गेस्ट ब्लॉग : गरीबों का रेल

यह लेख क़स्बा के पाठक शाश्वत गौतम नें लिखा है।

छठ के अवसर पर बिहार जाने वाले गरीब लोगों के ट्रेन के बेहद कठिन सफर पर जब मीडिया ने थोड़ा प्रकाश डाला तो कई लोगों नें यह प्रतिक्रिया दी की यह समस्या बढ़ते हुए आबादी और बिहार जाने वाले लोगों की अत्यधिक संख्या के वजह से हो रही है। तर्क दिया की सरकार और रेलवे अपनी सीमित संसाधनो के साथ जो कर सकती है, कर रही है। बस ये नहीं बताया की क्या नहीं कर रही।

ठीक बात है की ख़ास पर्व त्योहारों में रेलवे में सफर करने वालों की संख्या बढ़ जाती है मगर यही बढ़ोतरी अन्य वर्गों के लिए भी होती है। क्या उन वर्गों को भी संसाधनों के लिए वैसे ही झूझना पड़ता है जैसे गरीब लोग झूझते हैं ? भेड़ बकरी टाइप।

मसलन क्या बढ़ती हुई आबादी में आर्थिक रूप से मजबूत मध्यम वर्ग के बच्चे स्कूलों – कॉलेजों के अभाव में अनपढ़ रह जा रहे हैं ? क्या आपने कभी ऐसा सुना है की कोई धनिक व्यक्ति सिर्फ इस वजह से हवाई जहाज से यात्रा नहीं कर पाया क्योंकि अगले दो हफ्ते तक के सारे के सारे हवाई जहाज के सीट फुल थे ? अगर आपके पास पैसा है तो आप निश्चित तौर पर उस गरीब आदमी से कई हज़ार गुना ज्यादा आराम से सफर कर पाएंगे। चाहे वह रेलवे की तत्काल वाली एसी बोगी हो या फिर हवाई जहाज का फर्स्ट क्लास सीट। हम यही तर्क खाना, पहनावा, गाडी, रोड, बिजली, घर, स्कूल, कॉलेज, पिज़्ज़ा और कोक तक के लिए दे सकते हैं। अमीरों के लिए हर परिस्तिथि में कोई न कोई न समाधान निकल आता है और संसाधन मिल जाता है।

नवउदारवाद के दौर में माध्यम वर्गीय लोगों को यह सब सवाल अजीब लगेगा क्योंकि सभी सप्लाई साइड वाले अर्थनीति में पूर्ण रूप से सम्मिलित हो चुके है। जहाँ सामान की सप्लाई खूब है, उसकी जरुरत प्रचार से कृत्रिम तरीके से पैदा की जाती, और धीरे धीरे वह नकली जरुरत आदत बन जाती है। ठीक इसके विपरीत गरीब लोगों की इतनी आर्थिक हैसियत नहीं होती की वह इस अर्थव्यवस्था में विलासता या आदत समर्थ कर सकें। उनका पूरा जीवन बुनियादी जरुरत की वस्तुओं और संसाधनो के लिए झूझते हुए निकलता है। वह अभी भी उसी डिमांड साइड वाली अर्थ व्यवस्था में हैं जहाँ उनकी खपत पूर्ण रूप से उनके जीवित रहने भर के लिए है। और वह आर्थिक असमानता के इस दौर में और पीछे छूटते जा रहे हैं। इसलिए वह कितनी भी कमाई कर लें, कभी हवाई जहाज से पटना नहीं जा पाएंगे और इसके विपरीत उनके कई और साथी हर साल उस जेनेरल डब्बे में उनके नए सहयात्री बनेंगे।

इस बात को आपको समझना होगा की एक गरीब आदमी कड़ी मेहनत करने के बावजूद साल दर साल अपने बीवी बच्चों के साथ छठ में घर जाने के लिए उसी जेनेरल डब्बे में कोचा के इसलिए सफर कर रहा है क्योंकि उसकी आर्थिक हैसियत नहीं बदल रही। हमारे लिए आसान है टी वी और इंटरनेट पर प्रचार देखकर किसी वस्तु को खरीद लेना मगर उसके लिए आज भी अपने बीवी बच्चों के लिए बीस घंटे की सम्मानजनक यात्रा बहुत महँगी है। अफ़सोस तो इस बात का है की सेल्फ़ी खिचाने वाले सरकार से लेकर पत्रकार को यह सामान्य बुद्धि की बात समझ नहीं आ रही की दिन पर दिन गरीब और भी ज्यादा गरीब होते जा रहे हैं। और सोने पे सुहागा हमारा मध्यम वर्ग है जो मोबाइल फ़ोन, लैपटॉप, टी वी, सिनेमा, रेस्टुरेंट, सोशल मीडिया इत्यादि में इतना अघाया हुआ है की उसके पास फुर्सत नहीं है उसी के खिलाफ बनाई जा रही नीतियों के विरोध में सरकार को तलब करने का। सरकारी और गैर सरकारी संसाधनों के लिए अगर आपको भी धकियाया जाने लगेगा तो आप भी उसी गरीब रेल यात्री की तरह हताश और ठगा हुआ महसूस करेंगे। जैसे आज कल गैस के दामों को लेकर कर रहे हैं।

