चुनावी रिपोर्टिंग पर दोस्तों से संवाद

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पत्रकार जब कहने लगे कि इस बार का चुनाव समझ नहीं आ रहा है, त्रिकोणीय मुक़ाबला है, त्रिशंकु विधानसभा होगी, सीट दर सीट नतीजे अलग होंगे तो यक़ीन जानिये कि वे चुनाव से दूर हैं। चुनाव में अगर चर्चा ही करनी है तो हारने और जीतने वाले की भविष्यवाणी करनी चाहिए। अगर आप ठीक से घूम रहे हैं तो दो चरणों के बाद अंदाज़ा होने लगता है। कई लोगों के कहने पर फ़र्ज़ी सर्वे का असर होता है। स्थानीय पत्रकारों को भी ख़ास पता नहीं होता क्योंकि स्थानीय अख़बारों ने उनके भी पत्रकार बनने की प्रक्रिया ख़त्म कर दी है जैसे दिल्ली के स्तर पर हम लोगों के बनने की। इसलिए सब एक दूसरे को फोन करते हैं और एक दूसरे का सुनकर राय बनाते रहते हैं।

लोग नतीजा से पहले नतीजा बताने के वक्त लटपटाने लगते हैं। भाजपा का नाम लेते लेते लगता है कि कहीं बसपा जीत गई तो! फिल्ड में आपके सामने दस लोगों ने बसपा का नाम लिया हो फिर भी दो लोग भाजपा बोल देगा तो लगेगा कि नहीं भाजपा जीत रही है। किसी को तम मत आंकों। सबके लिए जीत का चांस बताकर रखो। कई बार आप बस दाँव लगा देते हैं कि पहले से एक का बोल कर रखो, जो होगा देखा जाएगा। किसे याद रहता है। कई लोग तो नतीजे के दो महीने बाद कहने लगते हैं कि उन्होंने नतीजा बता दिया था। जबकि उनका ग़लत निकला होता है।

चुनाव में विजेता एक ही होगा। तीन नहीं हो सकते हैं। जो लोग यूपी में हंग असेंबली बता रहे हैं, उन्हें साफ समझ लेना स्पष्ट बहुमत से किसी एक पार्टी की सरकार बनने जा रही है। नतीजा सीट दर सीट नहीं होगा। कोई एक पार्टी है जो लगातार आगे बढ़ रही है। हम पत्रकार लोग चुनाव को जाति और समीकरण के फ्रेम में ही देखते रहे हैं जबकि मतदाताओं ने हर बार इसे ग़लत साबित किया है। 2007, 2012 और 2014 के विधानसभा और लोकसभा चुनावों में जनता ने हर बार से ज़्यादा किसी एक पक्ष के हक में रिकार्ड नतीजे दिये हैं। जाति और धर्म के तमाम समीकरणों को ध्वस्त करते हुए। इस बार भी यूपी में नतीजा ऐसा ही होगा। जाति पर वोट हकीकत तो है मगर हर जाति से बड़ी संख्या में लोग अपनी जाति की पार्टी या नेता से अलग दूसरे को वोट करते हैं। किसी के पास इस तरह के वोटों को भांप लेने का पैमाना नहीं है। यही वोट इस बार भी यूपी में किसी एक को बंपर नतीजा देगा।

काग़ज़ पर पुराने मत प्रतिशतों को जोड़ कर नतीजा बताने की ग़लती न करें। लोकसभा में सब यही करते थे मगर बीजेपी को सत्तर से अधिक सीटें मिल गईं। विधानसभा में अखिलेश यादव को दो सौ से अधिक सीटें मिली थीं जबकि यादवों का कोई बहुत बड़ा वोट बैंक नहीं है। उससे पहले मायावती को भी सबने ख़ूब वोट किया था। ये तीनों उदाहरण बताते हैं कि यूपी की जनता हर किसी को छक कर वोट दे सकती है। इसलिए लोगों से बात कीजिये। इस चुनाव में तमाम चर्चाओं में शेर बना मुस्लिम वोट बैंक का लोकसभा चुनाव में पता भी नहीं चला। बीजेपी के लिए कोई और बैंक आ गया।

