फ़ैसले की नीयत तो सही है लेकिन….

मैंने कभी नीयत के आधार पर किसी फैसले की ऐसी तारीफ नहीं देखी। मोदी जी की नीयत फैसले के असर से भी बड़ी हो गई है। नोटबंदी के दो पार्ट है। पहला, नीयत और दूसरा लागू होने के नाम पर कोहराम। दुनिया का यह पहला फ़ैसला है, जो कम से कम दस दिनों तक बुरी तरह फ़ेल है, इसके बाद भी फ़ैसला लेने के इरादे के पैमाने पर ज़िला भर में टॉप है। लल्लन टॉप है। मल्लब जिस फैसले से आपका अस्सी फीसदी बिज़नेस चौपट हो जाए, फिर भी आप उसकी तारीफ कर रहे हैं क्योंकि फ़ैसला लेने का इरादा सही था ! क्या किसी फैसले का ऐसा इरादा ठीक है कि आपका अस्सी फीसदी बिज़नेस डूब जाए। आपका इरादा तो ठीक है न !
आठ नवंबर की मध्यरात्रि से नोटबंदी ही नहीं हुई है, बल्कि उस दिन से फैसले की एक नई समीक्षा भी बाज़ार में लाँच की गई। तय हुआ कि सही या ग़लत होना इसके लागू होने से कोई ताल्लुक़ नहीं रखता है क्योंकि फैसले के लिए जाने का इरादा ठीक था। ऐतिहासिक था। साहसिक था। नीयत अच्छी थी। बोलने वाला कह रहा है कि उसके धंधे की मैय्यत निकल गई है मगर फैसले की नीयत सही है। अगर नोटबंदी से प्रधानमंत्री मोदी ने कुछ हासिल किया है तो वो यही कि उनके इरादे की विश्वसनीयता बढ़ी है। लागू करने की विश्वसनीयता घटी है। अबकी बार नीयत सरकार। भारत एक नीयत प्रधान देश हो गया है। हर कोई यहाँ नीयत का डाक्टर है। इससे प्रेरित होकर अब प्रधानमंत्री जी कुछ भी फ़ैसला ले सकते हैं। उनकी नीयत पर जनादेश आ गया है।  बल्कि अब वे लागू होने पर समय बर्बाद न करें। सिर्फ फ़ैसला लेने की नीयत का ख़्याल रखें।
मोदी ने फ़ैसला तो शानदार लिया है लेकिन…। सबकी ज़ुबान पर यह लाइन कहाँ से आ गई? क्या मीडिया से सबने एक ही बात बोलना सीखा? अचानक भारत में नीयत के एक्सपर्ट कहाँ से पैदा हो गए। क्या लोग ‘लेकिन’ से भी पहले कुछ कहना चाहते हैं मगर कह नहीं पा रहे? यह कैसा फ़ैसला है जिसकी आलोचना ‘लेकिन’ रूपी इंटरवल के बाद से शुरू होती है। पचास से अधिक लोग नोटबंदी के तनाव के कारणों से मर गए। ग़रीब लोग पैसे के लिए तरस गए। मंडी सूख गई। पावरलूम थम गया। किसान सहम गया। लोग अपना पैसा नहीं निकाल सकते। शादियों के घर में मारामारी है। कई दिन तक दिहाड़ी मज़दूर कमाने नहीं निकले। बच्चे दूध के लिए तरस गए। बीमार दवा बिना मर गए। कोई लिख रहा है कि बाज़ार में मंदी रहेगी। देश की  जीडीपी की रफ़्तार थम जाएगी। फिर भी यह अच्छा फ़ैसला है क्योंकि मोदी जी की नीयत सही थी। क्या यह सब उस फैसले का पार्ट नहीं है?

क्या मोदी जी नीयत से फ़ैसला लेते हैं? तो मोदी जी की कैबिनेट क्या करती है? मंत्रालय क्या करते हैं? वित्त मंत्री क्या करते हैं? उनके अधिकारी क्या करते हैं? जब ये लोग कुछ नहीं करते तो फिर मोदी जी क्या करते हैं? उनकी कमेटियाँ क्या करती हैं? क्या भारत सरकार नीयत से चलती है ? छह महीने से क्या तैयारी चल रही थी ? क्या नीयत का अभ्यास हो रहा था ? नीयत की इतनी तारीफ हो रही है जैसे मोदी जी ने नीति नहीं नीयत लागू किया है । क्या हम तमाम नीतियों का मूल्याकंन इस पैमाने पर करेंगे कि जाने दो नीयत सही थी।

अगर ऐसा है तो भारत सरकार को तुरंत नीति आयोग भंग कर देना चाहिए। नीयत आयोग बनाना चाहिए। नीयत आयोग हर फैसले को सर्टिफ़िकेट देगा। नीयत सही है तो कर चलो। भले ये लागू न हो सके। अब किसी नीति पर बहस ही न हो। कह दिया जाए कि मोदी जी की नीयत सही है। आप समंदर में कूद जाओ। डूब जाओ। फिर बोलो कि तैरने की मंशा सही थी पर तैरना नहीं आता था। लोगों को किस सूचना के आधार पर भरोसा है कि यह फ़ैसला नीयत के कारण सही है? उलटा कुछ दिनों की तकलीफ को तीन दिन बाद पचास दिनों की अफ़रातफ़री में कंवर्ट कर दिया गया। जैसे तकलीफ न हुई ब्लैक मनी हो गई!

