गोरखपुर से अब श्रीलंका भी जाने लगे हैं लोग

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ऐसा भी नहीं कि अनजान भाषा के बीच अकेलापन महसूस कर रहा था फिर भी चेन्नई के मरीना बीच पर भोजपुरी कानों में खनक गई। शायद ये नौजवान यहाँ के त्रिशुर की कपड़ा फैक्ट्रियों में काम करते होंगे और वहाँ जाने के रास्ते मरीना बीच घूमने आए होंगे। गोरखपुर,बस्ती,पडरौना,देवरिया ये सब मेरे बचपन के शहर हैं मगर कुछ ऐसा हुआ कि तीस साल का फ़ासला हो गया। फिर भी वहाँ से जो रिश्ता है वो इनके साथ ह रही बातचीत से जीवंत होने लगा। अवध सिंह कुशवाहा से बातचीत होने लगी। बताया कि वे यहाँ से हवाई जहाज़ पकड़ेंगे और श्रीलंका जायेंगे। मैंने बिहार यूपी के मज़दूरों के केरल तक जाने की बात तो सुनी है लेकिन श्रीलंका का नाम सुनकर ठिठक गया। नए दौर में माइग्रेशन कहाँ कहाँ हो रहा है हम ठीक से जानते भी नहीं।

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यह तस्वीर अवध सिंह कुशवाहा की है। अवध ने बताया कि तीन चार साल पहले उनके गाँव का कोई श्रीलंका गया। उसी के पीछे पीछे हमलोग भी जाने लगे हैं। पहले अवध नैरोबी गए। वहाँ से मलेशिया और अब श्रीलंका जाने लगे हैं। उनके गाँव और जवार के बहुत से लोग श्रीलंका कमाने जा रहे हैं। भोजपुरी भाषी वेस्ट इंडीज़,मॉरिशस से लेकर अफ्रीका तक कहाँ नहीं गए।श्रीलंका भी जाने लगे हैं,पहली बार सुना। अवध ने बताया कि बिहार से भी बहुत लोग वहाँ कमा रहे हैं। उनकी बात को मैं यहाँ लिख रहा हूँ। जितना याद रह गया है।

” हमलोग हार्ड वर्क करते हैं।इ काम पढ़ा लिखा लोग नहीं कर सकता।पढ़ने लिखने से लोग कोमल हो जाता है।स्टील की फैक्ट्री में लोहा गलाते हैं। छह घंटे का काम होता है।फैक्ट्री वाला ही रहना खाना देता है।वहाँ की भाषा नहीं आती है।अंग्रेजी नहीं आती है।ज़रूरत ही नहीं है।फैक्ट्री के कैंपस में रहते हैं पैंतालीस हज़ार महीने का बच जाता है।तीन साल रहने पर वहाँ की सरकार दवा और स्कूल फ्री देती है।बहुत लोग वहाँ फ़ैमिली रखा है।हम भी ले जायेंगे।हम लोग स्टील की फैक्ट्री में काम करते हैं। कांट्रेक्टर सब का सब जगह के फैक्ट्री वाला से सेटिंग होता है।वही ले जाता है हमलोगों को।वहाँ कोई दिक्कत नहीं है।श्रीलंका भी तो एशिया महाद्वीप में आता है।एशिया महाद्वीप के देशों में कोई अंतर नहीं है। सब एक जैसा है। हम तो कई देश घूम कर देख चुके हैं।विदेश घूमने के लिए पढ़ना ज़रूरी नहीं है।”

इन मज़दूरों की हिम्मत की दाद देनी चाहिए। अपने ही शहरों की अनजान जगहों पर जाने से हम कितना घबराते हैं।ये लोग श्रीलंका तक चले जाते हैं। गुड्डू चला गूगल में नौकरी करने।अक्सर अख़बारों के ज़िला संस्करणों में ऐसी सुर्ख़ियाँ होती हैं।ऐसे गुड्डू का एक सपना भी होता है।एक दिन भारत के लिए कुछ करना चाहता है।फिलहाल गूगल में जाकर गोतिया-पटिदार में अपना और अपने माँ बाप का नाम रौशन करना चाहता है।हमने भी अवध सिंह कुशवाहा जैसे को कभी’अचीवर’नहीं माना।जानबूझ कर अंग्रेज़ी का शब्द अचीवर लिखा है।अवध जैसे साहसी युवक न सिर्फ अपने लिए रास्ता बनाते हैं बल्कि ज़िला-जवार के बाकी लोगों के लिए भी रास्ता खोल देते हैं। अवध के चेहरे की मुस्कान अपने आप में हेडलाइन है। आप ग़ौर से देखिये।