हरियाणा की हां ना

दो दशक से हरियाणा में जाट मुख्यमंत्री ही रहा है। ग़ैर जाट लोगों को लग रहा है कि इस बार उनकी बारी है। सोनीपत के एक पुराने पत्रकार ने अपने तमाम तजुर्बों को समेटते हुए कहा कि जाट बनाम ग़ैर जाट का चुनाव हो रहा है इस बार। कांग्रेस और इनेलो जाट नेता के दम पर लड़ रहे हैं जबकि बीजेपी बिना नेता के ग़ैर जाट मतदाताओं को समेट रही है। हरियाणा की राजनीति में जाट बनाम गैर जाट की राजनीति कोई नया पाठ नहीं है। बात इस पर हो रही थी कि क्या बीजेपी ग़ैर जाट बनाम जाटों के बीच वोटों का ध्रुवीकरण कर सकेगी। चूंकि भारतीय राजनीति में ध्रुवीकरण किसी और संदर्भ में भी इस्तमाल होता है इसलिए यहां ध्रुवीकरण का अर्थ उन प्रचलित संदर्भों में न निकालें तो बेहतर रहेगा। जब बीजेपी चौटाला से लेकर हुड्डा के भ्रष्टाचार और गुंडई पर हमले करती है तो एक तरह से वो ग़ैर जाट राजनीति को ही हवा दे रही होती है।

हरियाणा की राजनीति में सांसद से ज्यादा विधायक का महत्व होता है। यहां की राजनीति विधायकों के आस-पास घूमती है। छोटा सा राज्य है मगर यहां की राजनीति अहिरवाल बेल्ट, जाट बेल्ट, जी टी रोड लाइन न जाने किन किन विभाजक रेखाओं से गुज़रती है। जाटों की राजनीति में मलिक जाट समाज का अपना ही दबदबा रहता है। मलिक जाट संख्या और सक्षमता में सब पर भारी पड़ते हैं। बीजेपी ने इस बार मलिक खाप के प्रधान दादा बलजीत मलिक को बरोदा विधानसभा से उम्मीदवार बना दिया है। मलिक जाट समाज इस बात को लेकर कई हिस्सों में बंट गया है कि खाप के प्रधान को किसी पार्टी का टिकट लेना चाहिए था या नहीं। जाट बेल्ट में मलिक जाटों का रूझान भी राजनीति को धारा बदल देता है मगर इस बार तो मुखिया ही बीजेपी के टिकट पर हैं। दादा बलजीत कहते हैं कि उनके दादा भी आज़ादी से पहले पंजाब प्रांत का चुनाव लड़ चुके हैं। कोई नई बात नहीं है। उन्होंने किसी और खाप का नाम लिया जिसके प्रधान चुनाव लड़ रहे हैं। दादा बलजीत ने कहा कि सामाजिक और राजनीतिक काम अलग होते हैं। इसमें कोई बड़ी बात नहीं हैं।

लेकिन जब मैं मलिक जाटों के एक बड़े और महत्वपूर्ण गांव भैंसवाल पहुंचा तो मलिक बिरादरी के कई लोग इस बात पर सवाल कर रहे थे। उनका कहना था कि खाप के प्रधान की पदवी मुख्यमंत्री और विधायक से भी बड़ी होती है। इसका राजनीतिकरण नहीं करना चाहिए। इससे प्रधान का कद छोटा हुआ है। कुछ लोगों ने कहा कि उनके बीजेपी में जाने के बाद हम अलग प्रधान चुनेंगे। दादा बलजीत से जब इस बारे में सवाल पूछा तो उन्होंने कहा कि यह पद तो वंशानुगत है। कोई दूसरा प्रधान कैसे हो सकता है। बीजेपी ने बेहद चतुराई से मलिक खाप में बहस की विभाजन रेखा खींच दी है। जाटों के बीच ज्यादा से ज्यादा विभाजन बीजेपी को लाभ मिलेगा क्योंकि अगर इनका वोट कांग्रेस के पास रह गया या कांग्रेस से निकल कर इनेलो के पास गया तो बीजेपी को नुकसान हो सकता है।

