ज़िंदगी का नाम दोस्ती, दोस्ती का नाम ज़िंदगी

रोज़ उसके चेहरे पर उसका इंतज़ार देखता हूं। वो दीवार पर टंगी घड़ी की तरफ़ देखती रहती है। घड़ी की सुई उसकी आंखों में टिक-टिक करती चलती है। घड़ी देखनी नहीं आती। इंतज़ार की घड़ियां भाग रही हैं। आने का समय हो चुका है, आ नहीं रही है। कब आएगी। देखती घड़ी है, नज़र दरवाज़े पर होती है। फोन करती है। इंटरकॉम का नंबर तक याद है। बुलाना सीख गई है। एक हिसाब मन में चलता रहता है। बार-बार फोन करने से कोई पसंद नहीं करेगा। इसलिए बदल-बदल कर लोगों से कहती है कि फोन करो न। मुझसे कहती है कि तुम फोन करो। रोती है। लिपट कर और रोती है। वो क्यों नहीं आती है? आने के लिए बोलो न। ख़ुद से क्यों नहीं आती है? अच्छा, मैं बात करता हूं। क्या पता नींद में हो? कितना सोती है, बोलो मैं इंतज़ार कर रही हूं। मुझे खेलना है। घंटी बजती है, दरवाज़ा खुलता है। वो आ जाती है। आते ही ये सोफे पर लेट जाती है। आने की ख़ुशी उछलने लगती है। कमरे के भीतर की हवाएं करवटें लेने लगती हैं। कभी इस पर्दे को छूती हुई तो कभी उस पर्दे को छूती हुई।

अब उसे किसी का इंतज़ार नहीं है। न आने या देर से आने की शिकायत नहीं है। दो दोस्त मिल गए हैं। कमरा गुलज़ार है। खेल के नए-नए नियम बनने लगते हैं। नए-नए खेल बनने लगते हैं। कभी टीचर तो कभी मोटू पापा। मुझे उल्लू बनाने का खेल चलता है। दोनों को टीचर बनना पसंद है। इसकी मां और पसंदीदा आंटी टीचर हैं। दोनों को क्लासरूम में तो देखा नहीं होगा मगर अपनी टीचर के ज़रिये कल्पना करती है कि मां और आंटी कैसे पढ़ाती होंगी। कभी माँ बन कर आ जाती है तो कभी आंटी की तरह सज-धज कर। अब कमरे में दो टीचर हैं। मुझे तो कोई छात्र नहीं दिखता। मगर अलग-अलग कोने में जाकर दो टीचर पूरे क्लास को पढ़ा रही हैं। बच्चों को समझा रही हैं। डांट रही हैं। पापा से शिकायत कर देने की धमकी भी है। फिर सादे क़ाग़ज़ पर मोम के रंग रगड़े जाने लगते हैं। किसी रंग से लंबा रिश्ता नहीं है। एक रंग उठाया और जल्दी छोड़ दिया। रंग भरना है। फिर हंसना है। मिलकर हंसना है। बिस्तर पर कूदना है। कूदे बिना कोई खेल नहीं होता।

इसके बाद शुरू होता है कहानी का दौर। रोज़ रात को मां से कहानी सुनते समय उसकी कल्पना उस दोपहर में अटकी होती है जब उसकी दोस्त आती है। कल आएगी तो कैसे सुनाना है। कभी टीचर तो कभी पापा तो कभी कहानीकार। दोनों में से एक को श्रोता बनना पड़ता है। जो श्रोता बनता है उसे भी कहानीकार बनने का मौक़ा मिलता है। किस्से बनाए जाने लगते हैं। कहानियां दोस्त-दोस्त खेलने लगती हैं। इस कहानी का किरदार उस कहानी में। सबकुछ घुल-मिल रहे हैं। दो दोस्त खेल रहे हैं। दोनों एक दूसरे के पास हैं। एक दूसरे के सामने हैं। छोटी ग़लती पर तुरंत माफ़ी है। तुझे अच्छा नहीं लगा। चल ये वाला करते हैं। अब तो ख़ुश न। हां।

मालूम नहीं कब किसी दोस्त को कहा कि तुझे अच्छा नहीं लगा, चल छोड़ देते हैं। वो वाला करते हैं। कब किसी दोस्त ने मुझसे ऐसा कहा, याद नहीं। शायद अब कोई दोस्त खेलने नहीं आएगा। अब कोई दोस्त खेलने नहीं आता है। खेल करने वाले या खेल देखने वाले दोस्त रह गए हैं। साथ देने का वादा है मगर दिखता नहीं। हम भी तो इन्हीं पैमानों पर खरे नहीं उतरे। कभी अच्छे कपड़ों में दोस्त के लिए नहीं निकले। उसके साथ खेलने नहीं निकले। दोस्ती के लिए खेलना ज़रूरी है। हम खेलते नहीं हैं। अब कोई खेलता नहीं है। टीवी पर खेल देखते हैं। रोज़ किसी दोस्त के आने का इंतज़ार नहीं है। कहीं तक छोड़ आने का वादा नहीं है।

