बिजनेस अख़बारों को बांचते हुए, स्वर्ण युग की तलाश

इंडियन एक्सप्रेस के पहले पन्ने पर वित्त मंत्री कह रहे हैं कि आलोचकों ने जितने बुरे प्रभाव की बात की थी, वैसी कोई बात नहीं है। बेशक कुछ क्षेत्र ऐसे होंगे जहां बुरा असर पड़ेगा लेकिन आलोचकों ने जैसा कहा वैसा राजस्व संग्रह के आंकड़ों से नहीं लगता है। अपने इस बात के समर्थन में वित्त मंत्री ने चंद आंकड़े भी पेश किये हैं। 30 नवंबर तक अप्रत्यक्ष करों की वसूली 26.2 प्रतिशत बढ़ गई है। उत्पाद शुल्क 43.5 प्रतिशत बढ़ा है। सर्विस टैक्स 25.7 प्रतिशत बढ़ा है। आयात शुल्क 5.6 प्रतिशत बढ़ा। उन्होंने कहा कि म्यूचुअल फंड में 11 प्रतिशत निवेश बढ़ा है। जीवन बीमा का व्यापार बढ़ा है। अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन बढ़ा है। हवाई यात्रियों की संख्या बढ़ी है। रबी की बुवाई पिछले साल की तुलना में 6.3 प्रतिशत बढ़ी है।

वित्त मंत्री जब अच्छा बता रहे हैं तो बुरा भी बताना चाहिए। उन्हें बताना चाहिए कि वे कौन से कुछ सेक्टर हैं जिनपर असर पड़ा है। कितने प्रतिशत की गिरावट आई है और कितने लोगों की नौकरियां गईं हैं। सिर्फ अच्छा बताने के लिए ही वित्त मंत्री नहीं होते हैं। आख़िर ये कुछ सेक्टर या कुछ क्षेत्र क्या होता है? क्या मत्स्य पालन में ही असर पड़ा है? एक वित्त मंत्री के पास लाखों फैक्ट्रियों की आर्थिक गतिविधियों के आंकड़े होते हैं, उनमें से वे दो चार ही क्यों गिना रहे हैं। क्या उन्हें यह नहीं बताना चाहिए कि जब कुछ क्षेत्रों पर असर पड़ा था तो वे कौन से क्षेत्र हैं जो छलांगे मार रहे थे जिनके कारण अप्रत्यक्ष कर से लेकर सेवा कर में इतना उछाल आया है। आज के बिजनेस स्टैंडर्ड ने लिखा है कि हो सकता है कि मध्यम और छोटी कंपनियों ने अधिक कमाई दिखाई हो क्योंकि उन्हें अपनी नगदी कमाई का हिसाब देना था। अगर ऐसा है तो यह एक सकारात्मक पहलु हुआ मगर अखबार यह भी लिखता है कि बड़ी कंपनियों ने अग्रिम कर की भुगतान कम की है क्योंकि उनका ग्रोथ कम हुआ है।

नोटबंदी के बाद से तमाम जगहों पर अलग अलग राज्यों और सेक्टरों से नकारात्मक असर की ख़बरें छपी हैं। कपड़ा से लेकर निर्माण क्षेत्र की तमाम कंपनियों में संकट की ख़बरें छपी हैं। मज़दूरों का पलायन हुआ है। मांग में कमी की बात आई है। पहले दो हफ्ते तो उत्पादन ठप्प सा होने की ख़बरें आती रहीं तो फिर 30 नवंबर तक कैसे राजस्व संग्रह के आंकड़े वृद्धि दिखा रहे हैं। क्या वित्त मंत्री ने जो आकड़े दिये हैं, वो नोटबंदी के दौरान अर्थव्यवस्था के पैमाने को जांचने के लिए पर्याप्त हैं? किसानों की फसले बर्बाद हुई हैं मगर वित्त मंत्री सिर्फ बुवाई का आंकड़ा पेश कर रहे हैं जैसे इन महीनों में किसान सिर्फ बोता है। बेचता नहीं है।संतरा किसान से लेकर आलू किसान, सब्ज़ी किसान सबको दाम नहीं मिला। अब उन किसानों को ही मोर्चा निकाल कर कहना चाहिए कि हमें कोई घाटा नहीं हुआ। मीडिया ने हमारी बर्बादी की ख़बरें कम दिखाईं। होटल वाले शिकायत कर रहे हैं कि पर्यटक बुंकिंग कैंसिल करा रहे हैं लेकिन वित्त मंत्री कहते हैं कि अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन बढ़ा है। कहीं तो किसी की बात में मेल होना चाहिए।