रिपोर्टर को कई तरह के स्थानों और समुदायों में जाना चाहिए। उम्मीदवार की बाइट मत लीजिये। उसे प्रचार करते हुए और भाषण देते हुए सुनिये। अगर आपका संस्थान इतना टाइम देता हो तो। वहाँ लोगों की भावना पकड़िये। नोटबंदी पूछकर जवाब से अंदाज़ा मत निकालिये। उससे पूछिये कि वो किस लिए वोट करेगा। किसको करेगा ये मत पूछिये। वोटर को बोलने दीजिये। मर्दों से ज़्यादा औरतों से बात कीजिये। वोट किसे देंगी ये मत पूछिये। ये कोई नहीं बताता है। अगर अखिलेश यादव के काम ने औरतों को प्रभावित किया है, उनकी ज़िंदगी में थोड़ी सी भी सहूलियत पहुँचाई है तो वे उम्मीद कर सकते हैं। उनके पाँच साल के दौरान महिला मतदाताओं ने अपने नज़दीक काम होते देखा है, महसूस किया है तो निराशा हाथ नहीं लगेगी।

सभाओं में आमतौर पर मर्दों की भीड़ होती है। नेता मर्दों को ही संबोधित करने लगते हैं। इस चुनाव में कोई ऐसा नहीं दिख रहा है जो औरतों के बीच नया सपना दिखा रहा हो। उनके लिए नई बात कह रहा हो। इस मामले में बीजेपी भी भारी चुनौती का सामना कर रही है। अखबारों में महँगाई दर कम है मगर औरतों के घरों में कमाई कम हो गई है और महँगाई भी बढ़ी है। युवा लड़कियों को कोई संबोधित नहीं कर रहा है।

युवाओं को रोज़गार देने के वादे पर सब फ़ेल हैं। ये मैं सभी दलों के बड़े नेताओं के सामने आँख मिलाकर बोल सकता हूँ। हर राज्य में शिक्षा का स्तर घटिया है। किसी भी दल की सरकार वाला राज्य हो। पढ़ाई के नाम पर लाखों युवाओं की शिक्षण ज़िंदगी के बीस साल बर्बाद हो रहे हैं। माता पिता की जेब से भारी पैसा खींच कर औसत छात्रों का ज़ख़ीरा तैयार किया जा रहा है। हर चुनाव में रोज़गार का मुद्दा नारों में छाया रहता है, मगर हम ठीक ठीक नहीं जानते कि वाक़ई कोई इस सवाल पर वोट करता भी है। हर भाषण में नेता इस पर बहुत टाइम ख़र्च करते हैं मगर कोई हिसाब नहीं देते हैं। युवाओं को फिर से जाकर रोज़गार का वादा करने वाले पोस्टर देखने चाहिए कि उसमें स्लोगन के अलावा क्या लिखा है।

इसलिए देखिये कि युवाओं और औरतों के बीच कोई नए सपनों का निर्माण कर रहा है क्या। चुनाव में जाति है मगर सिर्फ जाति नहीं है। युवा और महिला मतदाताओं के बीच वह धागा मिल जाएगा जिसे पकड़ कर आप बता सकते हैं कि सरकार किसकी बन रही है। ये काम प्रिंट के लोग बेहतर कर सकते हैं। टीवी ने पत्रकारों को बहुत ज़्यादा एक्सपोज़ कर दिया है। फालतू की भीड़ से हम घिर जाते हैं और वहाँ एक ‘एको चेंबर’ बन जाता है। चेंज मत पूछिये। पूछिये कि किसे चांस मिलना चाहिए। आपको कुछ बेहतर जवाब मिलेगा।