 

नोटबंदी का फ़ैसला लिया गया। अभी इसके सही गलत का सर्टिफ़िकेट कैसे दिया जा सकता है, जबकि ख़ुद मोदी जी ने पचास दिनों का समय माँगा है। कायदे से ये कहिए कि हमें पचास दिन बाद पता चलेगा कि फ़ैसला सही है या ग़लत है लेकिन अभी तो जान निकल गई है। फिर भी ये बात समझ में आती है। अच्छे अच्छों को पता नहीं है कि पचास दिन बाद क्या होगा। अर्थशास्त्री कभी कुछ लिखते हैं, कभी कुछ। मंत्री कभी कुछ बोलते हैं कभी कुछ। वित्त मंत्री कहते हैं कि भारत में कम लोग टैक्स देते हैं। अभी तो आप इस फैसले से आतंकवाद से लड़ रहे थे। अब टैक्स आधार बढ़ाने लगे?

 

हो सकता है कि यह बहुत अच्छा फ़ैसला हो लेकिन क्या यह दावा किसी जानकारी के आधार पर है या नीयत ही जानकारी है। सरकार ने बताया है कि पचास दिन बाद क्या होगा ? हमने आपने देखा है कि बड़े लोगों का पैसा बर्बाद हो गया। हर जगह से कुछ कमीशन देकर पैसा सफेद होने की ख़बरें आ रही हैं। यह कितना शर्मनाक है। जब यही बच गए तो फ़ैसला कैसे सही हुआ। क्या सरकार बताएगी कि इतने डाक्टर इतने इंजीनियर के यहाँ से काला धन निकल गया। दस पाँच छापे मारकर क्या हो जाएगा। वो तो ऐसे भी पड़ते रहते हैं। रोज़ बताते हैं कि बैंकों में इतना लाख करोड़ जमा हुआ। यह नहीं बताते कि कितना पैसा काला धन जमा हुआ।

 

अभियान काला धन समाप्त करने का है और आँकड़ा लघु बचत का दे रहे हैं।अर्थव्यवस्था एक जटिल विषय है। इसके अनगिनत पहलू हैं। फिलहाल तो हर तरफ हाहाकार है मगर नीयत के कारण फैसले की तारीफ हो रही है। क्या लोग इस फैसले की नीयत की तारीफ इस खुशी में कर रहे हैं कि इसके कारण बैंकों में उनकी घरेलू बचत का ब्याज कम हो गया है? अब उन्हें पहले से कम पैसे मिलेंगे? क्या इस खुशी में कर रहे हैं कि बैंकों का लाखों करोड़ों लेकर भागने वालों को फिर से क़र्ज़ मिलेगा?

इस वक्त लोगों को जो भयावह परेशानी हो रही है वो उसी नीति के कारण है जिसकी नीयत सही बताई जा रही है। समस्या सिर्फ एटीएम की क़तार में नहीं है। बाज़ार व्यापार में भी है। डर के मारे कोई बोल नहीं रहा। सब नीयत की तारीफ कर बर्बादी का दर्द हल्का कर रहे हैं। क्या इसकी नीयत ये है कि लोग परेशान हों? उनकी अपनी कमाई कैसे खर्च हो ये सरकार तय करेगी, कैसे ? क्या लोग इस आधार पर तमाम असफल फ़ैसलों को पास कर देंगे कि उनके लिए जाने की नीयत ठीक थी। एक जनवरी से क्या होगा, हम नहीं जानते। शानदार होगा तो हम भी कहेंगे कि फैसले का असर अच्छा है। लेकिन अभी कैसे शानदार कह सकते हैं। किस आधार पर? लोग परेशान हैं और हम कहें कि जाने दो किया तो देश के लिए न । अरे तो जो परेशान हुआ है वो भी तो उसी देश का है। क्या उसकी नियति यही है कि उसे परेशान करने वाले फैसले की नीयत ठीक है ! ये मक़ाम मोदी जी को ही हासिल है कि फ़ैसला तो सही लेते हैं लेकिन…… के बाद से उनकी समीक्षा शुरू होती है। यानी आपकी आलोचना ‘लेकिन’ के बाद बैंकों की लाइन में लगी है ।