इंडियन एक्सप्रेस के जिस ख़बर में वित्त मंत्री यह कह रहे हैं कि उच्च मूल्य की करेंसी का बहुत ही बड़ा हिस्सा वापस चलन में आ गया है। बाज़ार की ज़रूरतों के हिसाब से नई करेंसी आती रहेगी। बैंकों और पोस्ट आफिस में 500 के नए नोटों की संख्या बढ़ने लगी है। बैंकों और एटीएम की आपूर्ति बढ़ने लगी है क्योंकि अब अधिक से अधिक मुद्रा चलन में है। ज़रूर मुद्रा की स्थिति पहले की स्थिति से बेहतर है, आठ के बाद तो कई दिनों तक करीब करीब शून्य के आस पास स्थिति थी, फिर उससे तो कुछ भी बेहतर ही होगी मगर क्या अब सामान्य है?

इंडियन एक्सप्रेस में वित्त मंत्री के बयान के नीचे एक और ख़बर है। 12000 एटीम मशीन लगाने वाली कंपनी का कहना है कि उसके 40 प्रतिशत ए टी एम में ही कैश है। साठ प्रतिशत ए टी एम में कैश नहीं है क्योंकि करेंसी की आपूर्ति कम है। आगे चल कर तो सब सामान्य हो ही जाएगा लेकिन जब सामान्य नहीं है तब वित्त मंत्री को सही सही आंकड़ें रखने चाहिए।

उत्पाद शुक्ल बढ़ा है। अप्रत्यक्ष कर बढ़ा है। बुधवार के बिजनेस स्टैंडर्ड की पहली ख़बर है कि ‘डिफाल्ट डेट’ यानी लोन न चुका सकने वाली ऐसी कंपनियों की संख्या दुगनी हो गई है। कंपिनयों की संपत्ति की गुणवत्ता या क्वालिटी भी घटती जा रही है। बैंक उनसे वसूल नहीं पा रहे हैं। 2016 में 148 कंपनियों को डिफाल्ट रेटिंग दी गई है।

आज यानी शुक्रवार के इंडियन एक्सप्रेस के इकोनोमी पेज पर एक और ख़बर है। भारतीय रिज़र्व बैंक ने चेतावनी दी है कि बैंकों का एनपीए यानी नॉन परफार्मिंग असेट में तीव्र वृद्धि होने वाली है। उसमें भी बिजनेस स्टैंडर्ड की भाषा है किऐसा इसलिए हो रहा है कि एसेट क्वालिटी घटती जा रही है। मतलब तो यही लगता है कि जिन संपत्तियों को बेचकर कर्ज वसूली की जा सकती है उनकी क्वालिटी उतनी अच्छी नहीं है। कम मुनाफा और तरलता की कमी को भी कारण बताया गया है। भारतीय रिज़र्व बैंक का मानना है कि अगर माइक्रो इकोनोमिक कंडीशन में गिरावट आती है तो सकल एन पी ए और बढ़ सकता है। जितना समझ में आया उससे तो यही लगता है कि सरकारी बैंकों की हालत अभी खस्ता है। उनकी स्थिति में जल्दी सुधार की संभावना नहीं दिखती है।

