गेस्ट ब्लॉग : हमारे कटहलतर वाले नाना जी

यह पोस्ट अविनाश कुमार चंचल नें लिखा है।

अचानक ही आज कटहल वाले नानाजी याद आ गये। उनकी कभी सुनायी शायरी ‘कब तक छिपोगी ऐ किरियों, पत्ते की आड़ में, आखिर कभी तो बिकोगी आम बनकर बाजार में’- न जाने कहां से मेरे जीभ पर आकर अटक गयी। करीब पन्द्रह साल बाद अचानक ही इस शायरी का याद हो आना और वो भी ज्यों का त्यों। स्कूल में नीचले दर्जे में पढ़ता रहा होउंगा शायद, तभी इस शायरी को कटहल तल वाले नानाजी ने सुनाया था। कटहल तल वाले नानाजी की कोई तस्वीर नहीं है मेरे पास। लेकिन उनको याद करता हूं तो एक बेहद लंबा तलवा याद आता है और उससे भी लंबे पैर और उससे भी लंबा कद। नाक और कान भी लंबे – लंबे जेहन में उतरते हैं। कुल मिलाकर छह फीट लंबी कद काठी। लंबी आँखे, लंबाकार चेहरा और खूब चौड़ा माथा।

बाद में उन लंबे तलवे पर उग आए कुछ घास-फूस भी याद आते हैं, जिन्हें अब कुष्ठ रोग का लक्षण समझने लगा हूँ। दरअसल कटहलतल वाले नानाजी हमारे ननिहाल में नहीं रहते थे, वो हमारे गांव में ही आकर रहते थे। हां, उनका घर मेरे ननिहाल में था और ससुराल मेरे गांव में। हमलोग उन्हें कटहर तल वाले नानाजी कहते थे क्योंकि उनका घर कटहल के पेड़ के नीचे था।

युवा होने के बाद की जिन्दगी और उसके भागम भाग में कई चीजें जेहन से गायब सी हो गयी हैं- उनमें कटहल तल वाले नानाजी भी हैं। पिछले चार-पांच सालों में शायद ही उनकी याद आयी है। हां, इतने ही साल पहले उनके मरने की खबर पर छोटा सा अफसोस भर व्यक्त कर सका था। लेकिन स्मृतियां तो मन में घर कर जाती हैं। बचपन की, बचपन का हिस्सा रही ये स्मृतियां तो ऐसे ही अचानक कहीं किसी रोज मुनिरका के किसी कमरे में बैठे-बैठे सामने आकर खड़ी हो जाती हैं और सबकुछ एक-एक कर याद आने लगता है। आज कटहल तल वाले नानाजी की स्मृति भी कुछ ऐसे ही सामने आ गयी- मार्फत इस शायरी।

दरअसल, कटहल तल वाले नानाजी कुष्ठ रोग से पीड़ित थे। इसलिए शायद वो अपने घर नहीं लौट कर ससुराल में ही रह गए। बाद के दिनों में अँधे भी हो गए थे। लेकिन याद आता है कुछ न दिखने के बावजूद वो चश्मा लगाते थे। शायद उस चश्मे से उन्हें छाया का भान होता हो। खैर, उनके चश्मे से ही हमने न जाने कितने कागज धूप में जलाये हैं। हाई पावर के उनके चश्मे के नीचे कोई कागज रखकर जब भी हम उसे धूप में रखते, कागज जलने लगता। यह हमारे लिये एक खेल था, जिसे नानाजी ने ही अपने विज्ञान के मार्फत सीखाया था। बिना आँख से देखे वो हमारे खेलने की खुशी को टटोला करते और खुद भी उसमें शरीक होते।

नानाजी कई गुणों से भरपूर थे। और उनके अनुसार ये सारे गुण उनको खानदानी विरासत में मिली थी। मसलन, अच्छी अंग्रेजी बोलना, दवाओं और मेडिकल का ज्ञान, खूब सुर में गाना और शायरी। नानाजी गाहे बगाहे हमें भी खूब गाना सुनाते, हमसे अंग्रजी में बतियाते और जरुरत होने पर हमारा इलाज भी उन्हीं से करवाया जाता। जिस इलाके में पचास कोस के दायरे में कोई डॉक्टर न हो वहां नानाजी जैसे दवा-सुई देने वालों को समाज देवता नहीं तो उससे कम भी नहीं मानता। शायद यही वजह थी कि नानाजी के कुष्ठ रोग से पीड़ित होने के बावजूद समाज में उनकी इज्जत वैसी ही बनी रही थी, जबकि उस जमाने में कुष्ठ, रोग कम पाप का फल ज्यादा समझा जाता था और आजतक हमारे समाज में कुष्ठ रोगियों को घृणा के भाव से ही ट्रीट किया जाता है।

आज इतने सालों बाद नानाजी को याद करता हूं तो उनकी चिकित्सा पद्धति पर शोध करने का मन होता है। आँख नहीं होने के बावजूद वो सटीक दवा बताते। उनकी पत्नी जिसे हम कटहल तल वाली नानी कहते को उन्होंने सुई देना सीखलाया था। खुद के शरीर को प्रयोगशाला बनाकर। नानी पढ़ी-लिखी नहीं थी, लेकिन फिर भी वो गांव भर में सुई-दवा करने जाती रहती। नानाजी कहते- पीली गोली, छोटी गोली, काली गोली, बड़ी गोली, हरी-नीली गोली। तमाम तरह की गोलियों के रंग और आकार उन्होंने याद कर रखे थे और उसी अंदाज पर मरीज का इलाज भी किया जाता। आजतक मुझे याद नहीं कि उनकी दवा से किसी को हानि पहुंचा हो, हां, लोग कैसे ठीक हो जाते थे ये आश्चर्य का विषय हो सकता है।

नानाजी ने इसी चिकित्सा पद्धति के सहारे अपने घर चलायें, दो बेटियों को सरकारी नर्स बनाया, चारों बेटियों की शादी की और ढ़ेर सारे गांव वालों की जान बचायी, उनके पैसे बचाये।
नानाजी से जुड़ी और कई सारी यादें हैं। उनमें उनका हम पर गुस्सा भी है, खूब मन लगाकर पढ़ने की सलाह भी और उनके झूठे चाय के कप में चाय पीने की चोरी पर घर से मार खाने की याद भी है।

आज सोचता हूं तो समझ आता है कि हमारे आसपास गांवों में न जाने ऐसे कितने ही अजूबे बिखरे हुए थे, न जाने कितना ही लोक ज्ञान हमारे आसपास, हमारी स्मृतियों में बिखरा पड़ा है, जिन्हें हम महानगरीय आपा-धापी में बिसरते चले जाते हैं। यह भी समझ आता है कि कुदरत एक कमी देता है, तो दस खूबियां भी भर देता है। बस, जरुरत है हिम्मत, आत्मविश्वास और उम्मीद को जिन्दा रखने की। इस महानगरीय जीवन में जब हम कल और परसों के दोस्तों को याद नहीं रख पाते, अपनी विरासत और अनूठे स्मृतियों को याद रख पाना बड़ी चुनौती ही है।

फोटो क्रेडिट :  चित्रा वैद्य