गुड गौ रक्षा आंदोलन बनाम बैड गौ रक्षा गुंडई

आर एस एस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा है कि गौ हत्या पर पूरे देश में प्रतिबंध लगना चाहिए। कायदे से उन्हें यह बात उन राज्यों को कहनी चाहिए जहां भाजपा का शासन है और गौ हत्या पर प्रतिबंध नहीं है। पूर्वोत्तर के राज्यों का नाम तो लिया ही जा सकता था। कई दशकों से गौ हत्या की राजनीति से किसी को कोई लाभ नहीं हुआ। इसे हिन्दू बनाम मुसलमान बनाकर नफ़रत बोई जा रही है। बेहतर है कि इसे एक बार और अंतिम बार के लिए तय कर लिया जाए। गाय हत्या को लेकर मुसलमानों पर सवाल दागने से अच्छा हिन्दुओं से कहा जाए कि कोई हिन्दू अपनी गाय कसाई को नहीं बेचेगा न चमड़ा उतारेगा। खुदरा खुदरी पहलू ख़ान को मार कर गुंडा एंकरों के ज़रिये सांप्रदायिकता भड़काने से अच्छा है कि इस समस्या को हमेशा के लिए निपटा देना चाहिए। आर्थिक नुकसान की बात का कोई तुकसनहीं बैठ रहा है। बीस पचास मांस निर्यातकों के लिए एक पूरा समुदाय दहशत में रहे और अपराधी की तरह देखा जाए इसे बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए।

ये बहस हिन्दू बनाम मुसलमान का नहीं है। हिन्दू बनाम हिन्दू का है। सभी हिन्दुओं को उन यांत्रिक बूचड़खाने का घेराव करना चाहिए जहां भैंस कटती है, मांस का निर्यात होता है। क्यों नहीं भागवत या बीजेपी के तमाम नेता मंत्री हिन्दुओं से अपील करते हैं कि दरवाज़े पर गाय कम दूध दे या मर जाए , आप किसी कसाई को नहीं बेचेंगे। ऐसा करने वाले पर धर्म हत्या का पाप लगेगा। कितनी चालाकी से गौ-तस्करी का शब्द गढ़ा गया है जैसे साबुन में सोना छिपा कर लाया जा रहा हो।गाय बेचने वाले से शपथ पत्र ली जाए कि उसने कसाई को नहीं बेची है। वो यह भी बताये कि उसकी सेवा ख़ुद क्यों नहीं कर रहा है। गौ रक्षा का सवाल हिन्दुओं का है और पूछा जा रहा है मुसलमानों से।

कोई भी किसान अपने मवेशी को बेचते समय खुश नहीं रहता। चाहे वो बैल ही क्यों न। आस्था के चलते नहीं बल्कि वो उसे पालते हुए प्यार करने लगता है। वो कम दूध देने वाली या बीमार गाय की सेवा नहीं कर सकता इसलिए बेच देता है ताकि नई गाय लाकर परिवार चला सके। आलसी विपक्ष को अक्ल होती तो वह यह मांग करता है कि हर पशुपालक को गौ सेवा के अंतिम दो साल के लिए सरकार प्रति महीने दो हज़ार रुपये दे। बीमा का प्रावधान बदलवा दे ताकि कोई किसान अपनी गाय को आवारा और भूखा न छोड़े। क्या संघ या बीजेपी ने ऐसी कोई मांग की है? सड़कों पर भटकती गाय और बैल के कारण कितनी सड़क दुर्घटनाएं हो रही हैं। डेयरी वालों को निर्देश जाए कि चार या पाँच साल से पुरानी गायों का आधार लिंक भेजें और उनका अंत समय तक सेवा करें। बूढ़ी गायों को बेचना अपराध होगा।

