जर्मनी के ग्रीन गोल की तरह अब ग्रीन विकेट का नारा

नोट: इस लेख की शुरुआत एक चेतावनी से करना चाहता हूं। सौर ऊर्जा मेरे लिए नया क्षेत्र है। कई लेख पढ़कर इसे लिखा है। हो सकता है समझने में चूक हो जाए। अगर आप संशोधन सुझाएंगे और वो तर्कसंगत लगेगा तो मैं यथासंभव सुधार करने के लिए तैयार हूं।

जर्मनी में 2006 के साल में विश्व कप फुटबॉल होने वाला था। वहां 32 देशों के खिलाड़ी और समर्थक लाखों की संख्या में आने वाले थे। जर्मनी ने हिसाब लगाया कि इससे कितने पानी की ज़रूरत होगी, कितना पानी बर्बाद होगा, उन्हें बर्बादी से कैसे बचाया जाए, क्या किया जाए कि कचरा ज़्यादा न बने, उन कचरों का दोबारा इस्तमाल हो सके और सबसे पहले स्टेडियम में जहां ऊर्जा की भयंकर खपत होती है, वहां बिजली बचाने के लिए क्या किया जाए। जर्मनी ने सभी फुटबॉल स्टेडियम को सौर ऊर्जा से संचालित करने का लक्ष्य बनाया। जिसका नाम था ग्रीन गोल। इसके बाद जर्मन सरकार ने पूरी दुनिया में ऐसे प्रोजेक्ट के ज़रिये सौर ऊर्जा को प्रोत्साहित करने की योजना बनाई।

यही ग्रीन गोल 2013 में ग्रीन विकेट बनकर भारत आया। 2013 में जर्मन सरकार, वहां की कंपनी जर्मन इंटरनेशनल डेवलपमेंट कारपोरेशन(GIZ) ने कर्नाटक सरकार, कर्नाटक संघ ने मिलकर वहां के चिन्नास्वामी क्रिकेट स्टेडियम को सौर ऊर्जा से संचालित करने का फैसला किया। 15 अप्रैल 2015 को ग्रीन विकेट का पहला चरण पूरा भी हो गया। कर्नाटक सरकार के ऊर्जा मंत्री डी के शिवकुमार ने ग्रीन विकेट का उद्घाटन किया था। इस नई व्यवस्था में आस्ट्रेलिया और भारत के बीच मैच खेला गया। ग्रीन विकेट में सिर्फ सौर ऊर्जा ही नहीं है बल्कि पानी का बचाव, दोबारा इस्तमाल, कचरा कम से कम पैदा हो इन सब बातों पर ध्यान दिया जाता है। जिससे संसाधन की बचत भी हो और लोगों में वैकल्पिक ऊर्जा के प्रति जागरूकता भी आए। चिन्नास्वामी स्टेडियम में 400 किलोवाट का सौलर पैनल लगाया गया। जर्मन कंपनी GIZ ने तकनीकि सहायता दी और रखरखाव के तौर तरीके भी बताए। इससे जो अतिरिक्त ऊर्जा पैदा होती है वो कर्नाटक के बिजली निगम के ग्रीड में भेज दी जाती है। इस तरह भारत का पहला ग्रीन विकेट स्टेडियम कर्नाटक में तैयार हुआ।

अब दूसरे चरण में क्रिकेट के सभी क्रिकेट स्टेडियम को एक साल के भीतर सौर ऊर्जा से लैस करने की योजना है। सुस्त गति से चल रही ग्रीन विकेट की योजना को बिजली की गति प्रदान की जाएगी। इसी 28 मई से लेकर 4 जून के बीच बीसीसीआई और राज्य क्रिकेट संघों के उच्च अधिकारियों ने जर्मनी का दौरा किया और सौर ऊर्जा से संचालित फुटबॉल स्टेडियम जाकर देखा कि किस तरह से वहां निवेश हुआ है और रखरखाव किया जा रहा है। उसी दौरान जर्मनी के म्यूनिख में सौर ऊर्जा की अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शनी भी लगी हुई थी। सरकारी कंपनी जर्मन इंटरनेशनल डेवलपमेंट कारपोरेशन (GIZ) इस मामले में क्रिकेट संघों को तकनीकि सहायता देने के लिए तैयार है,बशर्ते वे अपने स्टेडियम में निवेश करने की योजना के लिए तैयार हो जाएं। क्रिकेट संघ के पास पैसे की कमी नहीं होती है, वैसे वो रोना रो रहे हैं, फिर भी एक साल के भीतर यह प्रोजेक्ट पूरा हो गया तो भारत में भी ग्रीन गोल की तरह ग्रीन विकेट का नारा गूंजेगा।