जाट बंटेंगे तो गैर जाटों को लाभ मिलेगा। बीजेपी के सात सांसद चुने गए हैं। इनमें से छह गैर जाट बिरादरी के हैं। बीजेपी का एक ही सांसद जाट है। पिछली विधानसभा में बीजेपी के पास चार विधायक थे। इसलिए पार्टी के पास खोने के लिए कुछ नहीं है। वो हर जगह बढ़ती हुई सुनाई दे रही है। पुराने घाघ चर्चाकार भी अपनी चर्चाओं में बीजेपी को इनेलो के बराबर या उससे भी ज्यादा तवज्जो दे रहे हैं। अगर बीजेपी गैर जाट ध्रुवीकरण में सफल रही तो उसकी सरकार बनेगी या बीजेपी के बिना किसी की सरकार नहीं बनेगी। बीजेपी ने हरियाणा के स्तर पर नेतृत्व देने के बजाए अपने नेताओं को इलाकावार बांट दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह हरियाणा में धुआंधार रैलियां कर रहे हैं। वो इस विश्वास के साथ कि एक और रैली हो जाए तो एक और सीट निकल आएगी।

बाल्मीकि जयंती के दिन प्रधानमंत्री की रोहतक में रैली थी। उन्होने मुख्यमंत्री हुड्डा पर निशाना साधा कि मुख्यमंतरी के इलाके में दलित लड़कियां सुरक्षित नहीं हैं। मोदी 2002 की अनुसूचित जाति जनजाति आयोग की रिपोर्ट का भी ज़िक्र कर रहे थे कि 19 लड़कियों के साथ दलित हिंसा हुई है। एक एक वोट जोड़ने के लिए इतनी मेहनत की प्रधानमंत्री 12 साल पुरानी रिपोर्ट का ज़िक्र कर रहे हैं। शायद उसके बाद कोई रिपोर्ट ही न आई हो। लेकिन इससे भी आगे जाकर प्रधानमंत्री ने दलित वोट को बीजेपी के पाले में करने के लिए जो रूपक गढ़े उससे लगता है कि बीजेपी कितनी रचनात्मक होती जा रही है। वो हर दिन नए प्रतीकों को गढ़ रही है और उसके पास नहीं है तो किसी और से हड़प ले रही है। प्रधानमंत्री ने रोहतक रैली में तिरंगे का हवाला देते हुए कहा कि उसमें सिर्फ तीन रंग नहीं है। अशोक चक्र में नीला रंग भी है। मैं चार रंग की क्रांति लाना चाहता हूं। केसरिया क्रांति जिसका नाम सुनकर मेरे सेकुलर मित्रों को बुखार चढ़ जाता है। वो सो नहीं पाते हैं। केसरिया का मतलब है लोगों को ऊर्जा। लोगों को बिजली चाहिए। पिछले बीस साल में भारतीय राजनीति में आपने कब प्रतीकों का इतना स्मार्ट इस्तमाल आपने सुना है। कितनी आसानी ने प्रधानमंत्री ने केसरिया को भगवा अर्थ में धार्मिक प्रतीक से निकालकर बिजली से जोड़ दिया।