हर चुनाव में एक भावना होती है जो ख़ुद ब ख़ुद लोगों के बीच बनती रहती है। इसे मैं चुनावी मानस कहता हूँ। चुनावी मानस को समझे बिना आप किसी चुनाव के नतीजे को भाँप नहीं सकते हैं। हमें लगता है कि चुनावी मानस सिर्फ मीडिया गढ़ता है मगर कई बार इसे लोग भी ख़ुद से गढ़ लेते हैं। अपने आप यह पूरे प्रदेश में फैल जाती है। जो भी पार्टी चुनावी मानस और चुनावी भावना में ऊपर होती है, सरकार उसी की बनती है।

मुस्लिम वोट का बहुत विश्लेषण हो गया है। ये घिसा पिटा फ़ार्मूला है मीडिया का। मौलानाओं की इतनी ही राजनीतिक हैसियत होती तो वही ख़ुद एम पी एम एल ए बन जाते। मीडिया इनके बीच इनकी राय लेने कम, इनकी राय से चिढ़ पैदा करने के लिए ज़्यादा जाता है। पत्रकार मुस्लिम वोट बैंक समझने के लिए देवबंद चले जाते हैं या अलीगढ़। मैं दोनों जगह नहीं गया। और भी तमाम ज़िले हैं जहाँ मुसलमान रहते हैं। वहाँ जाइये तो उनका चुनावी मानस जान सकेंगे। उसमें कुछ नयापन होगा। उनकी राजनीतिक महत्वकांक्षाओं को बेहतर तरीके से जानेंगे। उनकी नागरिकता के सपनों को समझिये। मुसलमान काम न करने पर मुस्लिम नेताओं को भी हरा देते हैं।

हर चुनाव में पत्रकार को लोकेशन बदल देना चाहिए। मीडिया में चुनावी रिपोर्टिंग और विश्लेषण के लोकेशन फिक्स हो गए हैं। कुछ विशेष लोकेशन की ही चुनावी चर्चा होती है। मीडिया के तय किये हुए लोकेशन पर नहीं जाने का अभ्यास आपको नई कहानियों तक ले जाएगा। लोकेशन भी एक तरह का पूर्वाग्रह बनाता है। यहाँ के लोग एक के बाद एक पत्रकारों की आमद के कारण तय तरीके से प्रशिक्षित हो गए हैं। मीडिया को देखते ही लपक लेते हैं।
इसलिए आप मेरठ मत जाइये। धनौरा जाइये ! बहुत से पत्रकार जाते भी हैं फिर भी उनकी स्टोरी मेन स्टोरी नहीं मेनी जाती है क्योंकि संपादक भी उसी जड़ता का शिकार है कि यूपी के चुनाव में बनारस और अलीगढ़ से स्टोरी नहीं आई।

जैसे मैं बनारस जाकर कभी घाट पर रिपोर्टिंग करने नहीं जाता और न ही सुब्हे बनारस टाइप के जुमलों में टाइम बर्बाद करता हूँ। कई साल पहले बनारस पर आधे घंटे की स्पेशल रिपोर्ट बनाई थी। उसमें एक शॉट घाट का नहीं था। तब जाकर मैं देख पासा था कि बनारस की क्या हालत है। सफाई से लेकर ट्रैफिक की तंगी में कैसे ये शहर शान बघारकर खुश रहता है। उम्मीद है अब सब बेहतर हो गया होगा। काशी को क्योटो का साथ पसंद आ रहा होगा। घाट की तरफ घूमने ज़रूर जाता हूँ क्योंकि वह जगह मुझे पसंद है।ये मैं लिखकर दे सकता हूँ कि बनारस के घाट को हर चुनाव में शूट करने से चुनावी मानस की भनक नहीं मिलती है।