एक गौ पालक ने बताया कि गाय बेचते हैं तो दो तीन दिन तक पूरा घर रोता ही रहता है। भैंस और बकरी के साथ भी यही आत्मीय रिश्ता हो जाता है फिर हम बेचते तो हैं। अगर बूढ़ी और कम दूध देने वाली गाय के लिए कोई नीति बने तो हमसे ये बोझ हट जाएगा। यही आर्थिक मजबूरी दूसरी तरफ भी है। बूढ़े पशुओं को मारने या चमड़ा उतारने वालों की आर्थिक हैसियत देख लीजिये। जो फैक्ट्री चला रहे हैं वो सूट बूट में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिलते हैं। यही नहीं गाय की संतान बछड़ों के प्रति निर्ममता की इजाज़त किस हिन्दू धर्म ने दी है। बैल तो शिव जी का साथी है। बैल कैसे कट रहे हैं। बैल-रक्षा क्यों नहीं हैं। गाय बची रहे और उसका बछड़ा कटता रहे तो क्या गाय माता की पीड़ा के बारे में कोई नहीं समझेगा। कुतर्कों का उत्पादन और वितरण दोनों तरफ से बहुत ज़रूरी है।

गाय को मां माना है तो बर्ताव भी मां जैसा होना चाहिए। सरकार ने कानून बनाया है कि मां बाप के साथ कैसा व्यवहार किया जाएगा, उनकी संपत्ति में किसका अधिकार होगा ये मां बाप तय करेंगे, असम सरकार ने भी एलान किया था कि जो सरकारी कर्मचारी मां-बाप की सेवा नहीं करेगा, उसकी सैलरी से पैसा काट कर उनकी मदद की जाएगी। उसी तरह गौ माता के बारे में भी कुछ करना होगा। गाय कथित तस्करों से बच जाएगी और दरवाज़े पर भूख से तड़प कर मर जाएगी तो कौन सा इंसाफ़ हो जाएगा । इस पर हम क्यों नहीं बात कर रहे हैं। बुढ़ापे या कम दूध देने की स्थिति में कोई गाय बेचे ही न, इस पर कोई सवाल क्यों नहीं कर रहा है। क्या इस गौहत्या में सिर्फ मुसलमान दोषी है, हिन्दू नहीं है? जो गाय खरीदेगा, उस पर अंत अंत तक सेवा का दायित्व हो। सरकार या तो गौशालायें बनवाये या सब्सिडी दे। गुजरात में ऊना कांड में दलितों ने एक तरह से ठीक कहा था कि तुम्हारी मां है तुम इसके अंतिम संस्कार करो।

शहरों में जो भी हिन्दू अपनी गाय को प्लास्टिक खाने के लिए छोड़ेगा, उस पर कठोर कानूनी कार्रवाई हो। गायों को टीबी और कैंसर हो रहा है। इसकी कोई फिक्र नहीं है। जो भी गौशाला की ज़मीन पर कब्ज़ा किया है वो इसकी घोषणा प्रधानमंत्री ग़रीब कल्याण कोष में कर दे। कब्ज़ा छोड़े। सरकार को देशव्यापी अभियान चलाकर गौशालाओं के लिए दान की हुई लाखों एकड़ ज़मीन का डेटा तैयार करना चाहिए, उनसे कब्ज़ा हटाना चाहिए।

वाकई आज गाय के प्रति विशेष करुणा की ज़रूरत है। उसे जीने का अधिकार है मगर फर्ज़ी आस्था के नाम पर पहलू ख़ान को मारने का हक किसी को नहीं है। मानव हत्या से गौ रक्षा नहीं होगी। मानव रक्षा से ही गौ रक्षा होगी। इसके लिए ज़रूरी है कि गाय पालने वाले किसानों को सरकार अंतिम दो साल में सब्सिडी दे। कीजिये न इन सबको लेकर आंदोलन, सारी दुकानदारी बंद हो जाएगी इनकी।

