ग़रीबों की गंगा


” जब धारा के विपरीत जाना हो तो बीच धार में नाव नहीं ले जाते । किनारे किनारे चलाते हैं । बीच में बहाव काफी तेज़ हो जाता है ।” नाविक रवि साधु का ये सहज ज्ञान हम सब अपने जीवन से खोते जा रहे हैं । जिसे मानव समाज ने हज़ारों साल में नदियों के किनारे हासिल किया था । 28 साल से गंगा में नाव चला रहा है । पहले चप्पू से नाव चलाता था अब मोटर से । गंगा में पानी भी कम हो गया है जिसके कारण बड़ा बड़ा जहाज़ नहीं चलता लेकिन पानी से ज्यास्ती ( ज्यादा) कमती तो लोग हो गया दादा । अब वैसे लोग भी नहीं चलते । 

वैसे लोग ? हाँ दादा ज्यास्ती तो ग़रीब लोग होता है । दक्षिणेश्वर से बेलुर के लिए दस रुपया ही भाड़ा है । इसलिए कि चलने वाले ग़रीब हैं । पहले तो बड़ा-बड़ा लोग गंगाजी में चलता था । घाट के किनारे नहाने आता था । रवि साधु की बात सुनते सुनते गंगा के किनारे घाटों को देखने लगा । नदी के तीर तक उतरती सैंकड़ों सीढ़ियाँ और उनपर बने दरवाज़े । अब तो वैसी अवस्था में नहीं है लेकिन इनकी विशालकाय बता रही है कि कभी यहाँ दैनिक रूप से कितने लोग नहाने आते होंगे । 

अब ये घाट जर्जर अवस्था में हैं । इससे पहले कि इनके जीर्णोद्धार को लेकर भावुक नारे गढ़े जाने लगे यह समझना ज़रूरी है कि समृद्ध लोगों ने ही गंगा को छोड़ दिया है । चंद कर्मकांडों को छोड़ गंगा उनके जीवन शैली का हिस्सा नहीं है । वो अपनी बालकनी में राष्ट्र में धर्म का काकटेल मिलाकर गंगा को लेकर भावुक होते रहते हैं । खैर इन घाटों पर एक या दो लोग ही नहा रहे हैं । कुछ घाट पर लोग डब्बे में पानी भर कर कहार की तरह ढोते चले जा रहे हैं । 

आधुनिक डिजाइनवाले विद्यासागर पुल से गंगा में फेंके गए सिक्कों को निकालने के लिए ग़रीब लड़कों ने डुबकी लगानी छोड़ दी है । लंबी सी रस्सी के एक छोर में बड़ा सा गोल चुम्बन बाँध दूर तक फेंक देते हैं । जैसे ही सिक्का चिपकता है रस्सी में हलचल होती है जैसे मछली के फँसते ही बंसी झुक जाती है । ये वो लोग हैं जिनकी ग़रीबी गंगा तक ले आई है ।

बेलुर मठ और दक्षिणेश्वर के बीच गंगा का पाट काफी चौड़ा है । नदी के दोनों तरफ कुछ पुराने मंदिर नज़र आए जो कभी समृद्ध रहे होंगे मगर अब जर्जर हो गए हैं । बेलुर की साइड में एक राधा कृष्ण मंदिर है । काफी भव्य कैम्पस लगा और मंदिर की बनावट भी लेकिन रौनक़ उतर गई है । दक्षिणेश्वर की साइड में बारह शिव का मंदिर दिखा । बंगाल छत ( पालकी की छत जैसी) शैली में बना एक- एक मंदिर खूसबूरत है लेकिन कोई हलचल नज़र नहीं आई । रंग उतर गया है और शायद भक्तों को वो पीढ़ि ग़ायब हो गई है जो यहाँ मन्नतें माँगा करती होगी । नाविक रवि  साधु ने बताया कि शिवरात्रि के दिन भीड़ होती है लेकिन बाक़ी समय ख़ाली रहता है ।

बेलुर मठ और दक्षिणेश्वर मंदिर की सादगी और भव्यता में कोई कमी नहीं आई है । शनिवार और सर्दी के कारण खूब भीड़ है । दक्षिणेश्वर से बेलुर की तरफ़ रवाना होते वक्त वहाँ आए हज़ारों लोगों को निहारने लगा । ज़्यादातर साधारण कपड़ों में थे और चेहरे पर निराशा की थकान । साड़ियों का रंग और छाप बता रहा था कि ग़रीब लोगों के यहाँ अभी फ़ैशन की एकरूपता नहीं आई है । लड़कों के कपड़े और बाल ब्रांडेड नहीं हुए हैं । इनकी ग़रीबी में ही भक्ति है । इतनी भक्ति है कि दो दो घंटे से लोग क़तार में खड़े हैं माँ काली के दर्शन के लिए । 

दक्षिणेश्वर के घाट पर ढेर सारी नावें हैं । यही लोग बेलुर जा रहे हैं । दस रुपया किराया और एक ही नाव में सबके समा जाने की ज़िद ताकि गंगा की यात्रा की सामूहिकता बनी रहे । इन नावों में कोई मध्यमवर्ग का नहीं है । कोई पोलिथिन का बैग संभाले फिसल रहा है तो कोई बहुत मुश्किल से एक रुपया का सिक्का गंगा में उछाल रहा है । ऐसा क्यों है कि ग़रीब ही प्राकृतिक संसाधनों के क़रीब है और अमीर को इनके पास जाने से पहले लाइसेंस चाहिए । 

ज़माने बाद मैं भी नाव में गंगा की यात्रा कर रहा हूँ । सूरज की रौशनी से पानी का सतह चमक रहा है जैसे बहुत सी मछलियाँ सतह पर अपना देह सुखा रही हों । हवा की शीतलता और नदी का चौड़ा पाट विराजता का अहसास कराते हैं । इतनी खुली जगह में यात्रा का सुख तो अब स्मृतियों से भी ग़ायब है । गंगा में चलना अतीत में चलने जैसा लगा । लगा कि पूर्वजों की यात्राओं को दोहरा रहा हूँ । नदियों के किनारे की पीढ़ियाँ अब सुदूर मैदानों में जा बसी हैं । किनारे के घर भी खंडहर जैसे लगते हैं । 

एक नाव में तीस लोग ही आ सकते है । आने-जाने में डेढ़ लीटर डीज़ल की खपत हो जाती है । पम्प सेट की काली हवा गंगा के लिए भी अच्छी नहीं होगी । अचानक एक दूसरी नाव हमारी नाव के बगल आ़ जाती है । उस नाव से इस नाव में एक यात्री आ जाता है । नाविक का दोस्त है । जल्दी दोनों बातें करने लगते हैं । रवि साधु बताता है कि हम तो नाव में ही चलते हैं । सड़क भाती ( अच्छी) नहीं है । हो सके तो आप भी नाव से यात्रा कीजिये । नदी पर चलकर देखिये ! 

(यह लेख प्रकाशित हो चुका है एनडीटीवी की वेबसाइट पर)