इस पूरी बहस का सरलीकरण करते हुए पलायन, बिहार में नौकरी का अभाव, और गरीब लोगों की संख्या को बलि का बकरा बना दिया गया मगर किसी ने रेलवे से यह सवाल नहीं पूछा की राजधानी और शताब्दी के मुकाबले कितनी संख्या में नयी सुपर फ़ास्ट जन सधारण ट्रेने शुरू की गयी है। आपने पिछले बीस साल में जिस अनुपात में हर ट्रेन में स्लीपर और एसी के डब्बे बढ़ाये हैं क्या आपने उसी अनुपात में जेनेरल बोगी के डब्बो को भी बढ़ाया है? कितनी दफा पब्लिक डिमांड पर एसी और स्लीपर के तर्ज पर तत्कालिक रूप में जेनेरल डब्बे लगाये जाते हैं ? वह भी तब जब हमारे देश में गरीब यात्रियों की संख्या भारी मात्रा में बढ़ी है। एसी ट्रेनों के मुकाबले जेनेरल ट्रेनों की सुविधा, सुरक्षा, और सामयिकता का सवाल हम ना ही करें तो बेहतर है। बावजूद इसके की रेलवे देश की सार्वजनिक सुविधा प्रणाली का अभिन्न अंग है। पूर्ण रूप से सरकार द्वारा नियंत्रित है और संवैधानिक तौर पर देश के हर नागरिक का रेलवे पर बराबर हक़ है।

अगर रेलवे सही मायने में कुछ करना चाहती तो सक्रियता के साथ बहुत कुछ कर सकती थी जिसका लाभ हर वर्ग को मिलता। मसलन देश के जिस भाग में जाने के लिए ज्यादा भीड़ है वहाँ जाने वाले ट्रैफिक को प्राथमिकता के साथ संचालित करना। (आप किसी रेलवे के जूनियर इंजीनियर या गैंगमैन से पूछिये की ट्रेनों को किस गैरजिम्मेवारी के साथ कई बार लेट कराया जाता है।) इसके अलावा जिस तरह से हवाई जहाजों में कनेक्टिंग फ्लाइट के मद्देनज़र स्केड्यूलिंग की जाती है उसी तरह से त्योहारो के सीजन में ट्रेनों की स्केड्यूलिंग करना ताकि लोगों को जरुरत से ज्यादा समय प्लेटफार्म पर न गुज़ारना पड़े और गंतव्य तक जाने वाली मेल ट्रेनों को दूसरे शहर में भी जाकर आसानी से पकड़ सकें।

अगर दिल्ली से बिहार जाने वाले ट्रेनों की ही बात करें तो दिल्ली के तीन स्टेशनों को मिलाकर हर रोज़ लगभग तीस ट्रेनें जाती हैं मगर उनमें से अधिकांश झुण्ड के साथ जाती हैं जिसकी वजह रेलवे की हर संरचना पर जरुरत से ज्यादा भार पड़ता है। उसी तरह से अधिकांश स्पेशल और धीमी गति की ट्रेनें इतने बेटाइम से जाती हैं की हर कोई उनमें सफर करने से बचता है और कई लोगों को ठीक से उनके बारे में पता भी नहीं होता। इसके विपरीत अगर रेलवे भीड़ वाले मौसम में हर दो या तीन घंटे के अंतराल पर ट्रेन चलाये और उसका भरपूर प्रचार करे तो अनुमानित तौर रेलवे के सभी संरचनाओं पर कम भार पड़ेगा। यह सप्लाई चेन आवधिक प्रक्रिया का सिद्धांत है जिसे अक्सर मेट्रो ट्रेन की सेवाओं में इस्तेमाल किया जाता है। साथ ही ज्यादा भीड़ के समय अगर जेनेरल डब्बो की संख्या को बढ़ा दिया जाए, महिलाओं के लिए निश्चित तौर पर सुरक्षित डब्बा हो, और रेलवे सुरक्षा कर्मियों की भारी मौजूदगी हो तो कई प्रकार की अनेपक्षित घटनाएं रूक जाएंगी। इन सबका इस्तेमाल ई. श्रीधरण साहब नें दिल्ली मेट्रो के सफल सञ्चालन में किया है और यह करने के लिए उन्हें मेट्रो के प्राइवेटाइजेशन करने की जरुरत नहीं पड़ी।

जरुरी नहीं की ऊपर कही बातें कारगर हो मगर गरीब वर्ग की आवश्यकताओं के अनुसार एक रणनीति के तहत प्रबंधन करने का प्रयास जरूर किया जा सकता है जो अभी नहीं हो रहा। और शायद वह तब होने लगे जब संस्थाओं को चलाने वाले मध्यम और उच्च वर्ग के लोगों में थोड़ी संवेदनशीलता आ जाए। किसी भी प्रणाली या सर्विस का वजूद सभी नागरिकों के सेवा के लिए होता है न की गिने चुने लोगों के लिए जो समय समय पर खुद अपनी सुविधा और चाहत के अनुसार विशिष्ट बन जाते हैं।