क्या आपके पास ऐसा कोई दोस्त है, जिसका इंतज़ार आप घड़ी देखकर या रोकर करते हैं? हम सबकी ज़िंदगी दोस्ती से शुरू होती है, मगर जाने कहां चली जाती है दोस्ती। बच्चे बड़े होते रहते हैं, ऐसे दोस्त ग़ायब होते रहते हैं। मैं जब भी अपनी छोटी बेटी और उसकी दोस्त को देखता हूं, अपने लिए एक दोस्त ढूंढता हूं। हाथ पकड़ कर खेलने के लिए, कारिडोर में तेज़ भागने के लिए या फिर कमरे के दो कोनों में खड़े होकर टीचर बन जाने के लिए। मैं भी किसी दोस्त के आने के लिए बेक़रार होना चाहता हूं। रोना चाहता हूं। आने पर बिना शिकायत किये हुए खेलना चाहता हूं। पागलपन की इजाज़त हो। ऐसी ही किसी बात पर हंसी हो, हंसते हंसते कोई लोटपोट हो। जो नहीं है वो अब नहीं होगा। जो है उसे देखकर सोचता रहता हूं, ऐसी दोस्ती किसके पास बची है। कितने दिन हो गए, किसी दोस्त की कमीज़ उधार लेकर पहने हुए, उससे पैसे लेकर फिल्म देखे हुए, खाकर मेज़ से उठे हुए कि पैसा वही देगा। अब वो दिन नहीं आएंगे। अब जो दोस्त होगा, दोस्ती समझी जाएगी, देखी जाएगी।

मैं जब भी उसे बुलाने जाता हूं या अपनी बेटी को उसके घर छोड़ने जाता हूं, ख़ुद को भी उनके साथ छोड़ आता हूं। मैं भी वहीं उनके बीच खेलता रहता हूं। हंसता रहता हूं। मैं भी टीचर बना किसी कोने में छात्रों को पढ़ा रहा होता हूं। चोट लगने पर पुचकारता रहता हूं। उन्हीं के साथ इस कमरे से उस कमरे में दौड़ता रहता हूं। उनके जैसा दोस्त बनने लगता हूं। अपने दोस्तों में इन दोनों को खोजे लगता हूं। एक अच्छा दोस्त होना चाहिए। जिसके उठने का समय मालूम हो। जिसके टिफिन का राज़ मालूम हो। जिससे सोते समय बातें कर सकूं। उसके मिलने पर कैसे कहूंगा, अकेले में अभ्यास करता रहूं। मुझे भी ऐसे दोस्त चाहिए। ऐसे दोस्त मिलते नहीं हैं। ज़िम्मेदारियां हैं। तनाव हैं। तूफ़ान है। सबमें हम हैं। हममें कोई नहीं है। सोचता हूं कि दरवाज़े पर अलग से एक घंटी लगा दूं। दोस्तों को बता दूं। आना तो वो वाली घंटी बजाना। मेरा हाथ पकड़ लेना। खेलने चलना। असली फोन मत लाना। नकली वाला लाना। हम उससे बातें करेंगे। लंबी लंबी बातें करेंगे। अख़बारों की नहीं। तुम्हारी।

चलते-चलते: ख़ुदगर्ज़ का गाना अच्छा लगता है। ज़िंदगी का नाम दोस्ती। दोस्ती का नाम ज़िंदगी। इस गाने में भाषा का एक कमाल है। देहाती दोस्त जिंदगी बोलता है। बिना नुक़्ते के। शहरी दोस्त भी ज़िंदगी बोलता है। नुक़्ते के साथ। हिन्दी का यह अकेला गाना है जो नुक़्ते के विवाद को दोस्ती से सुलझा देता है। नुक़्ता ज़रूरी नहीं है। दोस्ती ज़रूरी है। हिन्दी उर्दू की दोस्ती ही नहीं, अमीर ग़रीब की दोस्ती है। हिन्दी अंग्रेज़ी की दोस्ती है।

आप सुनियेगा इस गाने को। जब जिंदगी आएगी और जब ज़िंदगी आएगी। आपके कान तैरने लगेंगे। इस गाने के बोल लिखने वाला मेरी तरह किसी दोस्त के लिए तड़प रहा होगा। मैं भीड़ में भी अकेला जाता हूं। अकेले में भीड़ हो जाता हूँ। वहां मेरी कल्पना के बहुत से दोस्त होते हैं जो हकीकत में नहीं होते हैं। हो भी नहीं सकते। मुझे तो वो आदमी या औरत पसंद ही नहीं जिसे ये गाना पसंद नहीं। हो अहसान कैसा, फ़र्ज़ हमारा,हमने निभाई दोस्ती…..हाय, मैं तो रो देता हूं इस गाने पर।