्ट में लिखा है कि बजट के एनेक्सचर में रेलवे के मैनपावर में 2015 से लेकर 2018 तक कोई बदलाव नहीं है। यानी सरकार ने मैनपावर बढ़ाने का कोई लक्ष्य नहीं रखा है। अखबार में छपी तालिका के अनुसार 2015 से 18 के बीच हर साल रेलवे की कार्यक्षमता यानी मैनपावर 13,26,437 से लेकर 13,31,433 ही रहेगा। 1.1.2014 को रेलवे की मंज़ूर क्षमता 15 लाख 57 हज़ार थी। अगर टाइम्स आफ इंडिया की तालिका सही है तो मोदी सरकार से सवाल पूछा जाना चाहिएँ कि क्या रेलवे की नौकरियों में भारी कटौती की गई है? यूपीए के समय से ही रेलवो में छंटनी होती आ रही है लेकिन उनके समय मंज़ूर पदों की संख्या 15 लाख थी जो अगले तीन साल के लिए करीब 13 लाख बताई गई है। मंज़ूर पदों की संख्या में ही दो लाख की कमी? सातवें वेतन आयोग की तालिका से पता चलता है कि रेलवे में कभी भी मंज़ूर क्षमता के बराबर भर्तियां नहीं हुई हैं। यूपीए के समय पहली जनवरी 2014 को मंज़ूर क्षमता 15 लाख 57 हज़ार थी तब 13 लाख 61 हज़ार ही लोग काम कर रहे थे। अब तो मंज़ूर क्षमता दो लाख कम कर दी गई है। अगर इसके नीचे लोग काम करेंगे तो रेलवे में नौकरियों की वास्तविक संख्या दो लाख से भी ज़्यादा घट जाएंगी।

प्रधानमंत्री ने यूपी की चुनावी सभा में कहा था कि रेलवे में एक लाख भर्तियां हुई हैं। आप सातवें वेतन आयोग और टाइम्स आफ इंडिया की तालिका के आधार पर परख सकते हैं कि प्रधानमंत्री या तो झूठ बोल रहे हैं या ग़लत बोल रहे हैं। टाइम्स आफ इंडिया के अनुसार अनुमानित क्षमता में इतनी वृद्धि नहीं दिखती है। 2015 के लिए रेलवे की अनुमानित क्षमता 13,26,437 है। 2016 के लिए 13,31,433 है। ये बजट के आँकड़े हैं। मात्र चार पाँच हज़ार की वृद्धि दिखती है। सरकार को इस बिन्दु पर जवाब देना चाहिए। विपक्ष कभी नहीं पूछेगा।भारत के इतिहास में इससे आलसी विपक्ष कभी नहीं हुआ।उसे डर लगता है कि पूछेंगे तो उनसे भी पूछा जाएगा। तो पूछिये। किसी युवा को नौकरी मिलनी ज़्यादा ज़रूरी है या पूछा-पूछी में कौन जीतेगा वो ज़रूरी है।

रेलवे देश में सबसे अधिक सरकारी रोज़गार देती है। सातवें वेतन आयोग की रिपोर्ट के अनुसार 2006-2010 यानी 4 साल के बीच रेलवे में 90, 629 भर्तियां ही हुईं। 2006 से 2014 के बीच 3 लाख 30, 972 भर्तियां दिखाई गई हैं। केंद्र सरकार के तमाम विभागों में 2006 में 37.01 लाख कर्मचारी थे। 2014 में यह संख्या बढ़कर 38.90 लाख हुई। आठ साल में यूपीए सरकार का रिकार्ड कितना ख़राब है। आप इस संख्या से आसानी से समझ सकते हैं। इसी तरह के आंकड़ें रक्षा मंत्रालय को लेकर भी दिख रहे हैं कि वहां भी बहाली कम होती जा रही है। हर विभाग में मंज़ूर क्षमता के हिसाब से दस से बीस फीसदी पद ख़ाली हैं। सरकार जानबूझ कर बेरोज़गारी पैदा कर रही है। चुनावी ख़र्चे में तो कोई कमी नहीं आती है मगर वित्तीय बजट घाटे को कसने के लिए तरह तरह के कदमों को सही ठहराया जाता रहता है।