दूसरी बात है सरकार, संघ, बीजेपी भैंस के बारे में क्या राय रखते हैं? वे सिर्फ गाय का नाम लेते हैं। भैंस के बारे में चुप रह जाते हैं। तो उन्हें कहना चाहिए कि भैंस हत्या हो, भैंस का मांस बिके हमें दिक्कत नहीं है। हरियाणा के हिसार में भैंसों पर शोध होता है। राष्ट्रीय संस्थान है। उसकी वेबसाइट WWW.CIRB.RES.IN पर जाइये, पहले पन्ने पर इसके डायरेक्टर की तस्वीर मिलेगी जो भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भैंस के फायदे बता रहे हैं। माँस का कोराबार समझा रहे हैं। वेबसाइट पर लिखा है कि माननीय प्रधानमंत्री ने संस्थान द्वारा दिखाए गए भैंस में काफी दिलचस्पी दिखाई है। डा सिंह ने प्रधानमंत्री को बताया कि भारत के दुग्ध उत्पादन में भैंस का योगदान 53 प्रतिशत है। भैंस के कारण ही भारत दुग्ध उत्पादन में दुनिया में नंबर वन बना है। इसके अलावा भैंस का मांस भी देश के लिए तीस हज़ार करोड़ सालाना अर्जित करता है। किसान भैंस से अतिरिक्त आय अर्जित कर रहे हैं और ये मेक इन इंडिया स्लोगन के लिए एकदम फिट है! माँस और मेक इन इंडिया !

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इसी की वेबसाइट पर भैंस के मांस की खूबियों का बखान है। कहा गया है कि मांस के लिए भैंस का ठीक से इस्तमाल नहीं किया गया है। हिसार में बकायदा किसानों को भैंस के मांस से होने वाले आर्थिक लाभ की जानकारी दी जाती है। तो फिर सरकार या संघ को खुलकर कहना चाहिए कि मांस निर्यात ही करना है तो भैंस का कीजिए। इसमें हमारी कोई आस्था नहीं है और ये मेक इन इंडिया है ।

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करनाल के पशुपालक रामसिंह ने बताया कि किसान भैंस इसलिए पालता है कि बूढ़ी भैंस के दाम बूचड़खाने वाले गाय से ज़्यादा देते हैं। भैंसे का नर बच्चा जिसे कचड़ा कहा जाता है, वो भी अच्छे दाम में बिकता है। इसमें बड़े बड़े लोग धंधा करने आ गए हैं। वो डेयरी बना रहे हैं। इसका व्यवसाय करोड़ो का है। किसानों की गाय का वही हाल है जो गली के कुत्ते का है। मगर अमीरों के शौक के कुत्ते कितने महंगे बिक रहे हैं। शायद वहां से कोई खेल हो रहा होगा।

योगी मंत्रिमंडल ने अपनी पहली कैबिनेट बैठक के बाद कहा था कि जो अवैध बूचड़खाना चल रहा था वो नहीं चलेगा। जिन्होंने लाइसेंस को नया करने के लिए दोबारा आवेदन दिया है हमें फिर से लाइसेंस देने में कोई आपत्ति नहीं है। जबकि घोषणापत्र में साफ लिखा है कि अवैध बूचड़खाने बंद होंगे। यांत्रिक बूचड़खाने बंद होंगे। उसमें यह नहीं लिखा है कि अवैध यांत्रिक बूचड़खाने बंद होंगे। यांत्रिक बूचड़खाने बंद होंगे। क्या भैंस को लेकर हमारी कोई आस्था नहीं है। पहले भी इन यांत्रिक बूचड़खाने में गाय काटने का लाइसेंस नहीं था। भैंस ही कटती है। उसी का निर्यात होता है। यूपी में गौ हत्या पचास के दशक से प्रतिबंधित है। जिन राज्यों में गौ हत्या प्रतिबंधित हैं उन्हें श्वेत पत्र जारी करना चाहिए कि उनकी किसी फैक्ट्री में गाय नहीं कटती है। उनके राज्य में गाय नहीं कटती है। दरअसल मूल प्रश्नों को अंधेरे में रखकर सिर्फ गौ हत्या गौ हत्या की जा रही है ताकि धारणा बनती रहे। धारणा बन गई कि मुसलमान गौ हत्या कर रहे हैं तो फिर कर रहे हैं। जिन राज्यों में गौ हत्या बंद है, वहां का मुसलमान तो गाय खाता ही नहीं होगा।