आइये इसी बहाने भारत में सौर ऊर्जा की स्थिति का विश्लेषण करते हैं। भारत सरकार ने 2022 तक के लिए सौर ऊर्जा का जो लक्ष्य तय किया है उसके बारे में कई विशेषज्ञों का मानना है कि यह लक्ष्य अतिमहत्वकांक्षी है यानी पूरा करना मुमकिन नहीं है।नीति आयोग ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि भारत में 2022 तक 175 गीगा वाट वैकल्पिक ऊर्जा पैदा करने की संभावना मौजूद है। वैकल्पिक ऊर्जा में सौर ऊर्जा के अलावा,पवन ऊर्जा, बायोमास ऊर्जा आती है। world resources institute नाम की वेबसाइट पर Katherine Ross का एक लेख है जो 31 मई 2016 को छपा था। इनका कहना है कि नरेंद्र मोदी सरकार 2022 तक सौर ऊर्जा से 100 गीगा वाट ऊर्जा पैदा करना चाहती है। जबकि 2014 तक पूरी दुनिया में 181 गीगावाट सौर ऊर्जा पैदा करने की स्थापित क्षमता थी। जो दुनिया ने 2014 तक हासिल किया, भारत उससे अधिक छह साल में हासिल करने की बात कर रहा है! क्या वाकई भारत इस लक्ष्य को हासिल कर लेगा?

कैथरीन का कहना है कि भारत के ऊर्जा मंत्री पीयूष गोयल तो दावा कर रहे हैं कि 2017 तक ही यह लक्येष्य पूरा हो जाएगा। जिस वक्त ये दावेदारी की जा रही थी उस वक्त भारत की सौर ऊर्जा पैदा करने की क्षमता मात्र 5.8 गीगावाट थी। इसीलिए दुनिया भारत के दावे से हैरान भी है और आशंकित भी।

कैथरीन लिखती हैं कि पीयूष गोयल ने एक सम्मेलन में दावा किया है कि भारत ने 2016 के लक्ष्य से 116 प्रतिशत ज्यादा हासिल कर लिया है। लक्ष्य यह था कि भारत 2016-17 में 12 गीगावाट की सौर ऊर्जा उत्पादन क्षमता कायम करेगा, जो मार्च 2017 तक चालू भी हो जाएगा। (चालू हुआ या नहीं, इसकी जानकारी मुझे अभी नहीं है) प्रेस इंफोरमेशन ब्यूरो की एक प्रेस रीलिज है दिसबंर 2016 की। इससे पता चलता है कि भारत ने 2016-17 के लिए सिर्फ सौर ऊर्जा से 4000 मेगावाट बिजली पैदा करने का लक्ष्य रखा था। 31.10.2016 तक भारत में सभी माध्यमों से 307.27 गीगावाट बिजली पैदा हो रही थी इसमें रिन्यूबल एनर्जी का हिस्सा 46.22 गीगावाट है। कुल ऊर्जा का 15 प्रतिशत। प्रेस रीलिज में कहा गया है कि भारत ने इस दौरान 5.8 गीगावाट सौर ऊर्जा की उत्पादन क्षमता जोड़ी है। जबकि 12 गीगावाट सौर ऊर्जा उत्पादन क्षमता का दावा कर लिया गया था। दावे और प्रेस रीलीज़ में अंतर है।

सरकार के दावों की तथ्यात्मक जांच करने वाली वेबसाइट IndiaSpend ने 7 जनवरी 2017 के अपने लेख में कहा है कि भारत 2022 तक इस लक्ष्य को हासिल नहीं कर सकेगा। अब हमें यह समझना है कि जब 2022 के लक्ष्य को हासिल नहीं कर सकेगा तो फिर भारत कैसे दावा कर रहा है कि 2016-17 के लिए तय लक्ष्य को पूरा कर लिया गया है? IndiaSpend का कहना है कि इस वक्त स्मॉल एनर्जी ग्रीड और सोलर होम सिस्टम मात्र एक गीगावाट सौर ऊर्जा पैदा कर रहे हैं जो 2022 के लक्ष्य के सामने ऊंच के मुंह में जीरा है। अगर यह सही है तो पीयूष गोयल के दावे पर सवाल उठता है कि भारत 2016-17 के अपने लक्ष्य से 116 प्रतिशत आगे निकल गया है। कौन सा तथ्य सही है? भारत एक गीगावॉट सौर ऊर्जा पैदा कर रहा है या बारह गीगावॉट ?

इंडियास्पेंड ने अपने विश्लेषण में कहा है कि सबसे बड़ी चुनौती है इस सेक्टर के लिए निवेश। निवेश के लिए जो ऋण है वो बहुत महंगा है। भारत में 2016 में जितने प्रोजेक्ट का टेंडर निकला है वो लक्ष्य को पूरा करने योग्य ही नहीं है। इंडिया स्पेंड ने यह बात अमरीका के एक कम्युनिकेशन फर्म मेरकॉम कैपिटल ग्रुप के आधार पर किया है। वैसे मैं इस तरह की कंपनियों के दावों को शक की निगाह से देखता हूं। आंख मूंद कर यकीन नहीं करता।