तिरंगे के रंगों की व्याख्या केसरिया पर ही नहीं ठहरती है। वे कहते हैं कि सफेद क्रांति लाऊंगा। देश में दूध का उत्पादन बढ़ेगा। हरित क्रांति लाऊंगा। हमें नीली क्रांति की भी ज़रूरती है। और नीली क्रांति क्या है। मोदी कहते हैं कि समुद्र की शक्ति बढ़ाने की ज़रूरत है ताकि हम बंदरगाहों को मज़बूत कर सकें और मछुआरों को बढ़ावा दे सके। नीली क्रांति के नाम से मोदी ने हरियाणा के दलितों को ही नहीं मछुआरों को ही बात करने का एक मुद्दा तो दे ही दिया। बहुत कम लोग जानते होंगे कि मछली पालन में हरियाणा अव्वल राज्यों में से एक है। बाकी दलों के नेताओं के भाषण को सुनिये। सिर्फ हमले हैं। राजनीतिक प्रतीकों का इस्तमाल नहीं दिखेगा। शायद उनमें ये सब करने की क्षमता नहीं है। नीली क्रांति का नाम लेकर उन्होंने हरियाणा में चुनाव लड़ने की औपचारिका निभा रही मायावती की नींद तो उड़ा ही दी होगी। यूपी चुनाव में देखते हैं मोदी इस नीले रंग से क्या क्या गुल खिलाते हैं। हरियाणा से बीजेपी का एक दलित सांसद भी है। हरियाणा में मायावती की राजनीति किसके खिलाफ है समझ ही नहीं आता। पार्टी का किसी से गठबंधन नहीं है। यूपी से कहीं ज्यादा दलित मतदाता आजाद है किसी भी तरफ जाने के लिए। मुख्यमंत्री के लिए ब्राह्मण उम्मीदवार तय कर मायावती ने हरियाणा के लिए एक औपचारिकता पूरी कर दी है। कोई सघन लड़ाई नहीं है। कांग्रेस के पास दलित अध्यक्ष है मगर अशोक तंवर की सामाजिक राजनीतिक पहचान बनने की प्रक्रिया में है। कम से कम वो दलित राजनीति की पहचान तो नहीं ही हैं।

कहीं गुर्जर तो कहीं दलित तो कहीं ब्राह्मण तो कहीं पंजाबी हर तरह के समुदायों को आगे बढ़ाकर बीजेपी अपनी दावेदारी बढ़ाती जा रही है। उसका प्रचार आक्रामक तो है ही बल्कि उसी का प्रचार सब जगह दिखता है। जनता भले यह तय नहीं कर पाई हो कि किसे वोट दें मगर इस कंफ्यूजन में लाभ भी बीजेपी को मिलेगा। कांग्रेस आक्रामक दावेदारी कर नहीं रही है। इनेलो ताकत से चुनाव लड़ रही है मगर ओम प्रकाश चौटाला के कारण नए मतदाताओं, महिलाओं और मध्यमवर्ग में पकड़ नहीं बना पा रही है। यही सब कारण है कि बीजेपी शहरी मतदाताओं के दम पर इतनी सीटें तो हासिल कर ही लेगी कि उसके बिना किसी की सरकार नहीं बनेगी। क्या पता उसी की बन जाए।

कई लोग कहते हैं कि नतीजा त्रिशंकु होगा। कुछ कहते हैं कि बीजेपी का गांवों में संगठन नहीं है। संगठन तो उसके पास कहीं नहीं था लोकसभा में 272 से भी ज़्यादा सीटें ले आई। इसका कारण है बीजेपी का चुनाव अभियान। उसकी सघनता और तीव्रता इतनी तेज़ होती है कि वो उन मतदाताओं की निगाहों में सबसे पहले चढ़ जाती है जो कभी तय नहीं कर पाते कि क्या करें। सिर्फ इतना ही नहीं बीजेपी ने चुनाव के समय दूसरी पार्टियों से सिर्फ नेता ही नहीं लिये बल्कि उन छोटे मोटे नेताओं को भी बुला लिया जो स्थानीय स्तर पर सामाजिक पकड़ रखते हैं। आलोचक इन्हें भाड़े के नेता कह सकते हैं मगर बीजेपी ने इन्हीं के दम पर अपना शामियाना लगा लिया है। इसीलिए वो चर्चाओं में नंबर वन पर है। ठीक है कि बीजेपी के पास मुख्यमंत्री का उम्मीदवार नहीं है मगर जिनके पास है क्यों वो आज इतने बड़े नाम हैं कि हरियाणा की राजनीति को अपने आस पास घुमा सकें। जनता के सामने नाम का तो संकट है ही नहीं।

फोटो क्रेडिट : इंडिया डॉट कॉम