भारत के सरकारी संस्थाओं की हालत क्यों ख़राब है। इसलिए नहीं कि वहं कोई काम नहीं करना चाहता बल्कि वहां काम करने वाले नहीं हैं।दिल्ली में एक लाख की आबादी पर निगमों के कर्मचारी की संख्या 1260 है। आप सोचिये। सफाई के लिए कितने कम कर्मचारी होंगे। जब कर्मचारी नहीं होंगे तो शहर को साफ कौन करेगा। इस सवाल से बचने के लिए लगातार आपके दिमाग़ में यह बात ठूंसी जा रही है कि लोग शहर को गंदा करते हैं। सरकार नहीं बताती है कि स्वच्छता अभियान के तहत कितने कूड़ेदान किस शहर में रखे गए और इन्हें साफ करने के लिए कितने लोगों को काम दिया गया। बोगस बातें चारों तरफ चल रही हैं।हर सवाल हिन्दू मुस्लिम और राष्ट्रवाद जैसे फटीचर बातों पर पहुंच जाता है।

अमरीका में एक लाख की आबादी पर वहां के केंद्रीय कर्मचारियों की संख्या 668 है। भारत में एक लाख की आबादी पर केंद्रीय कर्मचारियों की संख्या 138 है। आबादी अमरीका से कहीं ज़्यादा भारत है मगर कर्मचारी अमरीका में तिगुने है। तो साफ-सुथरा और व्यवस्थित कौन दिखेगा। भारत या अमरीका?कायदे से टाइम्स आफ इंडिया की हेडलाइन होनी चाहिए थी कि सरकार ने रेलवे के मंज़ूर पदों की संख्या में दो लाख की कटौती की मगर हेडलाइन है कि सरकार दो लाख अस्सी हज़ार पदों पर भर्तियां करेगी। इसी रिपोर्ट में अख़बार यह भी लिखता है कि केंद्र सरकार को आईटी, आयकर, उत्पाद व शुल्क विभाग में एक लाख 88 हज़ार नए लोगों को रखना था। मगर सरकार पदों को भर नहीं पाई। तो फिर अखबार को बताना चाहिए कि 2 लाख 80 हज़ार के आंकड़ों में बैकलॉग कितना है, नई नौकरियां कितनी हैं। 2014-2016 के बीच जो सरकार दो लाख लोगों को नहीं रख सकी, वो करीब तीन लाख लोगों को कितने साल में रखेगी। रूकिये। इसी रिपोर्ट में एक और आंकड़ा है। दो साल में भर्तियों का लक्ष्य पूरा नहीं होने के कारण उत्पाद व शुल्क, आई टी और आयकर विभाग में कर्मचारियों की संख्या में 21,000 की कमी आ गई। इसीलिए कहता हूं हम सब अख़बार पढ़ते तो हैं मगर किसी को अख़बार भी पढ़ना नहीं आता है।

नोट- 2017 की यूपीएससी की परीक्षा के लिए 980 पद तय हुए हैं। पिछले पांच साल में यह सबसे कम है। बाकी आप कब्रिस्तान और श्मशान के मसले को लेकर बहस कर लीजिए। इसी को ईमानदारी से कर लीजिए। लोग अब नालों के किनारे अंतिम संस्कार करने लगे हैं। ज़्यादा दूर नहीं, दिल्ली से सिर्फ बीस किमी आगे लखनऊ रोड पर। बोलिये कि इसके विकल्प में कोई सरकार क्या करने वाली है। कब्रिस्तानों पर भूमाफियाओं के कब्ज़े हैं। ये माफिया हिन्दू भी हैं और मुस्लिम भी हैं। बताइये कि क्या ये ज़मीनें मुक्त हो पाएंगी। लेकिन इसमें ज़्यादा मत उलझिये। नौकरी के सवाल पर टिके रहिए। मर गए तो कौन कैसे फूंकेंगे या गाड़ेगा यह कैसे पता चलेगा और जानकर करना क्या है। हम और आप तो जा चुके होंगे।