इंडिया स्पेंड ने एक ग्राफिक्स के ज़रिये समझाया है कि भारत ने 2013 से लेकर 17 के बीच 18.7 गीगावाट रिन्युबल एनर्जी की क्षमता विकसित की है। इसमें सौर ऊर्जा का हिस्सा 0.8 गीगा वाट से बढ़कर 3.8 गीगावाट ही हुआ है। अब यहाँ एक और आँकड़ा मिलता है । 3.8 GW का । यह बात भी ध्यान रखिये कि चीन के कारण सौर ऊर्जा के उत्पादन की लागत काफी घट गई है। इससे महंगे लोन पर निवेशकों ने इस सेक्टर में पैसा लगाया है। अब उन्हें काफी सस्ती दरों पर बिजली बेचनी पड़ रही है। भारत में 2012 में ग्रीन एनर्जी कोरिडोर बनाने का फैसला हुआ था ताकि वैकल्पिक ऊर्जा के वितरण और सरंक्षण के सिस्टम को ठीक किया जा सके। 2019 में 38000 करोड़ की लागत से इस कोरिडोर को पूरा होना है। इंडिया स्पेंड नाम की वेबसाइट ने अपने एक लेख में बताया है कि यह योजना पैसे की कमी का सामना कर रही है और लक्ष्य से दूर है।

ब्लूमबर्ग न्यू एनर्जी फाइनांस की रिपोर्ट के अनुसार भारत को अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए 100 अरब डॉलर के निवेश की ज़रूरत है। यह राशि छह लाख करोड़ से ज़्यादा होती है। 2016-17 के बजट में रिन्यूबल एनर्जी के लिए 5,035 करोड़ का प्रावधान किया गया था। एक्सपर्ट 2022 तक 175 गीगावाट रिन्युबल एनर्जी पैदा करने के लिए निवेश के अलग अलग राशि बताते हैं। कोई सात लाख करोड़ कहता है तो कोई आठ लाख करोड़। कोई छह लाख करोड़ भी कहता है। हम छह लाख करोड़ ही मान लेते हैं। छह साल के लिए छह लाख करोड़ की ज़रूरत पड़ेगी। यानी हर साल एक लाख करोड़ चाहिए होंगे। सरकार ने 2016-17 के लिए करीब पांच हज़ार करोड़ का ही प्रावधान किया है। इस नज़र से देखें तो मंत्री पीयूष गोयल के दावों पर शक होता है। 95,000 करोड़ पैसा रिन्युबल एनर्जी कंपनियों ने कहां से जुटाया। इंडिया स्पेंड ने लिखा है कि कई कंपनियों ने फाइनांस के संकट की शिकायत की है जिसके कारण वो अपना लक्ष्य पूरा नहीं कर पा रही हैं।

एक चुनौती है राज्यों की ख़स्ता हाल बिजली वितरण कंपनियां। इन्हें पैसे के संकट से उबारने के लिए उदय योजना लाई गई थी जिसके सफल होने के दावों को चुनौती दी जा रही है। आर्थिक संकट में होने के कारण बिजली वितरण कंपनियां समय पर इन रेन्युबल एनर्जी कंपनियों को पैसे का भुगतान नहीं करती हैं। इससे भी इन कंपनियों के लिए मुश्किल हो रही है। ऐसी स्थिति में क्या मंत्री जी के दावे पर यकीन किया जा सकता है कि भारत 2022 तक 175 गीगावाट का लक्ष्य पूरा कर लेगा और भारत ने 2016-17 का लक्ष्य सिर्फ पांच हज़ार करोड़ के निवेश से पूरा भी कर लिया है!

वापस आते हैं ग्रीन विकेट पर। ग्रीन विकेट योजना में भारत सरकार औपचारिक रूप से शामिल नहीं है। जर्मन सरकार ही इसे रोल मॉडल की तरह विकसित करना चाहती है। पर इस नारे को हड़पने का खेल शुरू होने में कितना वक्त लगेगा। कहीं ऐसा न हो जाए कि ग्रीन विकेट सौर ऊर्जा के लक्ष्यों का विकल्प बन जाए। इस नारे में प्रचार की प्रचुर संभावना है। सारे स्टेडियम जब सौर ऊर्जा, वर्षा जल संचयन,न कचरा प्रबंधन से जगमगा जायेंगे तब यही सौर ऊर्जा के क्षेत्र में कामयाबी का मॉडल बन जाएगा। एक साल में क्रिकेट स्टेडियम को लैस करने का लक्ष्य आसान भी है। 2013 से यह प्रोजेक्ट भारत में है। राजनीति जो करे, ग्रीन विकेट प्रोजेक्ट है बढ़िया चीज़। सवाल है कि जर्मनी के दौरे के बाद क्या क्रिकेट संघ वाक़ई अपने लिए साल भर के भीतर क्रिकेट स्टेडियम को सौर ऊर्जा से लैस करने का लक्ष्य रखेंगे?

सौर ऊर्जा के क्षेत्र को जागरूकता से ज़्यादा निवेश और ढाँचे की ज़रूरत है। कामयाबी के छोटे-छोटे द्वीप बनाकर आम जनता के जीवन तक नहीं पहुँचा जा सकता है। पर अब तो ज़माना ही इसी का है।