याद रखिये बनारस और अलीगढ़ का चुनावी मानस न तो बीएचयू से बनता है और न ए एमयू से। दोनों जगहों के मित्रों को यह बात बुरी लगेगी मगर ठीक से सोचेंगे तो समझ जायेंगे। दोनों ही विश्वविद्यालय शिक्षा और राजनीति के क्षेत्र में प्रासंगिकता खो चुके हैं।कुछ विभागों के बेहतरीन प्रदर्शन के आधार पर आप व्यापक सच्चाई को दरकिनार नहीं कर सकते हैं। दोनों ही क्षेत्रों में इनकी कोई भूमिका नहीं है। दोनों ही जगहों से कोई संघर्षशील छात्र नेता पैदा नहीं हुआ है। जिस बीएचयू का नाम शिक्षा के जगत में कोई नहीं लेता है, वो राजनीति क्या तय करेगा। अगर वहाँ राजनीतिक सक्रियता होती तो शिक्षा के जगत में उसका नाम नहीं होता? छात्र दिल्ली आने से पहले बनारस नहीं उतर जाते ?इसके ज़्यादातर प्रोफ़ेसरों की कोई पहचान नहीं है। मुमकिन है ज़्यादातर ने दहेज़ लेकर शादी की होगी !

वैसे भी बीएचयू राजनीतिक इस्तमाल के लिए ही जाना जाता है। राजनीति तय करने में इसकी कोई ख़्याति नहीं है। यह समझ कर कभी मत जाइये कि यह राजनीति का कोई सेंटर है। मैं लोकसभा चुनाव के समय गया था और सतही राजनीतिक जवाबों से बहुत खुशी नहीं हुई थी। एएमयू भी कभी गया था। माडिया रिपोर्ट से लगता था कि यहाँ से नब्ज़ पता चलती है। मगर जल्दी ही साफ हो गया कि अपने ही शहर की राजनीति में यहाँ के युवाओं का कोई ख़ास प्रभाव नहीं है। इसलिए कुछ चुनावों तक रिपोर्टिंग के लिए ए एम यू और बीएचयू टाइप जगहों पर जाना बंद कर दीजिये। उन्हें आराम की जरूरत है।

मैं संपादक नहीं हूँ या हुआ तो क्या हुआ। वैसे अब संपादक होने में कोई मज़ा नहीं है। संसाधन ही नहीं है तो संपादक बनकर क्या करेंगे। सुनते हैं आज़ादी भी नहीं रही और संपादकों में व्यक्तिगत साहस भी कम हो चुका है इसिलए इस कुर्सी तक पहुँचने के लिए समय बर्बाद न करें। जो लोग संपादक हैं वो भी कम नहीं झेलते होंगे। अपनी जेब में विज़िटिंग कार्ड न रखें। मैं नहीं रखता हूँ। कोशिश कीजिये कि रिपोर्टर बने रहें और बेहतर रिपोर्टिंग करें, जिससे संपादक जी ज़्यादा व्यवधान पैदा न कर सकें। खूब घूमिये और लोगों से बात कीजिये। नज़दीक से सिस्टम को देखियेगा। लोगों की आकांक्षाओं को महसूस कीजिये। चुनाव के बाद अनुभव संपन्न होकर राजधानी लौट जाइये।

इतना लिखने के बाद भी ये सवाल दिमाग़ से नहीं जा रहा है कि यूपी में कौन जीतेगा! आप भी पूछे बिना मानेंगे नहीं। हम भी काफी समय इस पर ख़र्च कर देते हैं।यह बताता है कि मीडिया की कंडीशनिंग के शिकार हम मीडिया वाले भी होते हैं। फिलहाल के लिए एक ही टिप्स है। रिपोर्टिंग में जगहों और जातियों के ‘फिक्सेशन’ से बचना चाहिए। बाकी नौकरी कैसे करेंगे, कैसे मिलेगी ये मैं नहीं बता सकता। अपनी नौकरी का तो ठिकाना ही नहीं है।