दूसरी तरफ वित्त मंत्री कहते हैं कि बैंकों के पास काफी पैसा आ गया है। अब वे लोन देने की स्थिति में हैं। जब लोन लेने वाली कंपनियों की स्थिति अच्छी नहीं है तो ये बैंक किसे लोन देना चाहेंगे, उन्हीं कंपनियों को जिनकी रेटिंग डिफाल्ट डेट की है। आज के इकोनोमिक टाइम्स की खबर है कि सरकार की घुड़की के बाद बैंक ब्याज़ दरों में कटौती करने के लिए तैयार हैं। क्या बाज़ार में मांग नहीं है जो सरकार बैंकों को मजबर कर रही है कि ब्याज़ दर कम करो ताकि लोग ज़्यादा से ज़्यादा कर्ज़ ले सकें। बैंकरों का कहना है कि अगर कर्ज़ पर ब्याज़ दरें कम की जायेंगी तो बचत खातों में भी भारी कटौती करनी होगी।

होम लोन हुआ सस्ता, ब्याज़ दर कम हुआ, इसकी सूचना मोटी मोटी हेडलाइन से दी जाती है। ब्याज़ दरों में भारी कटौती की सूचना हल्की हेडलाइन से दी जाती है। हममें से कितने लोग सक्षम हैं जो अपनी बचत पर गंवा कर, कर्ज़ पर पाकर खुश होते हैं। बचत दर में कमी होगी तो उसका क्या असर होगा, इसका मूल्याकंन कोई नहीं करता कि एक बुजुर्ग इसके कारण महीने का एक हज़ार गंवा रहा है, लेकिन इसका ज़रूर होगा कि उसकी ईएमआई एक हज़ार कम हो गई। हिसाब तो दोनों बराबर ही हुआ न।
प्रधानमंत्री मोदी ने एक इंटरव्यू में कहा है कि फैसला इतना बड़ा था कि हमारे अच्छे से अच्छे अर्थशास्त्री भी अपने कैलकुलेशन में कंफ्यूज़ हो गए। भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर का भी बयान छपा है कि विमुद्रीकरण के असर को इस स्टेज पर कैप्चर करना मुश्किल है। तो प्रधानमंत्री के अनुसार क्या हमारे गवर्नर भी कंफ्यूज़ हैं। फिर वित्त मंत्री कैसे बता रहे हैं कि इसका राजस्व पर इतना बड़ा असर हुआ है।

जो भी है नोटबंकी के कारण सामान्य जनों को भी आर्थिक ख़बरों में अपनी दिलचस्पी बढ़ानी चाहिए। उन्हं ग़ौर से पढ़ना चाहिए और सवालों के साथ देखना चाहिए। हो सकता है हमारे सवाल कमज़ोर हों मगर पूछने से ही सही जवाब और सही सवाल का अंदाज़ा होता है। बिजनेस ख़बरों को ठीक से देखिये। एक ख़बर में सपने होते हैं तो अगली ख़बर में सपने बिखरे हुए होते हैं। बेशक आंकड़ों की बाज़ागरी चल रही है।

बिजनेस स्टैंडर्ड में उन पांच लोगों के नाम और तस्वीर छपी है जिन्होंने 2017 के अग्रिम कर का भुगतान किया है। व्यक्तिगत रूप से अग्रिम कर देने वालों में एक भी महान उद्योगपति नहीं है। जो दुनिया का सबसे अमीर व्यक्ति है वो भी नहीं है। पहले नंबर पर सलमान ख़ान हैं। दूसरे पर शाहरूख़ ख़ान, तीसरे पर कारपोरेट वकील ज़िया मोदी हैं, चौथे पर कपिल शर्मा और पांचवें पर अमिताभ बच्चन। सोशल मीडिया में एक टैक्स राष्ट्रवाद भी चलता है। सलमान ख़ान तो सबसे बड़े टैक्स राष्ट्रवादी निकले। कपिल शर्मा भी। तो मौज कीजिए। इन ख़बरों को बारीक निगाह से पढ़ा कीजिए। काफी कुछ अलग लगेगा।