गौ रक्षा के नाम पर जो राजनीति चल रही है उसका नुकसान किसान को ही होने जा रहा है। इंडियन एक्सप्रेस में हरीश दामोदरन ने अच्छा लेख लिखा है। गाय बिकेगी नहीं तो कोई गाय खरीदेगा नहीं। भैंस और उसका दूध उसकी आर्थिक ताकत है इसलिए भी वो भैंस ज़्यादा पाल रहा है।
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यह तस्वीर करनाल के डेयरी रिसर्च संस्थान में लगी है। इसमें गांधी और मालवीय जी साहिवाल गाय के साथ हैं। इस नस्ल पर काम तो हुआ मगर इसे लोकप्रिय नहीं बनाया जा सका। इंदिरा गांधी, वी वी गिरी से लेकर कई लोगों की तस्वीर साहिवाल गाय के साथ मिलेगी। करनाल के किसान रामसिंह कहते हैं कि भैंस की दूध में वसा अधिक होती है। लेकिन उसमें विदेशी गायों का पतला दूध मिलाकर खपाया जा रहा है। इन विदेशी गायों का दूध इतना पतला होता है कि कोई पी नहीं सकता। इसलिए यह दावे के साथ आप नहीं कह सकते हैं कि भैंस का दूध पूरी तरह से भैंस का ही दूध है। भैंस को पालना भी कम सस्ता नहीं है। वो गाय से एक महीना ज़्यादा समय लेती है बच्चा देने में। बिना दूध का ड्राई पीरीयड भैंस का ज़्यादा होता है। भैंस पानी बहुत पीती है। गाय कम खाती है। ग़रीब के लिए गाय ही बेहतर है।
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एनडीआरआई के श्रीवास्तव साहब ने भी साहिवाल नस्ल की गाय के लिए काफी काम किया है। साहिवाल ब्रीड सबसे बेहतर है। यही देसी गाय है। साहिवाल गाय एक दिन में बीस किलो तक दूध देती है। कुछ लोगों ने अपनी मेहनत से साहिवाल ब्रीड तो तैयार किया है मगर आज भी विदेशी गायों का बोलबाला है। विदेशी डेयरी में काम कर चुके लोग पंजाब से लेकर तमाम जगहों पर जर्सी गायों का पालन बढ़ा रहे हैं। उनके दूध देने का समय कम होता है, जल्दी बूढ़ी होती हैं और बूचड़खाने को बेच दी जाती हैं। ऐसी गायें खरीदने वाले पशुपालक भी भयंकर घाटे में रहेंगे। अब जब ऐसे किसानों ने विरोध नहीं किया है तो मान कर चलना चाहिए कि वे इस राजनीति से खुश हैं और इसके साथ हैं। वो आर्थिक घाटा उठाने के लिए तैयार हैं। इसलिए आर्थिक नुकसान को लेकर इतना रोने की ज़रूरत नहीं है। ठीक है राजनीति हो रही है, दुखद बात ये है कि इस राजनीति के कारण न हम गाय के बारे में कुछ नया जान रहे हैं, कुछ अधिक जान रहे हैं न भैंस के बारे में। इस पूरी बहस में दो चेहरे हैं. एक हिन्दू और दूसरा मुसलमान। गाय तो है ही नहीं। भैंस के बारे में कोई बोल ही नहीं रहा है कि जितना काटना है काट लो। गौ रक्षा के नाम पर मुसलमानों को डराना बंद कीजिये।